आर्कटिक क्षेत्र की राजधानी और उत्तरी समुद्री मार्ग (एनएसआर) का शुरुआती बिंदु कहे जाने वाले मरमंस्क में कार्गो यातायात में भारतीय भागीदारी की बढ़ती प्रवृत्ति देखी जा रही है।2023 के पहले सात महीनों में भारत को मरमंस्क बंदरगाह द्वारा संचालित आठ मिलियन टन कार्गो में से 35% का बड़ा हिस्सा मिला यह मॉस्को से लगभग 2,000 किमी उत्तर-पश्चिम में स्थित है।भारत कई कारणों से एनएसआर के संबंध में अधिक रुचि दिखा रहा है।
उत्तरी समुद्री मार्ग (NSR)
- यूरोप और एशिया-प्रशांत क्षेत्र के देशों के बीच माल परिवहन के लिये NSR सबसे छोटा शिपिंग मार्ग है, जो आर्कटिक महासागर के चार समुद्रों (बैरेंट्स, कारा, लापतेव और पूर्वी साइबेरियाई सागर) तक फैला हुआ है।
- 5,600 किमी. के क्षेत्र में फैला हुआ यह मार्ग बैरेंट्स और कारा समुद्र (कारा जलसंधि) के बीच की सीमा से शुरू होता है तथा बेरिंग जलसंधि (प्रोविडेनिया खाड़ी) में जा कर रुकता है।
- यह स्वेज़ अथवा पनामा नहरों के माध्यम से पारंपरिक मार्गों की तुलना में 50% तक की संभावित दूरी को कम करता है।
- वर्ष 2021 में स्वेज़ नहर के अवरुद्ध होने की घटना ने वैकल्पिक व्यापार मार्ग के रूप में NSR के विकास के विचार को गति प्रदान की है।
भारत के लिये आर्कटिक का महत्त्व
अप्रयुक्त हाइड्रोकार्बन भंडार
- यह क्षेत्र पृथ्वी पर शेष हाइड्रोकार्बन के लिये सबसे बड़ा अज्ञात संभावित क्षेत्र है। अनुमान है कि इस क्षेत्र में तेल और गैस के मौजूदा वैश्विक भंडार का 40% से अधिक हो सकता है।
- इस क्षेत्र में कोयला, जिप्सम तथा हीरे के समृद्ध भंडार हैं और जस्ता, सीसा, प्लसर सोना तथा क्वार्ट्ज के भी पर्याप्त भंडार हैं।
- अतः आर्कटिक संभावित रूप से भारत की ऊर्जा सुरक्षा ज़रूरतों और रणनीतिक तथा दुर्लभ पृथ्वी खनिजों की कमी को संबोधित कर सकता है।
- हालाँकि सरकार की वर्ष 2022 की आर्कटिक नीति में उल्लेख किया गया है कि क्षेत्र के आर्थिक विकास के लिये देश का दृष्टिकोण संयुक्त राष्ट्र सतत् विकास लक्ष्यों द्वारा निर्देशित है।
भारत की ऐतिहासिक भागीदारी
- आर्कटिक के साथ भारत का जुड़ाव वर्ष 1920 में स्वालबार्ड संधि पर हस्ताक्षर करने के समय से है।
- भारत ने इस क्षेत्र में वायुमंडलीय, जैविक, समुद्री, जल विज्ञान और हिमनद विज्ञान संबंधी अध्ययनों पर ध्यान केंद्रित करते हुए विभिन्न वैज्ञानिक अध्ययन और अनुसंधान किये हैं।
- हिमाद्रि अनुसंधान स्टेशन, मल्टी-सेंसर मूर्ड वेधशाला और उत्तरी वायुमंडलीय प्रयोगशाला जैसी पहल आर्कटिक अनुसंधान के प्रति भारत की प्रतिबद्धता को दर्शाती हैं।
- वर्ष 2013 में आर्कटिक परिषद का पर्यवेक्षक-राज्य बनने से भारत की आर्कटिक उपस्थिति मज़बूत हुई।
भौगोलिक महत्त्व
- आर्कटिक दुनिया की समुद्री धाराओं को प्रसारित करने, ठंडे और गर्म पानी को दुनिया भर में ले जाने में सहायता करता है।
- इसके अलावा आर्कटिक समुद्री बर्फ ग्रह के शीर्ष पर एक विशाल सफेद परावर्तक के रूप में कार्य करता है, जो सूर्य की कुछ किरणों को वापस अंतरिक्ष में भेजता है, जिससे पृथ्वी को एक समान तापमान पर रखने में सहायता मिलती है।
पर्यावरणीय महत्त्व
- आर्कटिक और हिमालय हालाँकि भौगोलिक रूप से दूर हैं, आपस में जुड़े हुए हैं और समान चिंताएँ साझा करते हैं।
- आर्कटिक का पिघलना वैज्ञानिक समुदाय को हिमालय में हिमनदों के पिघलने को बेहतर ढंग से समझने में मदद कर रहा है, जिसे अक्सर ‘तीसरा ध्रुव’ कहा जाता है तथा उत्तरी एवं दक्षिणी ध्रुवों के बाद इसमें सबसे बड़ा मीठे पानी का भंडार है।
- इसलिये आर्कटिक का अध्ययन भारतीय वैज्ञानिकों के लिये महत्त्वपूर्ण है। इसी क्रम में भारत ने वर्ष 2007 में आर्कटिक महासागर में अपना पहला वैज्ञानिक अभियान शुरू किया तथा स्वालबार्ड द्वीप समूह (Svalbard archipelago,Norway) में हिमाद्री अनुसंधान आधार खोला और तब से सक्रिय रूप से वहाँ अनुसंधान में प्रयासरत है।
