संयुक्त राष्ट्र यूनिवर्सिटी- इंस्टीट्यूट फार एनवायरनमेंट एंड ह्यूमन सिक्योरिटी के द्वारा ‘इंटरकनेक्टेड डिजास्टर रिस्क रिपोर्ट 2023’ तैयार की गई है।
रिपोर्ट के प्रमुख निष्कर्ष
- संयुक्त राष्ट्र इंटरकनेक्टेड डिज़ास्टर रिस्क रिपोर्ट संयुक्त राष्ट्र विश्वविद्यालय- पर्यावरण और मानव सुरक्षा संस्थान (UNU-EHS) द्वारा जारी एक विज्ञान-आधारित वार्षिक रिपोर्ट है, इसका प्रथम प्रकाशन वर्ष 2021 में किया गया था।
- प्रत्येक वर्ष रिपोर्ट आपदाओं के कई वास्तविक उदाहरणों का विश्लेषण करती है और बताती है कि वे एक-दूसरे से तथा मानवीय कार्यों से कैसे जुड़े हुए हैं।
- यह रिपोर्ट दर्शाती है कि कैसे स्थिर प्रतीत होने वाली प्रणालियाँ एक महत्त्वपूर्ण सीमा पार होने तक धीरे-धीरे निष्क्रिय हो सकती हैं, जिसके परिणामस्वरूप विनाशकारी प्रभाव पड़ सकते हैं।
- यह रिपोर्ट “रिस्क टिपिंग पॉइंट्स” की अवधारणा प्रस्तुत करती है जो सामाजिक पारिस्थितिक तंत्र द्वारा जोखिमों को रोकने की अक्षमता तथा विनाशकारी प्रभावों के बढ़ते जोखिम को दर्शाते हैं।
- संयुक्त राष्ट्र विश्वविद्यालय (United Nations University- UNU) संयुक्त राष्ट्र की शैक्षणिक शाखा है जो एक ग्लोबल थिंक टैंक के रूप में कार्य करता है। पर्यावरण और मानव सुरक्षा संस्थान (UNU-EHS) का उद्देश्य पर्यावरणीय खतरों एवं वैश्विक परिवर्तन से संबंधित जोखिमों व अनुकूलन पर अत्याधुनिक शोध करना है। यह संस्थान जर्मनी के बॉन में स्थित है।
टिपिंग पॉइंट
यह रिपोर्ट इस तथ्य पर प्रकाश डालती है कि दुनिया छह पर्यावरणीय टिपिंग पॉइंट्स के करीब पहुँच रही है-
भू-जल की कमी
- जलभृतों में संगृहीत भू-जल 2 अरब से अधिक लोगों के लिये महत्त्वपूर्ण है, जिसमें से 70% कृषि के लिये उपयोग किया जाता है।
- हालाँकि विश्व के 21 प्रमुख जलभृत उनकी पुनर्भरण की तुलना में तेज़ी से समाप्त हो रहे हैं।
- जलभृत जल को एकत्रित होने में अमूमन हज़ारों वर्ष लग जाते हैं तथा यह अनिवार्य रूप से गैर-नवीकरणीय होता है।
- सऊदी अरब जैसे कुछ क्षेत्रों में अति-निष्कर्षण हुआ है, जिससे इसका 80% से अधिक जलभृत समाप्त हो गया है। जलभृत की कमी के कारण आयातित फसलों/कृषि उत्पादों पर निर्भरता बढ़ जाती है, जिससे खाद्य सुरक्षा के लिये चुनौतियाँ उत्पन्न होती हैं।
- भारत के गंगा के मैदानी भाग के कुछ क्षेत्र पहले ही भू-जल की कमी की गंभीर सीमा को पार कर चुके हैं तथा पूरे उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र द्वारा वर्ष 2025 तक गंभीर रूप से सीमित भू-जल उपलब्धता का सामना करने की संभावना है।
प्रजातियों के विलुप्त होने की प्रक्रिया में तेज़ी आना
- भूमि उपयोग में परिवर्तन, अत्यधिक दोहन तथा जलवायु परिवर्तन जैसी मानवीय गतिविधियों के परिणामस्वरुप प्रजातियों का विलुप्तीकरण तेज़ हो गया है।
