पारिस्थितिकीविदों ने कृषि वानिकी प्रथाओं के प्रति उनकी प्रतिक्रिया की जांच करने के लिए पश्चिमी घाट में उभयचरों का अध्ययन किया। जबकि कुछ स्थानिक मेंढकों को नुकसान का सामना करना पड़ता है, अन्य संशोधित आवासों के अनुकूल हो जाते हैं। दक्षिण एशिया में पाया जाने वाला एक रात्रिचर मेंढक माइक्रोहाइला निलफामेरीन्सिस सबसे प्रमुख है । मेंढक, जो महत्वपूर्ण जैव संकेतक हैं, आवास की कमी, जलवायु परिवर्तन और बीमारी से खतरों का सामना करते हैं, जिसके कारण संरक्षण प्रयासों की आवश्यकता होती है।
अध्ययन के मुख्य निष्कर्ष
- कृषि विस्तार का प्रभाव: बागानों और चावल के खेतों की वृद्धि से मेंढकों की आबादी के लिये खतरा पैदा हो गया है; काजू और आम के बागानों में मेंढकों की संख्या सबसे कम है, जबकि धान के खेतों में विविधता न्यून है।
- दुर्लभ मेंढक प्रजातियों में कमी: CEPF बुरोइंग मेंढक (मिनरवेरा सेप्फी) और गोवा फेजेरवेरा (मिनरवेरा गोमांतकी) जैसी दुर्लभ प्रजातियाँ, परिवर्तित कृषि आवासों में दुर्लभ थीं।
- वैश्विक और स्थानीय उभयचरों में गिरावट: विश्व भर में लगभग 40.7% (8,011 प्रजातियाँ) उभयचरों को आवास क्षति, प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन और चिट्रिडिओमाइकोसिस जैसी बीमारियों के कारण संकटग्रस्त माना गया है।
- पश्चिमी घाट, जो 252 उभयचर प्रजातियों (226 मेंढक) के साथ एक जैवविविधता हॉटस्पॉट है, आवास क्षति और मेंढक आबादी में गिरावट का सामना कर रहा है।
गिरावट के कारण
- माइक्रो हैबिटेट की क्षति: रॉक पूल जैसे महत्त्वपूर्ण माइक्रो हैबिटेट आवास, जो सूखे के दौरान मेंढक के अंडों और टैडपोल की रक्षा करते हैं, कृषि पद्धतियों के कारण खतरे में पड़ रहे हैं।
- आर्द्रभूमि का विनाश: कृषि और शहरी विस्तार मेंढक प्रजनन के लिये महत्त्वपूर्ण आर्द्रभूमियों को नुकसान पहुँचा रहा है।
- कृषि अपवाह: कीटनाशकों और उर्वरकों के साथ कृषि अपवाह जल की गुणवत्ता को नुकसान पहुँचाता है, जिससे संवेदनशील मेंढक आबादी खतरे में पड़ जाती है।
- जलवायु परिवर्तन: मेंढकों की सूक्ष्म पर्यावरणीय परिवर्तनों के प्रति संवेदनशीलता उन्हें जलवायु परिवर्तन और मानवीय व्यवधानों के प्रति संवेदनशील बनाती है।
| भारतीय समुदायों में मेंढकों का सांस्कृतिक महत्त्व है, जो वर्षा और उर्वरता का प्रतीक है। उदाहरण असम में भेकुली बिया (मेंढक विवाह) की प्रथा वर्षा को आमंत्रित करने के साधन के रूप में प्रचलित है। दक्षिण भारत में, मेंढक विवाह को मण्डूक परिणय के नाम से जाना जाता है, जिसमें वर्षा के लिये प्रार्थना की जाती है।उत्तर प्रदेश में सोनभद्र, गोरखपुर और वाराणसी जैसी जगहों पर मेंढक विवाह की प्रथा है।केरल की नादुकानी-मूलमट्टम-कुलमावु जनजातियाँ मानसून के दौरान भोजन के लिये पिगनोज़ पर्पल फ्रॉग का पालन करती हैं। |
कृषि विस्तार जैवविविधता को कैसे नुकसान पहुँचाता है
- वनों की कटाई: वनों को कृषि भूमि में परिवर्तित करना आवासीय क्षति का प्रमुख कारण है।
- वर्ष 1990 के बाद से विश्व भर में प्राथमिक वन के क्षेत्रफल में 80 मिलियन हेक्टेयर की कमी दर्ज की गई है, जिसके परिणामस्वरूप आवास विनाश, विखंडन और अंततः विलुप्ति हुई है।
- आवास विनाश: वर्ष 1962 और वर्ष 2017 के बीच, वैश्विक स्तर पर लगभग 340 मिलियन हेक्टेयर कृषि भूमि और 470 मिलियन हेक्टेयर प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र को चारागाह में परिवर्तित कर दिया गया, जिससे महत्त्वपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्रों का विनाश हुआ।
- मोनोकल्चर: पशुपालन, सोया और ताड़ के तेल की कृषि जैसी बड़े पैमाने की कृषि पद्धतियों वाले विविध पारिस्थितिक तंत्रों की जगह मोनोकल्चर को महत्त्व दिया गया है।
- रसायनों का अत्यधिक उपयोग: औद्योगिक कृषि पद्धतियाँ, विशेषकर कीटनाशकों, उर्वरकों और रसायनों का अत्यधिक उपयोग भूजल और जल प्रणालियों को प्रदूषित करता है, जिससे जलीय एवं स्थलीय दोनों प्रजातियाँ प्रभावित होती हैं।
- निम्न कार्बन भंडारण: कृषि भूमि में मूल वनों या वनस्पतियों की तुलना में निम्न कार्बन का भंडारण है।भूमि-उपयोग में परिवर्तन से दीर्घावधि में 17 गीगाटन CO2 उत्सर्जित हो सकती है, जिससे जलवायु संकट और अधिक गंभीर हो सकता है तथा पारिस्थितिकी तंत्र में व्यवधान उत्पन्न होने से जैवविविधता को खतरा हो सकता है।
- विलुप्त होने का खतरा: IUCN द्वारा संकटग्रस्त के रूप में पहचानी गई 25,000 प्रजातियों में से लगभग 13,382 प्रजातियाँ मुख्य रूप से कृषि भूमि के क्षरण के कारण खतरे में हैं।
- इसके अतिरिक्त, लगभग 3,019 प्रजातियाँ शिकार और मत्स्य संग्रहण तथा 3,020 प्रजातियाँ खाद्य प्रणाली से होने वाले प्रदूषण से प्रभावित होती हैं।
- प्रजातियों का पृथक्करण: अंतःप्रजनन, संसाधनों की कमी और सीमित गतिशीलता के परिणामस्वरूप, कृषि विस्तार से आवास खंडित हो जाते हैं, पारिस्थितिकी तंत्र प्रभावित होते हैं, साथ ही प्रजातियों के विलुप्त होने का खतरा बढ़ जाता है।
