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लुईस मॉडल चीन के लिये सफल साबित हुआ है हालाँकि कृषि से औद्योगीकरण में संक्रमण के दौरान चुनौतियों का सामना करने के कारण भारत इसके कार्यान्वयन से जूझ रहा है। इसके अतिरिक्त उच्च  पूंजी तीव्रता की ओर विनिर्माण रुझान के कारण भारत प्रतिक्रिया में ‘फार्म-एज़-फैक्टरी’ श्रम मॉडल में स्थानांतरित होने पर विचार कर रहा है।

लुईस मॉडल

  • वर्ष 1954 में अर्थशास्त्री विलियम आर्थर लुईस ने “श्रम की असीमित आपूर्ति के साथ आर्थिक विकास” को प्रस्तावित किया।
  • इस कार्य के लिये लुईस को वर्ष 1979 में अर्थशास्त्र में नोबेल पुरस्कार मिला।
  • मॉडल के सार ने सुझाव दिया कि कृषि में अतरिक्त श्रम को विनिर्माण क्षेत्र में पुनर्निर्देशित किया जा सकता है, इसके लिये श्रमिकों को कृषि क्षेत्र से दूर आकर्षित करने के लिये पर्याप्त मज़दूरी का प्रस्ताव देना आवश्यक है।
  • यह बदलाव, सैद्धांतिक रूप से, औद्योगिक विकास को उत्प्रेरित करेगा, उत्पादकता बढ़ाएगा और आर्थिक विकास को बढ़ावा देगा।

लुईस मॉडल और चीन

  • चीन में इस मॉडल का अनुप्रयोग सफल रहा। चीन ने एक दोहरे ट्रैक दृष्टिकोण का उपयोग किया, जिसने अपनी जनसंख्या लाभ और अधिशेष ग्रामीण श्रम का उपयोग करते हुए, राज्य की योजना के साथ बाज़ार की शक्तियों को जोड़ा।
  • इस रणनीति ने विदेशी निवेश को आकर्षित किया तथा निर्यात एवं घरेलू उद्योगों को बढ़ावा दिया।
  • बुनियादी ढाँचे, शिक्षा और अनुसंधान एवं विकास में व्यापक निवेश ने चीन की उत्पादकता एवं प्रतिस्पर्धात्मकता को बढ़ाया, जिसके परिणामस्वरूप तेज़ी से औद्योगीकरण हुआ, गरीबी में कमी आई और अर्थव्यवस्था में व्यापक बदलाव आया।

लुईस मॉडल और भारत

  • कृषि, जो ऐतिहासिक रूप से भारत के अधिकांश कार्यबल को रोज़गार देती है, ने इस सन्दर्भ में  कमी का अनुभव किया है।
  • अपेक्षाओं के विपरीत, इस बदलाव से मुख्य रूप से विनिर्माण क्षेत्र को लाभ नहीं हुआ है, जिसने रोज़गार के हिस्से में केवल मामूली वृद्धि का अनुभव किया है।
  • विनिर्माण क्षेत्र में रोज़गार वर्ष 2011-12 में अपने उच्चतम स्तर 12.6% से घटकर वर्ष 2022-23 में 11.4% हो गया है।
  • विनिर्माण रोज़गार में कमी मुख्य रूप से सेवाओं और निर्माण में श्रम के बढ़ने की प्रवृत्ति को दर्शाती है, जो अर्थशास्त्री लुईस द्वारा उल्लिखित अपेक्षित संरचनात्मक परिवर्तन के विपरीत है।

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