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संयुक्‍त राष्‍ट्र मरुस्‍थलीकरण रोकथाम अभिसमय के पक्षकारों का 16वाँ सम्मेलन सऊदी अरब के रियाद में आयोजित हुआ, जिसमें लगभग 200 देशों ने भूमि पुनरुद्धार तथा सूखा प्रतिरोधक क्षमता को प्राथमिकता देने की प्रतिबद्धता व्यक्त की। पहली बार UNCCD COP का आयोजन मध्य पूर्व एवं उत्तरी अफ्रीका (MENA) क्षेत्र में हुआ।

UNCCD COP16 के प्रमुख परिणाम

  • वैश्विक सूखा फ्रेमवर्क: इसमें वैश्विक सूखा फ्रेमवर्क की दिशा में राष्ट्रों के प्रयासों पर प्रकाश डाला गया तथा मंगोलिया में वर्ष 2026 में होने वाले COP17 तक इन्हें पूरा करने का लक्ष्य रखा गया।
  • वित्तीय प्रतिज्ञाएँ: मरुस्थलीकरण, भूमि क्षरण एवं सूखे से निपटने के क्रम में 12 बिलियन अमेरिकी डॉलर से अधिक की धनराशि देने का संकल्प लिया गया।
  • रियाद ग्लोबल ड्राट रेज़िलियेंस पार्टनरशिप: इसमें 80 कमज़ोर देशों को सहायता देने के क्रम में 12.15 बिलियन अमेरिकी डॉलर की प्रतिबद्धता व्यक्त  की गई, जिसमें अरब समन्वय समूह के 10 बिलियन अमेरिकी डॉलर शामिल हैं।
  • ग्रेट ग्रीन वॉल (GGW) पहल: अफ्रीका के नेतृत्व वाली GGW पहल के तहत साहेल परिदृश्य के पुनरुद्धार हेतु इटली से 11 मिलियन यूरो तथा 22 अफ्रीकी देशों के बीच समन्वय बढ़ाने के लिये ऑस्ट्रिया से 3.6 मिलियन यूरो प्राप्त करने पर प्रकाश डाला गया।अनुकूलित फसलों और मृदाओं के लिये विज़न (VACS): VACS पहल के लिये  लगभग 70 मिलियन अमेरिकी डॉलर की घोषणा की गई।VACS का लक्ष्य स्वस्थ मृदा में विविध, पौष्टिक तथा जलवायु-अनुकूलित फसलों के साथ अनुकूल खाद्य प्रणालियों का विकास करना है।
  • स्थानीय लोग और स्थानीय समुदाय: स्थानीय लोगों एवं स्थानीय समुदायों के लिये कॉकस का गठन किया गया ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि उनके दृष्टिकोण तथा चुनौतियों का प्रतिनिधित्व किया जा सके।
  • स्थानीय लोगों के फोरम में प्रस्तुत पवित्र भूमि घोषणा, वैश्विक भूमि एवं सूखा प्रबंधन में अधिक भागीदारी पर केंद्रित है।
  • Business4Land पहल: यह मरुस्थलीकरण, भूमि क्षरण एवं सूखे (DLDD) संबंधी चुनौतियों से निपटने के क्रम में निजी क्षेत्र के प्रयास, पर्यावरण, सामाजिक तथा शासन (ESG) रणनीतियों सहित धारणीय वित्त की भूमिका पर प्रकाश डालने पर केंद्रित है।भूमि पुनर्स्थापन तथा सूखा रोकथाम हेतु वर्तमान में निजी क्षेत्र की वित्तपोषण में केवल 6% की भागीदारी है।
  • UNCCD का विज्ञान-नीति इंटरफेस (SPI): सभी पक्षों ने UNCCD के SPI को जारी रखने पर सहमति (जिसकी स्थापना वर्ष 2013 में COP11 (विंडहोक, नामीबिया) में की गई थी) व्यक्त की ताकि वैज्ञानिक निष्कर्षों को निर्णयकर्त्ताओं हेतु सिफारिशों के रूप में उपयोग किया जा सके।

