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नेचर जर्नल में प्रकाशित एक अध्ययन यह बताता है कि वैश्विक स्तर पर प्लास्टिक प्रदूषण में भारत का योगदान सबसे अधिक है। इस अध्ययन के अनुसार, विश्वभर में उत्पन्न कुल प्लास्टिक अपशिष्ट का लगभग 20 प्रतिशत (या एक-पाँचवाँ हिस्सा) भारत में उत्पन्न होता है। भारत हर साल लगभग 5.8 मिलियन टन (इलेक्ट्रिक) प्लास्टिक जलाता हैऔर 3.5 प्लास्टिक प्लास्टिक को पर्यावरण (भूमि, वायु, जल) के रूप में छोड़ा जाता है। कुल मिलाकर, भारत वर्षगाँठ दुनिया में 9.3 डीआईवाई प्लास्टिक प्लास्टिक में योगदान देता है, जो इस सूची में अन्य देशों – नाइजीरिया (3.5 डीआईवाई), इंडोनेशिया (3.4 डीआईवाई) और चीन (2.8 डीआईवाई) की तुलना में काफी अधिक है ।

भारत में उच्च प्लास्टिक प्रदूषण के मुख्य कारण

भारत में उच्च प्लास्टिक प्रदूषण के मुख्य कारण निम्नलिखित हैं

  • खुले में प्लास्टिक अपशिष्ट का दहन : भारत में हर साल लगभग 5.8 मिलियन टन प्लास्टिक अपशिष्ट/ कचरा को खुले में जलाया जाता है, जिससे प्रदूषण और विषैले पदार्थ उत्सर्जित होते हैं, जो मानव स्वास्थ्य और पर्यावरण दोनों ही दृष्टिकोण से हानिकारक हैं।
  • तेजी से बढ़ती जनसंख्या और शहरीकरण : भारत में जनसंख्या और शहरीकरण के तेज विकास के कारण प्लास्टिक की खपत और अपशिष्ट उत्पादन में भी बढ़ोतरी हो रही है। इससे प्लास्टिक उत्पादों और पैकेजिंग की मांग में वृद्धि हो रही है, जिससे प्रदूषण की समस्या बढ़ रही है।
  • अपशिष्ट संग्रहण आँकड़ों में विसंगतियाँ : सरकारी आंकड़े बताते हैं कि 95% अपशिष्ट का संग्रहण होता है, जबकि शोध से पता चलता है कि वास्तविक संग्रहण दर लगभग 81% है। इससे भारत में प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन की दक्षता में बड़े अंतर का पता चलता है।
  • अपर्याप्त अपशिष्ट प्रबंधन अवसंरचना : भारत का प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन अवसंरचना अपशिष्ट की बड़ी मात्रा के प्रबंधन के लिये अपर्याप्त है, जिसमें सैनिटरी लैंडफिल की तुलना में अनियंत्रित डम्पिंग स्थल अधिक हैं, जो निम्न स्तरीय निपटान उपायों और प्रथाओं को दर्शाता है।
  • अपशिष्ट संग्रहण आँकड़ों में विसंगतियाँ : भारत की आधिकारिक अपशिष्ट संग्रहण दर 95% बताई गई है, जबकि शोध से पता चलता है कि वास्तविक दर लगभग 81% है, जिससे प्रबंधन दक्षता में बहुत बड़े अंतर का पता चलता है।
  • अनौपचारिक क्षेत्र पुनर्चक्रण : भारत में बहुत सारा प्लास्टिक कचरा अनौपचारिक क्षेत्र में पुनर्चक्रित किया जाता है, जिसका आधिकारिक आंकड़ों में उल्लेख ही नहीं होता है। इससे भारत में प्लास्टिक प्रदूषण से संबंधित आंकड़ों का सही आकलन करना मुश्किल हो जाता है।

