भारतीय अर्थव्यवस्था और कृषि क्षेत्र में वर्ष 2019-20 से वर्ष 2023-24 तक क्रमशः 4.6% और 4.2% की औसत वार्षिक दर से वृद्धि हुई है, लेकिन इसके अनुरूप ग्रामीण मजदूरी में वृद्धि नहीं हुई है।
ग्रामीण मजदूरी की वर्तमान स्थिति
- नॉमिनल वेज: अप्रैल 2019 से अगस्त 2024 तक ग्रामीण मजदूरी 5.2% की औसत वार्षिक नॉमिनल दर (मुद्रास्फीति के समायोजन के बिना वास्तविक राशि) से बढ़ी है।विशेष रूप से कृषि मजदूरी में (नॉमिनल वृद्धि 5.8% के रूप में थोड़ी अधिक थी) जो कृषि में मज़बूत मांग या श्रम गतिशीलता का संकेतक है।
- वास्तविक मजदूरी: अप्रैल 2019 से अगस्त 2024 तक ग्रामीण श्रमिकों की वास्तविक मजदूरी वृद्धि (मुद्रास्फीति के अनुरूप समायोजित मजदूरी) कुल मिलाकर -0.4% तक नकारात्मक थी जबकि कृषि मजदूरी में मामूली 0.2% की वृद्धि दर्ज की गई।इससे पता चलता है कि यद्यपि मजदूरी में निरपेक्ष रूप से वृद्धि हुई है लेकिन मुद्रास्फीति इन लाभों से अधिक रहने से ग्रामीण श्रमिकों की वास्तविक क्रय शक्ति में कमी आई है।
- वर्तमान राजकोषीय रुझान: वित्तीय वर्ष 2023-24 (अप्रैल-अगस्त) के पहले पाँच महीनों में कृषि मजदूरी की नॉमिनल और वास्तविक वृद्धि दर क्रमशः 5.7% और 0.7% थी।
| डेटा स्रोत: श्रम ब्यूरो द्वारा 25 कृषि और गैर-कृषि व्यवसायों के संदर्भ में दैनिक मजदूरी दर डेटा संकलित किया गया है। कवरेज: यह डेटा 20 राज्यों के 600 गाँवों से एकत्र किया गया है। शामिल किये गए व्यवसाय: बागवानी, पशुपालन, सिंचाई और पौध संरक्षण कार्यों सहित 25 विभिन्न व्यवसाय। कार्यप्रणाली: मजदूरी को नॉमिनल (वर्तमान मूल्य) और वास्तविक रूप में (ग्रामीण भारत के लिये उपभोक्ता मूल्य सूचकांक पर आधारित मुद्रास्फीति हेतु समायोजित) मापा जाता है। |
ग्रामीण मजदूरी में स्थिरता
- महिला LFPR का उच्च होना: महिलाओं की श्रम बल भागीदारी दर (LFPR) में वर्ष 2018-19 के 26.4% से वर्ष 2023-24 में 47.6% तक की पर्याप्त वृद्धि देखी गई है।ग्रामीण क्षेत्रों में महिला श्रम शक्ति में वृद्धि का तात्पर्य है कि यह अधिक संख्या में समान या उससे भी कम मजदूरी दर पर कार्य करने को तैयार हैं, जिससे मजदूरी पर दबाव बढ़ रहा है।
- कम कृषि उत्पादकता: कृषि (विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में) में आमतौर पर कम सीमांत उत्पादकता बनी हुई है। अतिरिक्त श्रम से उत्पादकता में आनुपातिक वृद्धि नहीं हो पाती है।
- पूंजी-गहन प्रौद्योगिकी: विभिन्न उद्योगों में तकनीकी प्रगति से मैनुअल श्रम का विस्थापन हो रहा है, जिससे ग्रामीण क्षेत्र में गैर-कृषि नौकरियों की मांग कम हो रही है। उदाहरण के लिये, मैनुअल मजदूरों के बजाय थ्रेसिंग मशीनों और हार्वेस्टर का उपयोग।इस बदलाव के परिणामस्वरूप पूंजीपतियों को अधिक लाभ होता है लेकिन वेतन वृद्धि और रोज़गार सृजन सीमित हो जाता है।
