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सतत् खाद्य प्रणालियों पर विशेषज्ञों के अंतर्राष्ट्रीय पैनल (IPES-फूड) द्वारा हाल ही में किये गए एक अध्ययन में अभूतपूर्व ‘लैंड स्क्वीज़’ पर ध्यान केंद्रित किया गया है, जिससे किसानों और खाद्य उत्पादन को खतरा है।लैंड स्क्वीज़ उस स्थिति को संदर्भित करता है जहाँ विभिन्न उद्देश्यों (कृषि, शहरीकरण, बुनियादी ढाँचे, आदि) के लिये भूमि की मांग उपलब्ध खेती योग्य भूमि से अधिक हो जाती है।

रिपोर्ट की मुख्य विशेषताएँ

  • इस रिपोर्ट में भूमि की बढ़ती कीमतों, भूमि पर कब्ज़ा करने और कार्बन योजनाओं के कारण प्रचलित “लैंड स्क्वीज़” की चेतावनी दी गई है, जिससे किसानों एवं खाद्य उत्पादन को जोखिम हो सकता है।
  • वैश्विक स्तर पर, विश्व के सबसे बड़े फार्मों में से शीर्ष 1% अब विश्व की 70% कृषि योग्य भूमि को नियंत्रित करते हैं।
  • जैसे-जैसे भूमि दुर्लभ हो जाती है, वैसे इसे कृषि भूमि से अन्य उपयोगों में परिवर्तित किया जा सकता है, जिससे खाद्य उत्पादन प्रभावित हो सकता है।
  • वर्ष 2008-2022 के मध्य वैश्विक स्तर पर भूमि की कीमतें दोगुनी हो गई हैं।
  • इस दौरान सर्वाधिक वृद्धि विशेष रूप से मध्य-पूर्वी यूरोप में देखी गई है, जहाँ कीमतों में तीन गुना तक वृद्धि हुई।
  • पर्यावरण को आधार बनाकर “ग्रीन ग्रैब्स” के रूप में भूमि अधिग्रहण हो रहा है, अब बड़े स्तर पर होने वाले भूमि अधिग्रहण में इसकी लगभग 20% हिस्सेदारी है।
  • ग्रीन ग्रैबिंग का तात्पर्य पर्यावरणीय उद्देश्यों के लिये भूमि और संसाधनों के बड़े पैमाने पर अधिग्रहण या नियंत्रण से है, जिसके अक्सर नकारात्मक सामाजिक तथा आर्थिक परिणाम होते हैं। यह मूलतः पर्यावरण संरक्षण को आधार बनाकर भूमि पर किये गए कब्ज़े से संबंधित है।
  • कार्बन पृथक्करण परियोजनाओं के लिये सरकारों द्वारा नामित कुल भूमि में से आधी से अधिक से छोटे स्तर के किसानों एवं स्थानीय लोगों की आजीविका के संबंध में संभावित जोखिम बना हुआ है।
  • अगले 7 वर्षों में कार्बन ऑफसेट बाज़ार के चार गुना होने की उम्मीद है।

लैंड स्क्वीज़ के प्रमुख प्रभाव

किसानों एवं ग्रामीण समुदायों के लिये पहुँच और नियंत्रण में कमी

  • विस्थापन और निर्वासन: भूमि कब्ज़ा और अन्य दबाव छोटे स्तर के किसानों तथा स्वदेशी समुदायों को उनकी भूमि से वंचित कर देते हैं, जिससे उनकी आजीविका व जीवन के पारंपरिक तौर-तरीके बाधित होते हैं।
  • खाद्य सुरक्षा को खतरा: खाद्य उत्पादन के लिये कम भूमि उपलब्ध होने से, समग्र खाद्य सुरक्षा, (खासकर स्थानीय समुदायों के लिये) खतरे में पड़ जाती है।
  • मोलभाव करने की शक्ति: भूमि स्वामित्व का नुकसान किसानों को शक्तिशाली कृषि व्यवसायों से अपने उत्पादों के लिये उचित कीमतों पर मोलभाव करने में असमर्थ बनाता है।
  • निर्धनता में वृद्धि: भूमि तक सीमित पहुँच ग्रामीण जनसंख्या के लिये अवसरों को प्रतिबंधित करती है, जिससे वे निर्धनता के दुष्चक्र में फँस जाते हैं।

पर्यावरण क्षरण

  • अस्थिर प्रथाएँ: बड़े स्तर पर, निर्यात-उन्मुख कृषि पर ध्यान केंद्रित करने से अक्सर भूमि उपयोग की प्रथाएँ जैसे; वनों की कटाई, मृदा का ह्रास और जल संसाधनों के अत्यधिक उपयोग से अस्थिर हो जाती हैं।
  • जैवविविधता हानि: खनन, बुनियादी ढाँचे और औद्योगिक कृषि के लिये भूमि के रूपांतरण के फलस्वरूप प्राकृतिक आवास नष्ट हो जाते हैं तथा जैवविविधता को खतरा होता है।
  • जलवायु परिवर्तन के प्रति संवेदनशीलता में वृद्धि: मृदा के स्वास्थ्य में गिरावट और प्राकृतिक वनस्पति की हानि पारिस्थितिक तंत्र को कमज़ोर करती है, जिससे वे जलवायु परिवर्तन के प्रति अधिक संवेदनशील हो जाते हैं।

सामाजिक अशांति और संघर्ष

  • संसाधनों के लिये प्रतिस्पर्द्धा: स्थानीय आबादी और निवेशकों के बीच सामाजिक अशांति एवं संघर्ष भूमि संसाधनों की सीमित मात्रा के लिये प्रतिस्पर्द्धा के परिणामस्वरूप उत्पन्न हो सकते हैं।IPES-फूड द्वारा प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार, सरकारों ने कार्बन पृथक्करण की परियोजनाओं के लिये जो भूमि आवंटित की है, उसका आधे से अधिक भाग छोटे किसानों और स्थानीय समुदायों की आजीविका में हस्तक्षेप का खतरा उत्पन्न करता है।
  • अस्थिरता और प्रवासन :भूमि और आजीविका के अवसरों की हानि से ग्रामीण-शहरी प्रवासन शुरू हो जाता है, जिससे शहरी संसाधनों एवं सामाजिक सेवाओं पर दबाव पड़ता है।

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