भारत में प्लास्टिक अपशिष्ट के प्रबंधन से जुड़े मुख्य मुद्दे

भारत में प्लास्टिक अपशिष्ट के प्रबंधन से संबंधित मुख्य मुद्दे निम्नलिखित हैं

पर्यावरणीय प्रभाव

  • जलमार्गों की अवरुद्धता : प्लास्टिक अपशिष्ट जलमार्गों को अवरुद्ध करता है, जिससे बाढ़ की स्थिति उत्पन्न होती है और समुद्री प्रदूषण बढ़ता है। इससे समुद्री जीवन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है और प्लास्टिक जल में घुलकर समुद्री जीवन को हानि पहुँचाता है।
  • वायु प्रदूषण और श्वसन स्वास्थ्य को प्रभावित करना : प्लास्टिक का दहन जहरीले प्रदूषकों को मुक्त करता है, जो वायु की गुणवत्ता को खराब करता है और श्वसन स्वास्थ्य को प्रभावित करता है।

सार्वजनिक स्वास्थ्य

  • माइक्रोप्लास्टिक्स का जोखिम : जल और खाद्य पदार्थों में माइक्रोप्लास्टिक्स का प्रवेश दीर्घकालिक स्वास्थ्य समस्याएँ उत्पन्न कर सकता है, जिससे मानव स्वास्थ्य के प्रति खतरा बढ़ता है।
  • रोगवाहकों का प्रसार : प्लास्टिक अपशिष्ट रोगवाहकों के प्रजनन के लिए आदर्श वातावरण प्रदान करता है, जिससे डेंगू और मलेरिया जैसी बीमारियाँ फैलने की संभावना बढ़ जाती है।

आर्थिक चुनौतियाँ

  • वित्तीय नुकसान : FICCI की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत को वर्ष 2030 तक प्लास्टिक पैकेजिंग में प्रयुक्त 133 बिलियन अमेरिकी डॉलर से अधिक मूल्य की सामग्री का नुकसान हो सकता है।
  • ई-कॉमर्स और पैकेजिंग अपशिष्ट : ई-कॉमर्स के द्रुत गति से विकास होने के कारण प्लास्टिक पैकेजिंग अपशिष्ट में वृद्धि हुई है, जिनमें से अधिकांश को पुनर्चक्रित करना कठिन है।

विनियामक और प्रवर्तन चुनौतियाँ

  • असंगत प्रवर्तन : प्लास्टिक अपशिष्ट विनियमों का असंगत प्रवर्तन और विस्तारित निर्माता ज़िम्मेदारी प्रणाली से संबंधित मुद्दे अपशिष्ट के प्रभावी प्रबंधन में बाधा डालते हैं।
  • वैश्विक योगदान : भारत वैश्विक प्लास्टिक अपशिष्ट में सबसे अधिक योगदान देने वाले देशों में से एक प्रमुख देश है।

कृषि में माइक्रोप्लास्टिक प्रदूषण

  • मृदा स्वास्थ्य पर प्रभाव : कृषि में प्लास्टिक के प्रयोग और अपर्याप्त अपशिष्ट जल शोधन के कारण मृदा में माइक्रोप्लास्टिक संचित हो जाता है, जिससे मृदा स्वास्थ्य एवं खाद्य सुरक्षा प्रभावित होती है।

तकनीकी और बुनियादी ढाँचा की कमी

  • अपर्याप्त सुविधाएँ : अपशिष्ट पृथक्करण और प्रसंस्करण सुविधाओं की कमी और उन्नत रीसाइक्लिंग तकनीक की कमी प्रभावी प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन में बाधा डालती है। अपशिष्ट ट्रैकिंग की व्यापक कमी भी प्रबंधन प्रयासों को जटिल बनाती है। इन समस्याओं के प्रभावी समाधान के लिए समग्र दृष्टिकोण, मजबूत विनियामक ढाँचा और तकनीकी नवाचार की आवश्यकता है।

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