- गैर-कृषि श्रम मांग में गिरावट: फास्ट मूविंग कंज़्यूमर गुड्स (FMCG) और घरेलू उपकरणों जैसे श्रम-प्रधान उद्योगों की बिक्री और लाभप्रदता धीमी होने से ग्रामीण मजदूरी में वृद्धि धीमी हो रही है।विनिर्माण और सेवा जैसे क्षेत्रों (जिनकी आमतौर पर ग्रामीण श्रम को संलग्न करने में प्रमुख हिस्सेदारी है) का सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि के अनुपात में विस्तार नहीं हुआ है।
- गैर-कृषि क्षेत्र में सीमित अवसर: लघु उद्योग, कुटीर उद्योग और ग्रामीण उद्यम (जिनमें गैर-कृषि रोज़गार सृजित हो सकते हैं) अविकसित हैं या उनमें आवश्यक समर्थन और वित्तपोषण का अभाव है।
- वेतन गारंटी कार्यक्रमों का अप्रभावी होना: भुगतान में देरी, बजट की कमी और मनरेगा के कार्यान्वयन में भ्रष्टाचार जैसे मुद्दे ऐसे कार्यक्रमों की प्रभावशीलता को सीमित करते हैं।
- मुद्रास्फीति: बढ़ती मुद्रास्फीति से वास्तविक मजदूरी में कमी आती है क्योंकि नॉमिनल मजदूरी स्थिर रहती है या धीमी गति से बढ़ती है। आवश्यक वस्तुओं, ईंधन और अन्य वस्तुओं की कीमतों में होने वाली वृद्धि मजदूरी में होने वाली वृद्धि से कहीं अधिक है।
- जलवायु परिवर्तन: सूखा और बाढ़ जैसी बार-बार होने वाली जलवायु समस्याएँ कृषि आय को सीमित करती हैं, भूस्वामियों की उच्च मजदूरी देने की क्षमता को सीमित करती हैं जिससे ग्रामीण श्रम बाज़ार में मजदूरी में अस्थिरता पैदा होती है।
ग्रामीण मजदूरी की स्थिरता के क्या निहितार्थ हैं
- कमज़ोर घरेलू मांग: भारत की अधिकांश जनसंख्या ग्रामीण क्षेत्रों में रहती है। इनकी सीमित व्यय क्षमता के कारण वस्तुओं की मांग कम होने से उनकी व्यवहार्यता प्रभावित होगी तथा आर्थिक विकास चक्र धीमा हो जाएगा।
- वित्तीय भेद्यता और ऋण: उच्च मुद्रास्फीति और स्थिर मजदूरी से ग्रामीण परिवार ऋण जाल में फँस जाते हैं जिससे इनकी प्रयोज्य आय कम होने के साथ इनकी अनौपचारिक उधारदाताओं पर निर्भरता बढ़ जाती है।
- अल्प-बेरोज़गारी: गैर-कृषि क्षेत्र में रोज़गार के अवसर कम होने और मजदूरी स्थिर होने से अनेक ग्रामीण श्रमिकों को कृषि में वापस आने के लिये बाध्य (भले ही यह लाभदायक न हो) होना पड़ रहा है।
- लैंगिक वेतन असमानता: ग्रामीण क्षेत्रों में वेतन की स्थिरता से पुरुषों और महिलाओं दोनों पर प्रभाव पड़ता है लेकिन समान कार्य के लिये महिलाओं को पुरुषों की तुलना में कम वेतन मिलता है, इसलिये स्थिर वेतन का प्रभाव ग्रामीण महिलाओं पर विशेष रूप से अधिक होता है।
- पलायन की मज़बूरी: कम मजदूरी और सीमित नौकरी के अवसर से ग्रामीण श्रमिक बेहतर वेतन वाली नौकरियों की तलाश में शहरों की ओर पलायन करने के लिये मजबूर होते हैं, जिससे शहरी क्षेत्रों में भीड़भाड़ बढ़ जाने से शहरी बुनियादी ढाँचे, आवास एवं सार्वजनिक सेवाओं पर दबाव पड़ता है।
- सीमित मानव पूंजी: कम मजदूरी के कारण गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य देखभाल, शिक्षा और पोषण तक पहुँच सीमित हो जाती है, जिसके परिणामस्वरूप ग्रामीण विकास पर दीर्घकालिक प्रभाव पड़ता है।
