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भारत के कृषि निर्यात (विशेष रूप से चाय और चीनी) में वृद्धि से भारत की आर्थिक संवृद्धि में योगदान मिला है।भारत का कृषि निर्यात वर्ष 2004-2005 में 8.7 बिलियन डॉलर से बढ़कर वर्ष 2022-2023 में 53.1 बिलियन डॉलर हो गया, जो राजस्व, विदेशी मुद्रा और आर्थिक विकास में वृद्धि से प्रेरित है।

कृषि में स्थिरता का क्या तात्पर्य है

  • आर्थिक स्थिरता: निर्यात आर्थिक रूप से लाभकारी है लेकिन इसमें स्थिरता आवश्यक है। इसमें संसाधनों को कम किये बिना दीर्घकालिक उत्पादकता बनाए रखना शामिल है।
  • पारिस्थितिकी स्थिरता: प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र की रक्षा करना, रसायनों के उपयोग को न्यूनतम करना तथा जल संसाधनों का प्रभावी प्रबंधन करना यह सुनिश्चित करने के लिये महत्त्वपूर्ण है कि कृषि प्रणालियों से पर्यावरण को नुकसान न पहुँचे।
  • सामाजिक स्थिरता: श्रम अधिकार, न्यूनतम  मजदूरी और सुरक्षित कार्य स्थितियों जैसे मुद्दों को हल करना, न्यायसंगत एवं धारणीय कृषि प्रणालियों के लिये आवश्यक है।
  • समयावधि दृष्टिकोण: किसी फसल की संपूर्ण समयावधि (बुवाई पूर्व से लेकर कटाई के बाद के चरणों तक) में स्थिरता पर विचार किया जाना चाहिये, न कि केवल उत्पादन के दौरान।

चाय और चीनी उद्योग से इस स्थिरता पर क्या प्रभाव पड़ता है

चाय:

  • निर्यात वृद्धि: भारत विश्व का चौथा सबसे बड़ा (जिसका निर्यात वर्ष 2022-2023 में 793.78 मिलियन अमेरिकी डॉलर रहा) चाय निर्यातक है। इसका निर्यात मुख्य रूप से संयुक्त अरब अमीरात, रूस, ईरान, संयुक्त राज्य अमेरिका एवं यूनाइटेड किंगडम में हुआ।

चाय उत्पादन में स्थिरता संबंधी चिंताएँ

  • मानव-वन्यजीव संघर्ष: 70% चाय बागान वनों के निकट हैं जिसके कारण हाथियों जैसे वन्यजीवों के साथ अक्सर संघर्ष होने से फसलों एवं बागानों को नुकसान होता है।
  • रासायनिक उपयोग: चाय की खेती में सिंथेटिक कीटनाशकों के व्यापक उपयोग, जिसमें डाइक्लोरोडाइफेनिलट्राइक्लोरोइथेन (Dichlorodiphenyltrichloroethane- DDT) और एंडोसल्फान जैसे हानिकारक रसायन शामिल हैं, से स्वास्थ्य संबंधी जोखिम उत्पन्न होते हैं और अंतिम उत्पाद में रासायनिक अवशेष बढ़ जाते हैं।
  • श्रम मुद्दे: चाय बागान श्रमिकों में आधे से अधिक महिलाएँ हैं, इसलिये कम वेतन, खतरनाक कार्य स्थितियाँ और श्रम कानूनों का अपर्याप्त प्रवर्तन महत्त्वपूर्ण चुनौतियाँ बनी हुई हैं।
  • बागान श्रम अधिनियम, 1951 में श्रमिकों की सुरक्षा को अनिवार्य बनाया गया है, लेकिन इसके प्रावधानों को शायद ही कभी पूरी तरह से लागू किया जाता है।

चीनी

  • निर्यात वृद्धि: विश्व का दूसरा सबसे बड़ा चीनी उत्पादक देश भारत, जिसका वैश्विक उत्पादन में लगभग 20% का योगदान है।
  • चीनी निर्यात वित्त वर्ष 2013-14 में 1,177 मिलियन अमेरिका डॉलर से बढ़कर वित्त वर्ष 2021-22 में 4,600 मिलियन अमेरिकी डॉलर हो गया, जो 64.90% की वृद्धि को दर्शाता है। यह 121 देशों को चीनी निर्यात करता है।
  • आर्थिक प्रभाव: लगभग 50 मिलियन किसानों और चीनी मिलों में 500,000 अतिरिक्त श्रमिकों को रोज़गार प्रदान करता है। नीति आयोग (नेशनल इंस्टीट्यूशन फॉर ट्रांसफॉर्मिंग इंडिया) के अनुसार, इस उद्योग का वार्षिक कारोबार लगभग 1 लाख करोड़ रुपए है।

