जॉर्जिया का Racketeer Influenced and Corrupt Organisations(RICO) अधिनियम भारत के मकोका जैसा माफिया विरोधी कानून है, जिसके तहत हाल ही में ट्रम्प पर आरोप लगाया गया है।ट्रम्प पर कई अपराधों के लिए आरोप लगाए गए हैं, जिनमें मुख्य रूप से जालसाजी, गलत बयान देना, एक सार्वजनिक अधिकारी का रूप धारण करना, गवाहों को प्रभावित करना और साजिश शामिल हैं, जिसमें RICO के तहत भी आरोप अभियोग के केंद्र में हैं।
जॉर्जिया रीको/RICO अधिनियम
- वर्ष 1970 में रीको अधिनियम अमेरिकी संघीय कानून का हिस्सा बना।
- यह मूलतः संगठित अपराध, विशेष रूप से माफिया-संबंधित गतिविधियों से निपटने के लिये अभिकल्पित है।
- संघीय कानून के प्रभावी होने के कुछ वर्षों के भीतर राज्यों ने अपना रीको कानून पारित करना शुरू किया।
- वर्ष 1980 में पारित जॉर्जिया का रीको अधिनियम, “रैकेटियरिंग गतिविधि के पैटर्न” के माध्यम से अपराध संबंधी किसी “गतिविधि” में भाग लेना, उस पर नियंत्रण अथवा ऐसा करने की साज़िश करने को गैरकानूनी घोषित करता है।
- जॉर्जिया में रीको अधिनियम के तहत धोखाधड़ी के आरोप में दोषी पाए जाने पर 20 वर्ष तक की जेल हो सकती है।
- कठोर दंड का प्रावधान इस अधिनियम के अनुप्रयोग की गंभीरता को रेखांकित करता है।
महाराष्ट्र संगठित अपराध नियंत्रण अधिनियम, 1999
- इसे महाराष्ट्र में संगठित आपराधिक गतिविधियों से निपटने के लिये पेश किया गया था।
- यह अधिनियम केवल महाराष्ट्र राज्य तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली राज्य पर भी लागू होता है।
- इस अधिनियम के तहत प्रत्येक अपराध एक संज्ञेय अपराध है।
- इस अधिनियम के तहत दंडनीय प्रत्येक अपराध की सुनवाई केवल इस अधिनियम के तहत गठित विशेष न्यायालय द्वारा की जाएगी।
- यह अधिनियम शक्ति के दुरुपयोग, कानून सम्मत कार्य करने में विफल होने की स्थिति के लिये सख्त प्रावधान करता है, दोषी पाए गए व्यक्ति को तीन वर्ष तक का कारावास हो सकता है या उस पर ज़ुर्माना लगाया जा सकता है।
संगठित अपराध
- आर्थिक अथवा अन्य लाभ के इरादे से किसी गिरोह या सिंडिकेट के सदस्यों द्वारा संयुक्त रूप से या अलग-अलग किये गए कृत्य को संगठित आपराधिक गतिविधियों के रूप में जाना जाता है।
- संगठित अपराध के प्रकार: संगठित गिरोह अपराध, रैकेटियरिंग, सिंडिकेट अपराध, तस्करी आदि।
- वे ऐसा कानून प्रवर्तन और विनियमों में व्याप्त कमियों का लाभ उठाकर करते हैं।
संगठित अपराध और भारत की विधिक व्यवस्था
- भारत में हमेशा ही किसी-न-किसी रूप में संगठित अपराध का अस्तित्व रहा है। हालाँकि कई सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक कारकों तथा विज्ञान व प्रौद्योगिकी में हुई प्रगति के कारण आधुनिक समय में इसका उग्र रूप देखा गया है।
- हालाँकि ग्रामीण भारत भी संगठित अपराध से अछूता नहीं है, किंतु यह मूलतः एक शहरी परिघटना है।
- भारत में राष्ट्रीय स्तर पर संगठित अपराध से निपटने के लिये कोई विशिष्ट कानून नहीं है। राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम, 1980 तथा स्वापक औषधि और मन:प्रभावी पदार्थ अधिनियम, 1985 जैसे मौजूदा कानून इस संदर्भ में अपर्याप्त हैं क्योंकि ये व्यक्तियों पर लागू होते हैं, न कि आपराधिक समूहों अथवा उद्यमों पर।
- कुछ राज्यों, जैसे कि गुजरात (गुजरात संगठित अपराध नियंत्रण अधिनियम, 2015), कर्नाटक (कर्नाटक संगठित अपराध नियंत्रण अधिनियम, 2000) और उत्तर प्रदेश (उत्तर प्रदेश संगठित अपराध नियंत्रण अधिनियम, 2017) ने संगठित अपराध का मुकाबला करने के लिये अपने कानून बनाए हैं।
