तमिलनाडु सरकार ने कर्नाटक को अपने जलाशयों से तुरंत 24,000 क्यूबिक फीट प्रति सेकंड (क्यूसेक) पानी छोड़ने के लिए सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप की मांग की।इसने न्यायालय से कर्नाटक को कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण (सीडब्ल्यूडीटी) के फरवरी 2007 के अंतिम फैसले के अनुसार सितंबर 2023 के लिए निर्धारित 36.76 टीएमसी (हजार मिलियन क्यूबिक फीट) की रिहाई सुनिश्चित करने का निर्देश देने का भी आग्रह किया।इसे 2018 में SC द्वारा संशोधित किया गया था।
कावेरी जल विवाद
- एक सावधानीपूर्वक तैयार की गई मासिक अनुसूची कावेरी बेसिन के दो तटवर्ती राज्यों कर्नाटक और तमिलनाडु के बीच जल के वितरण को नियंत्रित करती है।
- कर्नाटक के लिये “सामान्य” जल वर्ष के दौरान जून से मई तक तमिलनाडु को 177.25 हज़ार मिलियन क्यूबिक फीट जल साझा करना अनिवार्य है।
- इस वार्षिक कोटा में जून से सितंबर तक मानसून महीनों के दौरान आवंटित 123.14 हज़ार मिलियन क्यूबिक फीट जल शामिल है।
- मौजूदा दक्षिण-पश्चिम मानसून के मौसम में अक्सर जल विवाद उत्पन्न होता है, विशेषकर जब बारिश उम्मीद से कम होती है।
कावेरी नदी विवाद
- इसे तमिल में ‘पोन्नी’ कहा जाता है और यह दक्षिण भारत की एक पवित्र नदी है।
- यह दक्षिण-पश्चिमी कर्नाटक राज्य के पश्चिमी घाट की ब्रह्मगिरि पहाड़ी से निकलती है, कर्नाटक तथा तमिलनाडु राज्यों से होकर दक्षिण-पूर्व की ओर बहते हुए बड़े झरनों के रूप में पूर्वी घाट से उतरकर पुद्दुचेरी के माध्यम से बंगाल की खाड़ी में गिरती है।
- बाएँ तट की सहायक नदियाँ: अर्कावती, हेमावती, शिमसा और हरंगी।
- दाहिने किनारे की सहायक नदियाँ: लक्ष्मणतीर्थ, सुवर्णवती, नोयिल, भवानी, काबिनी और अमरावती।
कावेरी नदी विवाद का इतिहास
- स्वतंत्रता-पूर्व अवधि- तत्कालीन मद्रास प्रेसीडेंसी के राज्यों और मैसूर राज्य के बीच नदी जल के बंटवारे के संबंध में 1892 और 1924 में दो समझौते हुए थे।
- 1924 का समझौता- कर्नाटक और तमिलनाडु ने 50 वर्षों के लिए प्रभावी समझौते पर हस्ताक्षर किये।
जल बँटवारे का प्रतिशत है
- 75% – तमिलनाडु और पुडुचेरी
- 23% – कर्नाटक
- 2% – केरल
विवाद
- चूँकि कावेरी नदी कर्नाटक से निकलती है, केरल से आने वाली प्रमुख सहायक नदियों के साथ तमिलनाडु से होकर बहती है तथा पुद्दुचेरी के माध्यम से बंगाल की खाड़ी में गिरती है, इसलिये इस विवाद में 3 राज्य और एक केंद्रशासित प्रदेश शामिल हैं।
- यह विवाद 150 वर्ष पुरान है, यह वर्ष 1892 और 1924 में तत्कालीन मद्रास प्रेसीडेंसी तथा मैसूर के बीच मध्यस्थता के दो समझौतों से संबंधित है।
- इसमें निहित है कि किसी भी निर्माण परियोजना, जैसे कावेरी नदी पर जलाशय का निर्माण, के लिये ऊपरी तटवर्ती राज्य को निचले तटवर्ती राज्य की अनुमति लेना अनिवार्य है।
- कर्नाटक और तमिलनाडु के बीच कावेरी जल विवाद 1974 में शुरू हुआ जब कर्नाटक ने तमिलनाडु की सहमति के बिना पानी मोड़ना शुरू कर दिया।
- कई वर्षों के बाद इस मुद्दे को हल करने के लिये वर्ष 1990 में कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण की स्थापना की गई। 17 वर्षों के बाद CWDT ने अंततः वर्ष 2007 में एक अंतिम निर्णय जारी किया जिसमें कावेरी जल को चार तटवर्ती राज्यों के बीच विभाजित करने के बारे में बताया गया। इसमें निर्णय लिया गया कि संकट के वर्षों में जल का बँटवारा आनुपातिक आधार पर किया जाएगा।
- CWDT ने फरवरी 2007 में अपना अंतिम निर्णय जारी किया, जिसमें सामान्य वर्ष में 740 TMC की कुल उपलब्धता पर विचार करते हुए कावेरी बेसिन में चार राज्यों के मध्य जल आवंटन निर्दिष्ट किया गया था।
- चार राज्यों के मध्य जल का आवंटन इस प्रकार है: तमिलनाडु- 404.25 TMC, कर्नाटक- 284.75 TMC, केरल- 30 TMC, और पुडुचेरी- 7 TMC।
- वर्ष 2018 में सर्वोच्च न्यायालय ने कावेरी को राष्ट्रीय संपत्ति घोषित किया, साथ ही बड़े पैमाने पर CWDT द्वारा निर्धारित जल-बँटवारे की व्यवस्था को बरकरार रखा।
- इसने केंद्र को कावेरी प्रबंधन योजना को अधिसूचित करने का भी निर्देश दिया।
- केंद्र सरकार ने जून 2018 में ‘कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण’ और ‘कावेरी जल विनियमन समिति’ का गठन करते हुए ‘कावेरी जल प्रबंधन योजना’ को अधिसूचित किया।
