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नेशनल एसेट रिकंस्ट्रक्शन कंपनी लिमिटेड  का लक्ष्य वित्त वर्ष 2026 तक बैंकों की 2 ट्रिलियन रुपये मूल्य की तनावग्रस्त या गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों  का अधिग्रहण करना है। वित्त वर्ष 2024 तक, NARCL ने पहले ही NPA अधिग्रहण में ₹1 ट्रिलियन का आँकड़ा हासिल कर लिया था।

बैड बैंक

  • बैड बैंक परिसंपत्ति पुनर्निर्माण कंपनियाँ हैं जो वाणिज्यिक बैंकों से अशोध्य ऋणों को खरीदती हैं, उनका प्रबंधन करती हैं और उनकी वसूली करती हैं तथा हस्तांतरित परिसंपत्तियों को नष्ट करने हेतु NPA का प्रबंधन करती हैं।    
  • यह बैंकों के लिये एक सुरक्षा जाल प्रदान करता है, जिससे उन्हें अशोध्य ऋणों को हटाने तथा ऋण देने की व्यवहार्य गतिविधियों पर ध्यान केंद्रित करने में मदद मिलती है।
  • विकास: बैड बैंकों की अवधारणा 1980 के दशक में ग्रांट स्ट्रीट नेशनल बैंक जैसी संस्थाओं के साथ उभरी, जिन्होंने मेलॉन बैंक से अशोध्य परिसंपत्तियों का अधिग्रहण किया।
  • वर्ष 2008 के वित्तीय संकट के दौरान इस अवधारणा को प्रमुखता मिली। स्वीडन, जर्मनी और फ्राँस जैसे देशों ने अशोध्य परिसंपत्तियों के प्रबंधन के लिये इसी तरह के मॉडल लागू किये हैं।
  • भारत का पहला बैड बैंक, NARCL की स्थापना वर्ष 2021 में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में अशोध्य परिसंपत्तियों के प्रबंधन के लिये की गई थी। हालाँकि इस अवधारणा का प्रस्ताव आर्थिक सर्वेक्षण 2016 में दिया गया था।
  • यह कदम आपात ऋणों के बोझ से दबी वित्तीय प्रणालियों को स्थिर करने हेतु अशोध्य बैंकों का उपयोग करने की वैश्विक प्रवृत्ति के अनुरूप है।
  • लाभ: बैड बैंक NPA के प्रबंधन को केंद्रीकृत करते हैं, जिससे प्रयासों में सरलता आती है और परिसंपत्ति समाधान में दक्षता बढ़ती है।
  • NPA को बैड बैंक में स्थानांतरित करके, मूल बैंक इन परिसंपत्तियों के विरुद्ध प्रावधान के रूप में वर्तमान में रखी गई पूंजी को मुक्त कर सकते हैं। इससे संभावित रूप से अधिक ऋण योग्य ग्राहकों को ऋण देने में वृद्धि हो सकती है।
  • बैड बैंकों को सरकारी समर्थन मिलने से मूल बैंकों में विश्वास बढ़ सकता है, जिससे उनके समग्र पूंजी भंडार और वित्तीय स्थिरता में सुधार हो सकता है।
  • हानि: अशोध्य परिसंपत्तियों को सरकार समर्थित इकाई को हस्तांतरित करने से केवल सार्वजनिक क्षेत्र पर बोझ बढ़ेगा, जिससे होने वाले किसी भी हानि के लिये  करदाता की देनदारी बढ़ सकती है।
  • सरकारी राहत पैकेज/ गवर्नमेंट बेलआउट बैंकों को अपने ऋण देने की पद्धतियों में सावधानी बरतने से हतोत्साहित कर सकता है, जिससे भविष्य में ऐसी ही समस्याओं की पुनरावृत्ति हो सकती है।

बैड बैंकों के लिये वर्तमान चुनौतियाँ

  • मूल्य निर्धारण: बैड बैंकों को अक्सर अशोध्य ऋणों का मूल्य निर्धारण करने और भविष्य की देनदारियों का निर्धारण करने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।
  • खरीदार ढूँढना: आपात परिसंपत्तियों के पोर्टफोलियो को बेचना चुनौतीपूर्ण हो सकता है, विशेष रूप से स्थापित बाज़ार तंत्र या पद्धति के बिना।
  • कमज़ोर आर्थिक स्थिति से परिसंपत्ति मूल्य में और गिरावट आ सकती है तथा संभावित खरीदारों की संख्या कम हो सकती है।