चीनी उद्योग में स्थिरता संबंधी चिंताएँ

  • जल प्रबंधन: गन्ने की फसल को प्रति किलोग्राम चीनी के लिये 1,500 से 2,000 लीटर पानी की आवश्यकता होती है, जो भारत के जल संसाधनों पर दबाव डालता है। फसल क्षेत्र के 25% हिस्से को कवर करने के बावजूद, गन्ना और धान 60% सिंचाई जल का उपभोग करते हैं, जिससे अन्य फसलों के लिये उपलब्धता सीमित हो जाती है।
  • जैव विविधता पर प्रभाव: कर्नाटक और महाराष्ट्र में गन्ने की व्यापक खेती ने घास के मैदानों और सवाना के मैदानों का स्थान ले लिया है, जिससे जैव विविधता को नुकसान पहुँचा है और वन्यजीवों के आवासों में व्यवधान उत्पन्न हुआ है।
  • श्रम और कार्य परिस्थितियाँ: चीनी उद्योग के कर्मचारी अक्सर कर्ज के चक्र में फँस जाते हैं, उन्हें कठोर परिस्थितियों में लंबे समय तक कार्य करना पड़ता है। बढ़ता तापमान उनकी शारीरिक और मानसिक सेहत को और भी खराब कर देता है।

स्थिरता संबंधी चुनौतियों से निपटने के लिये क्या किया जाना चाहिये

  • चाय उद्योग में स्थिरता: जलवायु-प्रतिरोधी चाय किस्मों का उपयोग करना तथा जलवायु जोखिमों को कम करने के लिये कृषि वानिकी प्रथाओं को लागू करना।
  • यह सुनिश्चित करना कि किसानों को प्रत्यक्ष बाज़ार पहुँच और प्रमाणित उत्पादों के लिये प्रीमियम के माध्यम से लाभ का उचित हिस्सा मिले।
  • बागानों के आसपास मानव-वन्यजीव संपर्क को प्रबंधित करने के लिये बेहतर तरीके अपनाए जाने चाहिये। स्वस्थ्य चाय उत्पादन के लिये अधिकतम अवशेष सीमा की सख्त निगरानी की आवश्यकता है।
  • उपज में सुधार लाने और पर्यावरणीय क्षति को न्यूनतम करने के लिये सटीक कृषि, कृषि वानिकी और एकीकृत कीट प्रबंधन (IPM) जैसी संधारणीय कृषि तकनीकों को एकीकृत करना।
  • चीनी उद्योग में स्थिरता: जल संरक्षण के लिये ड्रिप सिंचाई जैसी सतत् सिंचाई पद्धतियों को अपनाना।
  • ड्रिप सिंचाई अपनाने से पानी का उपयोग 40-50% तक कम हो सकता है, जिससे खेती अधिक संसाधन-कुशल हो जाएगी।
  • गन्ने के उप-उत्पादों जैसे खोई (जैव ऊर्जा के लिये), विनसे (उर्वरक के रूप में) और गन्ने का अवशेष (बायोमास या पशु आहार के लिये) का उपयोग करने से अपशिष्ट में कमी आती है और संसाधन दक्षता में सुधार होता है, जिससे चक्रीय अर्थव्यवस्था को बढ़ावा मिलता है।
  • चीनी मीलों को बायोरिफाइनरियों में परिवर्तित कर अपशिष्ट उत्पादों का उपयोग ऊर्जा उत्पादन के लिये किया जा सकता है, जिससे उद्योग अधिक आत्मनिर्भर बन जाएंगे और गैर-नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों पर निर्भरता कम हो जाएगी।
  • कृषि मज़दूरों और मिल श्रमिकों के लिये बेहतर कार्य स्थितियाँ, उचित मजदूरी, स्वास्थ्य देखभाल, शिक्षा और सामाजिक सुरक्षा तक पहुंच सुनिश्चित करना।

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