- मानव प्रभाव के कारण वर्तमान विलुप्ति दर सामान्य विलुप्ति दर से कई गुना अधिक है।
- विलुप्तीकरण से एक शृंखलाबद्ध प्रतिक्रिया शुरू हो सकती है, जिससे पारिस्थितिक तंत्र का पतन हो सकता है।
पर्वतीय हिमनदों का तेज़ी से पिघलना
- हिमनद जल के प्रमुख स्रोत हैं, लेकिन ग्लोबल वार्मिंग के कारण वे दोगुनी दर से पिघल रहे हैं।
- वर्ष 2000 से 2019 के बीच ग्लेशियरों से प्रति वर्ष 267 गीगाटन बर्फ पिघली। सीमित तापमान वृद्धि के बावजूद, वर्ष 2100 तक विश्व के लगभग 50% ग्लेशियरों के पिघलने का अनुमान है।
- हिमालय, काराकोरम और हिंदू कुश पहाड़ों के 90,000 से अधिक ग्लेशियर खतरे में हैं तथा उन पर निर्भर लगभग 870 मिलियन लोगों का जीवन भी खतरे में हैं।
बढ़ता अंतरिक्ष मलबा
- उपग्रह मौसम निगरानी, संचार और सुरक्षा के लिये महत्त्वपूर्ण हैं, लेकिन अंतरिक्ष में कृत्रिम उपग्रहों की बढ़ती संख्या अंतरिक्ष मलबे की समस्या उत्पन्न कर रही है।
- केवल 25% ऑर्बिट में सक्रिय उपग्रह मौजूद हैं; शेष गैर-कार्यात्मक मलबा है।
- अंतरिक्ष में लगभग 130 मिलियन सूक्ष्म, ट्रैक न किये जा सकने वाले मलबे के टुकड़े हैं।
- अंतरिक्ष मलबे के ये टुकड़े तेज़ी से विचरण करते हैं और संचालनरत उपग्रहों के साथ टकराव का खतरा उत्पन्न करती हैं, जिससे एक खतरनाक कक्षीय पर्यावरण तैयार होता है।
असहनीय गर्मी
- वर्तमान में जलवायु परिवर्तन अत्यधिक घातक हीटवेव का कारण बन रहा है। उच्च तापमान और आर्द्रता शरीर को ठंडा रखने में कठिनाई उत्पन्न करती है।
- जब “वेट-बल्ब तापमान” 35°C से अधिक हो जाता है और छह घंटे से अधिक समय तक रहता है, तो यह ‘वेट-बल्ब’ तापमान अंग विफलता एवं मस्तिष्क क्षति का कारण बन सकता है। ऐसी घटना पाकिस्तान के जैकबाबाद जैसी जगहों पर हो चुकी है।
- साथ ही वर्ष 2023 में भारत में एक हीटवेव के दौरान वेट-बल्ब तापमान 34°C से अधिक हो गया।
- अनुमान है कि वर्ष 2100 तक वैश्विक आबादी का 70% से अधिक हिस्सा इससे प्रभावित होगा।
बीमा न करने सकने योग्य (UNINSURABLE)भविष्य
- प्राय गंभीर प्रतिकूल मौसम के कारण वर्ष 1970 के दशक के बाद से ही हानि में सात गुना वृद्धि हो रही है, वर्ष 2022 में 313 बिलियन अमेरिकी डॉलर तक की हानि होने की संभावना है।
- जलवायु परिवर्तन के कारण बीमा लागत बढ़ रही है, जिससे इसकी पहुँच कई लोगों के लिये वहनीय नहीं रह गई है।
- कुछ बीमाकर्ता अधिक जोखिम वाले क्षेत्रों को बीमा योग्यता श्रेणी से बाहर कर रहे हैं, जिसके परिणामस्वरूप क्षेत्रों को बीमा के लिये अयोग्य घोषित किया जा रहा है।
- उदाहरण के लिये, ऑस्ट्रेलिया में बाढ़ के बढ़ते जोखिम के कारण वर्ष 2030 तक लगभग 520,940 परिवार बीमा योग्यता श्रेणी से बाहर हो गए हैं।