NARCL

  • ‘बैड बैंक’ के रूप में स्थापित किये गए NARCL का उद्देश्य विपत्तिकालीन/आपात ऋणों की वित्तीय प्रणाली की कमियों को दूर करना है, जिससे बैंकों को स्थिर किया जा सके और एक स्वस्थ आर्थिक वातावरण को बढ़ावा दिया जा सके।
  • 500 करोड़ रुपए से अधिक के बड़े ऋणों का प्रबंधन करने के लिये केंद्रीय बजट सत्र 2021-22 में NARCL की घोषणा की गई थी। प्रस्तावित संरचना से भारतीय रिज़र्व बैंक के असंतुष्ट होने के कारण प्रारंभ में विलंब हुआ, जिसके कारण एक संशोधित योजना बनाई गई।
  • नई संरचना के तहत NARCL बैंकों से अशोध्य ऋण खातों का अधिग्रहण और एकत्रीकरण करता है। इंडिया डेट रेज़ॉल्यूशन कंपनी लिमिटेड (IDRCL) NARCL के साथ एक विशेष व्यवस्था के तहत काम करते हुए समाधान/रेज़ॉल्यूशन प्रक्रिया का प्रबंधन करती है।
  • NARCL की भूमिका: वाणिज्यिक बैंकों से अशोध्य ऋण का क्रय करना तथा  इन आपात आस्तियों/परिसंपत्तियों का प्रबंधन करना।
  • धन की वसूली और अंतरित परिसंपत्तियों को पुनर्प्राप्त करने के लिये बोली लगाने की स्विस चैलेंज जैसी विधियों के माध्यम से उनका बाज़ार में विक्रय करना।
  • वित्त पोषण और स्वामित्व: NARCL की अधिग्रहण रणनीति में सहमत ऋण मूल्य का 15% नकद में और शेष 85% सरकार द्वारा समर्थित प्रतिभूति प्राप्तियों में भुगतान करना शामिल है।
  • NARCL में सरकारी बैंकों की 51% हिस्सेदारी है, जबकि शेष हिस्सेदारी निजी बैंकों के पास है।

NARCL के समक्ष चुनौतियाँ

  • दोहरी संरचना के मुद्दे: NARCL और IDRCL की द्वैधता ने परिचालन अक्षमताओं को जन्म दिया है। NARCL के पास निर्णय लेने का अधिकार है, लेकिन IDRCL समाधान/विक्रय करता है, जिससे एक जटिल और महंगी संरचना बनती है।
  • मूल्य निर्धारण विसंगतियाँ: NARCL और बैंकों के बीच मूल्य निर्धारण अपेक्षाओं में बड़े अंतर ने लेन-देन को रोक दिया है, क्योंकि बैंकों को NARCL के प्रस्ताव अपर्याप्त लगते हैं।
  • उच्च परिचालन लागत: NARCL व IDRCL दोनों की आवश्यकता के परिणामस्वरूप परिचालन लागत में वृद्धि हुई है, जो NARCL की बाह्य सलाहकारों पर निर्भरता एवं धीमी प्रक्रिया के कारण और भी बढ़ जाती है।

NARCL की चुनौतियों के लिये संभावित समाधान

  • IDRCL व NARCL के संयोजन से संचालन सुव्यवस्थित हो सकता है, लागत कम हो सकती है और दोहराव वाले कार्यों को समाप्त करके दक्षता बढ़ सकती है।
  • प्रदर्शन-लिंक्ड प्रोत्साहनों को लागू करने से कुशल पेशेवर आकर्षित हो सकते हैं और परिसंपत्ति रेज़ॉल्यूशन की प्रभावशीलता में सुधार हो सकता है।
  • परिसंपत्ति रेज़ॉल्यूशन में घरेलू और विदेशी निवेशकों की भागीदारी को सुविधाजनक बनाने के लिये निवेशक-अनुकूल नीतियाँ।
  • चलनिधि और मूल्य निर्धारण में सुधार के लिये आपात परिसंपत्तियों के लिये द्वितीयक बाज़ार को बढ़ावा देना।

स्विस चैलेंज विधि

  • स्विस चैलेंज विधि एक सार्वजनिक खरीद प्रक्रिया है जो निजी कंपनियों को सरकारी अनुबंधों पर बोली लगाने की अनुमति देती है। इस विधि का प्रयोग सड़क, बंदरगाह और रेलवे जैसी परियोजनाओं या सरकार को प्रदान की जाने वाली सेवाओं के लिये किया जाता है।

RBI ने सितंबर 2016 में बैंकों को NPA खातों की बिक्री के लिये स्विस चैलेंज तकनीक का प्रयोग करने की अनुमति दी थी, इसमें शामिल हैं:

  • प्रारंभिक प्रस्ताव: कोई खरीदार NPA खाता खरीदने के लिये प्रस्ताव प्रस्तुत करता है।
  • प्रति-बोली के लिये आमंत्रण: यदि प्रारंभिक प्रस्ताव नकद में है और बैंक की न्यूनतम सीमा से अधिक है, तो बैंक जवाबी-बोली/प्रति-बोली आमंत्रित करता है।

वरीयता क्रम

  • परिसंपत्ति पुनर्निर्माण कंपनियाँ (ARC): बैंक में सबसे बड़ी हिस्सेदारी वाली ARC को प्राथमिकता दी जाती है।
  • पहला बोलीदाता: यदि कोई ARC भाग नहीं लेता है, तो प्रारंभिक बोलीदाता को प्राथमिकता दी जाती है।
  • सबसे अधिक बोलीदाता: प्रति-बोली प्रक्रिया के दौरान, सबसे अधिक बोली लगाने वाले का चयन किया जाता है।

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