आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति (CCEA) ने अगले विपणन सीज़न (वर्ष 2025-26) के लिये छह रबी फसलों (गेहूँ, जौ, चना, मसूर, रेपसीड, सरसों और कुसुम) के लिये न्यूनतम समर्थन मूल्य में वृद्धि की है।MSP में वृद्धि से MSP को वैधानिक बनाने की किसानों की मांग के साथ कृषि पारिस्थितिकी तंत्र पर इसके प्रभाव को लेकर विमर्श को बढ़ावा मिला है।
आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति
- इसकी अध्यक्षता प्रधानमंत्री करते हैं और यह सार्वजनिक क्षेत्र के निवेश के लिये प्राथमिकताएँ निर्धारित करती है।
- यह एक एकीकृत आर्थिक नीति ढाँचा विकसित करने के लिये आर्थिक रुझानों की निरंतर समीक्षा करती है तथा विदेशी निवेश सहित आर्थिक क्षेत्र में नीतियों एवं गतिविधियों (जिसके लिये उच्च स्तरीय निर्णय लेने की आवश्यकता होती है) की देखरेख करती है
न्यूनतम समर्थन मूल्य
- MSP की शुरुआत वर्ष 1965 में कृषि मूल्य आयोग (APC), जिसे बाद में CACP नाम दिया गया, की स्थापना के साथ की गई थी। यह राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा को बढ़ाने और किसानों को बाज़ार मूल्यों में गिरावट से बचाने के लिये बाज़ार हस्तक्षेप का एक रूप था।
MSP की गणना
- कृषि लागत एवं मूल्य आयोग (Commission for Agricultural Costs & Prices- CACP) प्रत्येक फसल के लिये राज्य और अखिल भारतीय औसत स्तर पर तीन प्रकार की उत्पादन लागत की गणना करता है।
- A2: इसमें किसान द्वारा बीज, उर्वरक, कीटनाशक, मज़दूरी, पट्टे पर ली गई भूमि, ईंधन, सिंचाई आदि पर नकद एवं वस्तु के रूप में सीधे तौर पर किये गए सभी भुगतेय लागत शामिल हैं।
- A2+FL: इसमें A2 के साथ अवैतनिक पारिवारिक श्रम (Family Labour) का अनुमानित मूल्य शामिल है।
- C2: यह एक व्यापक लागत है जिसमें A2+FL लागत के साथ स्वामित्व वाली भूमि का अनुमानित किराया मूल्य, स्थायी पूंजी पर ब्याज, पट्टे पर दी गई भूमि के लिये भुगतान किया गया किराया शामिल है
- सरकार का कहना है कि MSP को अखिल भारतीय भारित औसत उत्पादन लागत (CoP) के कम से कम 1.5 गुना के स्तर पर तय किया गया है, लेकिन इसकी इस लागत की A2+FL लागत के 1.5 गुना के रूप में गणना की जाती है।
भारत में MSP से संबंधित चिंताएँ
- सीमित कवरेज: शांता कुमार समिति की 2015 की रिपोर्ट के अनुसार, केवल 6% किसान ही MSP से लाभान्वित होते हैं। मुख्य रूप से ऐसे किसान जो बेहतर बुनियादी ढाँचे तक पहुँच वाले क्षेत्रों (जैसे पंजाब और हरियाणा) में रहते हैं, जबकि अन्य राज्यों के किसान बड़ी संख्या में इससे वंचित रह जाते हैं।
- फसलों पर असंतुलित ध्यान: MSP प्रणाली मुख्य रूप से कुछ फसलों (विशेष रूप से चावल और गेहूँ) पर केंद्रित है जिससे किसानों को अन्य फसलों को उगाने के लिये प्रोत्साहन नहीं मिलता है, जिससे फसल विविधीकरण प्रभावित होने के साथ इन फसलों के अतिउत्पादन को बढ़ावा मिल सकता है।
- खरीद प्रणाली पर अत्यधिक भार: MSP के कारण प्रायः बड़े पैमाने पर सरकारी खरीद (विशेष रूप से चावल और गेहूँ की) करनी होती है जिससे भंडारण संबंधी चुनौतियों के साथ अनाज की बर्बादी होती है तथा भारतीय खाद्य निगम (FCI) के संसाधनों पर दबाव पड़ता है।
- पर्यावरणीय प्रभाव: चावल (MSP द्वारा समर्थित) जैसी कुछ जल-गहन फसलों पर ध्यान केंद्रित करने से पर्यावरणीय चिंताएँ (जैसे भूजल का कम होना- विशेष रूप से पंजाब जैसे क्षेत्रों में) उत्पन्न होती हैं।
- बिचौलियों पर निर्भरता: कुछ मामलों में जब MSP घोषित किया जाता है, तब भी किसानों को खरीद एजेंसियों तक सीधे पहुँचने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है, जिससे उनकी बिचौलियों पर निर्भरता बढ़ जाती है, जिससे उनका शोषण होता है।
