शिक्षा मंत्रालय ने मालवीय मिशन शिक्षक प्रशिक्षण कार्यक्रम के अंतर्गत विशिष्ट अध्ययन दिव्यांगताओं पर अपने क्षमता निर्माण कार्यक्रम के दूसरे चक्र की शुरुआत की है, जिसका उद्देश्य उच्च शिक्षण संस्थानों को विशिष्ट अध्ययन दिव्यांगताओं वाले छात्रों को बेहतर सहायता प्रदान करने हेतु सशक्त बनाना है।राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 सीखने की अक्षमताओं को चिह्नित करती है, उच्च शिक्षण संस्थानों को इन चुनौतियों से निपटने हेतु जागरूक एवं संवेदनशील होने का समर्थन करती है, ताकि सभी के लिये समान एवं समावेशी शिक्षा सुनिश्चित हो सके। वर्ष 2023 में शुरू की गई MMTTP का उद्देश्य शिक्षकों को विभिन्न क्षेत्रों में विशेष प्रशिक्षण और ज्ञान प्रदान करके भारत में उच्च शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार लाना है।शिक्षक प्रशिक्षण को बेहतर समर्थन देने के लिये इसे विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC)-मानव संसाधन विकास केन्द्रों (HRDC) और पंडित मदन मोहन मालवीय राष्ट्रीय शिक्षक एवं शिक्षण केन्द्रों (PMMMNMTT) जैसे मौजूदा तंत्रों से पुनर्गठित किया गया है।दिव्यांग व्यक्तियों के अधिकार अधिनियम, 2016 के तहत सरकार को यह सुनिश्चित करना अनिवार्य है कि दिव्यांग व्यक्तियों को सम्मान और समानता के साथ जीवन जीने का अधिकार मिले।
भारत में दिव्यांग व्यक्तियों (PwD) के लिए संवैधानिक और विधायी ढाँचा
संवैधानिक प्रावधान
- समानता, स्वतंत्रता, न्याय और गरिमा : भारतीय संविधान सभी व्यक्तियों के लिए समानता, स्वतंत्रता, न्याय और गरिमा सुनिश्चित करता है, जिसमें दिव्यांग व्यक्ति भी शामिल हैं।
- राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांत (DPSP) : भारतीय संविधान के अनुच्छेद 41 के तहत, राज्य को अपनी आर्थिक क्षमता और विकास की सीमाओं के भीतर कार्य, शिक्षा, बेरोजगारी, बुढ़ापा, बीमारी और अक्षमता के मामलों में सार्वजनिक सहायता के अधिकार को सुरक्षित करने के लिए प्रभावी प्रावधान करने का निर्देश दिया गया है।
विधायी प्रावधान
- दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 : यह अधिनियम दिव्यांग व्यक्तियों के अधिकारों की रक्षा और उन्हें सशक्त बनाने एवं समान अवसर प्रदान करने के लिए प्रमुख कानून है। यह अधिनियम 21 प्रकार की दिव्यांगताओं को शामिल करते हुए बेंचमार्क दिव्यांगों एवं उच्च समर्थन की आवश्यकताओं वाले लोगों को अतिरिक्त लाभ प्रदान करता है।
- संरक्षकता प्रदान करने का प्रावधान : यह अधिनियम जिला न्यायालय या राज्य सरकार द्वारा नामित किसी प्राधिकरण की संरक्षकता प्रदान करने का भी प्रावधान करता है, जिसके तहत अभिभावक और दिव्यांग व्यक्तियों के बीच संयुक्त निर्णय लिया जाएगा।इस प्रकार, भारत का संवैधानिक और विधायी ढाँचा दिव्यांग व्यक्तियों के अधिकारों और उनके समावेशी विकास को सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध है।
भारत में दिव्यांग व्यक्तियों से जुड़े मुद्दे
- शिक्षा तक पहुँच का अभाव : भारत में दिव्यांग व्यक्तियों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्राप्त करने में कई बाधाओं का सामना करना पड़ता है। विशेष शिक्षा सुविधाओं की कमी और प्रशिक्षित शिक्षकों की अनुपस्थिति के कारण समावेशी शिक्षा प्रथाओं को प्रभावी ढंग से लागू नहीं किया जा रहा है। इससे शैक्षिक अवसरों की कमी होती है, जो उनके व्यक्तिगत और व्यावसायिक विकास में बाधक बनती है।
- अभिगम्यता की चिंता : भारत में सार्वजनिक स्थानों, परिवहन सुविधाओं, संरचनाओं और बुनियादी ढांचे में पहुंच की कमी दिव्यांग व्यक्तियों के लिए एक प्रमुख चुनौती है। भारत में कई स्थानों पर रैंप, लिफ्ट या सुलभ शौचालयों की अनुपस्थिति के कारण दिव्यांग व्यक्तियों के लिए स्वतंत्र रूप से घूमना और दैनिक गतिविधियों में भाग लेना कठिन हो जाता है।
- जागरूकता की कमी और सुलभ चिकित्सा सुविधाओं का अभाव : भारत में कई दिव्यांगताओं को समय पर और उचित चिकित्सा देखभाल के माध्यम से रोका जा सकता है। इनमें जन्म के दौरान चिकित्सा समस्याएँ, मातृ स्थिति, कुपोषण, और दुर्घटनाओं के कारण चोटें शामिल हैं। लेकिन यहाँ जागरूकता की कमी और सुलभ चिकित्सा सुविधाओं की कमी इस समस्या को और बढ़ाती है।
- सामाजिक कलंक और भेदभाव का शिकार होना : भारतीय समाज में दिव्यांगता के प्रति नकारात्मक दृष्टिकोण और सामाजिक कलंक व्यापक रूप से प्रचलित हैं। दिव्यांग व्यक्तियों को अक्सर भेदभाव, बहिष्करण और उपेक्षा का सामना करना पड़ता है, जिससे उनके आत्म-सम्मान और सामाजिक संबंधों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
- इन मुद्दों का समाधान करने के लिए व्यापक नीतिगत सुधार, जागरूकता अभियान, और समावेशी विकास की दिशा में ठोस कदम उठाना आवश्यक है।
