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भारतीय उच्च शिक्षा के अत्यधिक राजनीतिकरण की चर्चा आज कल ख़बरों में इसलिए है क्योंकि यह शैक्षिक जीवन और संस्थानों की स्वायत्तता पर गहरा प्रभाव डाल रहा है। इसकी जड़ें भारतीय शिक्षा के इतिहास में गहराई से जुड़ा हुआ या समाहित हैं और हालिया वर्षों में इसकी तीव्रता में वृद्धि हुई है।वर्तमान समय में भारत में अकादमिक स्वतंत्रता और बौद्धिक विमर्श में बाधाएं आ रही हैं, जिसके कारण भारत में शिक्षा प्रणाली में व्यापक सुधारों की मांग भी एक महत्वपूर्ण विषय के रूप में उभर कर सामने आई है।

भारत में उच्च शिक्षा की वर्तमान स्थिति

  • भारत में, उच्च शिक्षा का अर्थ है 12 वर्ष की स्कूली शिक्षा पूरी करने के बाद प्राप्त की जाने वाली तृतीयक स्तर की शिक्षा। यहाँ, विश्व की दूसरी सबसे बड़ी उच्च शिक्षा प्रणाली है, जिसमें 58,000 से अधिक उच्च शिक्षा संस्थान शामिल हैं।
  • वर्तमान में, भारत में 43.3 मिलियन छात्र उच्च शिक्षा के लिए नामांकित हैं। इनमें से लगभग 79% छात्र स्नातक पाठ्यक्रमों में, 12% छात्र स्नातकोत्तर (मास्टर डिग्री) पाठ्यक्रमों में, और केवल 0.5% छात्र PhD पाठ्यक्रमों में नामांकित हैं। शेष अधिकांश छात्र उप-डिग्री (Sub-Degree) डिप्लोमा कार्यक्रमों में अध्ययनरत हैं।
  • स्नातक स्तर पर, कला (34%) सबसे लोकप्रिय विषय क्षेत्र है, इसके बाद विज्ञान (15%), वाणिज्य (13%), और इंजीनियरिंग एवं प्रौद्योगिकी (12%) हैं। स्नातकोत्तर स्तर पर, सामाजिक विज्ञान (21%) शीर्ष विषय क्षेत्र है, उसके बाद विज्ञान (15%) और प्रबंधन (14%) हैं। PhD स्तर पर, इंजीनियरिंग और प्रौद्योगिकी (25%) में सबसे अधिक छात्र नामांकित हैं, उसके बाद विज्ञान (21%) का स्थान आता है।
  • उच्च शिक्षा भागीदारी दर (GER) बढ़कर 28.4% हो गई है, जो पिछले वर्ष 2020-21 से 1.1% अधिक है। उच्चतम GER वाले राज्य/केंद्र शासित प्रदेश चंडीगढ़, पुडुचेरी, दिल्ली, तमिलनाडु, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, केरल, और तेलंगाना हैं।
  • वर्ष 2021-22 में, भारतीय संस्थानों में विदेशी छात्रों की कुल संख्या लगभग 46,000 थी।

शिक्षा के अत्यधिक राजनीतिकरण के परिणाम

  • शैक्षणिक स्वतंत्रता में कमी: इस बात को लेकर चिंता बढ़ रही है कि राजनीतिक प्रभाव शैक्षणिक स्वतंत्रता को कमज़ोर कर सकता है, जिससे संकाय और छात्रों पर राजनीतिक विचारधारा के साथ जुड़ने का दबाव पड़ सकता है।पेन्सिलवेनिया विश्वविद्यालय की अध्यक्ष लिज़ मैगिल ने कॉलेज परिसरों में यहूदी-विरोधी भावना के मुद्दे पर अमेरिकी कॉन्ग्रेस समिति के समक्ष गवाही दी। फिर धनी दानदाताओं और पूर्व छात्रों के दबाव में आकर उन्होंने त्यागपत्र दे दिया।
  • वैश्विक प्रतिष्ठा: राजनीतिकरण वाला शैक्षणिक माहौल प्रतिभाशाली छात्रों और शिक्षकों को भारतीय संस्थानों में दाखिला लेने या कार्य करने से हतोत्साहित कर सकता है। यह उच्च शिक्षा में वैश्विक नेता बनने के भारत के प्रयासों में बाधा उत्पन्न कर सकता है।
  • विचारों की विविधता में कमी: जब राजनीतिक एजेंडा अकादमिक चर्चा पर हावी हो जाता है, तो इससे खुली बहस में बाधा उत्पन्न होती है और वैकल्पिक दृष्टिकोण का अन्वेषण करने में अरुचि उत्पन्न हो जाती है।
  • छात्र सक्रियता की संभावना: राजनीतिकरण बढ़ने से छात्र सक्रियता राजनीतिक दल के साथ या उसके विरुद्ध हो सकती है। हालाँकि छात्र सक्रियता सकारात्मक भी हो सकती है, लेकिन अगर यह अत्यधिक राजनीतिक हो जाए तो यह शैक्षणिक जीवन को बाधित भी कर सकती है।
  • शिक्षा क्षेत्र में सार्वजनिक विश्वास का ह्रास: जब विश्वविद्यालयों को राजनीतिक खेलों में मोहरे के रूप में देखा जाता है, तो शैक्षिक शोध के मूल्य और निष्पक्षता में लोक विश्वास भंग हो सकता है। यह सार्वजनिक नीति को आकार देने में शैक्षिक विशेषज्ञता की वैधता को कमज़ोर करता है।
  • शोध वित्तपोषण में कमी: अल्पकालिक एजेंडा वाले राजनेताओं द्वारा अनिश्चित वाणिज्यिक अनुप्रयोगों वाली दीर्घकालिक शोध परियोजनाओं में निवेश करने की संभावनाएँ कम हो सकती हैं।
  • इससे नवाचार और वैश्विक ज्ञान अर्थव्यवस्था में प्रतिस्पर्द्धा करने की भारत की क्षमता बाधित हो सकती है।
  • रोज़गार में कमी: नियोक्ता आलोचनात्मक सोच, समस्या-समाधान और अनुकूलनशीलता जैसे कौशल को अधिक महत्त्व देते हैं। एक अति-राजनीतिक शिक्षा जो इन कौशलों पर विचारधारा को प्राथमिकता देती है, स्नातकों को कार्यबल के लिये असमर्थ बना सकती है।

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