संयुक्‍त राष्‍ट्र मरुस्‍थलीकरण रोकथाम अभिसमय

  • UNCCD तीन रियो सम्मेलनों में से एक है, जिसमें जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क अभिसमय (UNFCCC) और जैवविविधता पर अभिसमय शामिल हैं।
  • उद्देश्य और महत्त्व: UNCCD की स्थापना वर्ष 1994 में भूमि की रक्षा और पुनर्स्थापना के लिये की गई थी, जिसका उद्देश्य एक स्थायी भविष्य बनाना था।
  • इसमें फसल की क्षति, पलायन और संघर्ष सहित भूमि क्षरण तथा सूखे के परिणामों पर चर्चा की गई है।
  • उद्देश्य: इसका मुख्य लक्ष्य भूमि क्षरण को कम करना और भूमि की रक्षा करना है ताकि सभी लोगों के लिये भोजन, जल, आश्रय तथा आर्थिक अवसरों तक पहुँच सुनिश्चित हो सके।
  • कानूनी रूप से बाध्यकारी ढाँचा: यह मरुस्थलीकरण और सूखे से निपटने के लिये एकमात्र कानूनी रूप से बाध्यकारी अंतर्राष्ट्रीय समझौता है।
  • सदस्यता: इस सम्मेलन में 197 पक्षकार हैं, जिनमें 196 देश और यूरोपीय संघ शामिल हैं।
  • सिद्धांत: यह भागीदारी, साझेदारी और विकेंद्रीकरण के सिद्धांतों पर काम करता है।

इंटरनेशनल ड्रॉट रेज़िलियेंस ऑब्जर्वेटरी

  • इंटरनेशनल ड्रॉट रेज़िलियेंस ऑब्जर्वेटरी (IRDO) पहला वैश्विक AI-संचालित मंच है जो देशों को गंभीर सूखे से निपटने के लिये उनकी क्षमता का आकलन करने और उसे बढ़ाने में मदद करता है।
  • यह नवोन्मेषी उपकरण इंटरनेशनल ड्रॉट रेज़िलियेंस एलायंस (IDRA) की एक पहल है।
  • IDRA एक वैश्विक गठबंधन है जो देशों, शहरों और समुदायों में सूखे से निपटने की क्षमता बढ़ाने के लिये राजनीतिक, तकनीकी एवं वित्तीय पूंजी जुटाने में मदद करता है।
  • इसे स्पेन और सेनेगल द्वारा शर्म अल-शेख में UNFCCC के 27 वें सम्मेलन (COP27) में लॉन्च किया गया था।

मरुस्थलीकरण क्या है और इसकी वर्तमान स्थिति

  • मरुस्थलीकरण: मरुस्थलीकरण भूमि क्षरण का एक प्रकार है, जिसमें पहले से ही अपेक्षाकृत शुष्क भूमि क्षेत्र और अधिक शुष्क हो जाता है, जिससे उत्पादक मृदा क्षीण हो जाती है तथा जल निकायों, जैवविविधता एवं वनस्पति आवरण नष्ट हो जाता है।
  • यह जलवायु परिवर्तन, वनोन्मूलन, अत्यधिक चारण और असंवहनीय कृषि पद्धतियों सहित कई कारकों के संयोजन से प्रेरित है।

वर्तमान स्थिति

  • शुष्क भूमि का विस्तार: UNCCD की रिपोर्ट ‘ द ग्लोबल थ्रेट ऑफ ड्राईंग लैंड्स’ के अनुसार, 1990 के दशक से पृथ्वी की 77.6% भूमि शुष्कता का अनुभव कर रही है।पृथ्वी की स्थलीय सतह (अंटार्कटिका को छोड़कर) का 40.6% भाग शुष्क भूमि है, जो उत्पादक भूमि में तेज़ी से हो रही कमी को दर्शाता है।
  • प्रभावित प्रमुख क्षेत्र: यूरोप (इसकी 95.9% भूमि), ब्राज़ील के कुछ भाग, पश्चिमी संयुक्त राज्य अमेरिका, एशिया और मध्य अफ्रीका में महत्त्वपूर्ण रूप से सूखे की प्रवृत्ति देखी जा रही है।अफ्रीका और एशिया के कुछ भागों में पारिस्थितिकी तंत्र का क्षरण तथा मरुस्थलीकरण हो रहा है, जिससे जैवविविधता को खतरा है।
  • अनुमानित भविष्य का प्रभाव: अनुमानों से पता चलता है कि, सबसे खराब स्थिति में, सदी के अंत तक 5 अरब लोग शुष्क भूमि पर रह सकते हैं और उन्हें मृदा के क्षरण, जल की कमी तथा पारिस्थितिकी तंत्र के पतन जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।

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