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उपभोक्ताओं को भ्रामक विज्ञापनों से बचाने के लिये भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने विज्ञापनदाताओं को मीडिया में उत्पादों का प्रचार करने से पहले स्व-घोषणा प्रस्तुत करने के निर्देश जारी किये हैं।आगे के घटनाक्रम में केंद्र सरकार ने आयुष मंत्रालय के पत्र को वापस ले लिया है, जिसमें औषधि और प्रसाधन सामग्री नियम, 1945 के नियम 170 को तत्काल प्रभाव से “लोपित” किया गया था।नियम 170 लाइसेंसिंग अधिकारियों की मंज़ूरी के बिना आयुर्वेदिक, सिद्ध या यूनानी दवाओं के विज्ञापनों पर रोक लगाता है।

सर्वोच्च न्यायालय के प्रमुख निर्देश

स्व-घोषणा प्रस्तुत करना

  • मीडिया में उत्पादों का प्रचार करने से पूर्व विज्ञापनदाताओं को स्व-घोषणाएँ प्रस्तुत करनी होंगी।
  • उपभोक्ताओं को गुमराह करने से रोकने के लिये विज्ञापनदाता अब यह घोषित करने के लिये बाध्य हैं कि उनके विज्ञापन उनके उत्पादों के बारे में भ्रामक या गलत जानकारी नहीं देते हैं।

विज्ञापनदाताओं के लिये ऑनलाइन पोर्टल

  • TV विज्ञापन चलाने के इच्छुक विज्ञापनदाताओं को ‘ब्रॉडकास्ट सेवा’ पोर्टल पर घोषणाएँ अपलोड करनी होंगी, जो सूचना और प्रसारण मंत्रालय से प्रसारण-संबंधी गतिविधियों के लिये अनुमति, पंजीकरण एवं लाइसेंस का अनुरोध करने के लिये हितधारकों के लिये वन-स्टॉप सुविधा के रूप में कार्य करता है।
  • प्रिंट विज्ञापनदाताओं के लिये एक समान पोर्टल स्थापित किया जाएगा।

समर्थनकर्त्ताओं की ज़िम्मेदारी

  • सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर, मशहूर हस्तियों और उत्पादों का समर्थन करने वाली सार्वजनिक हस्तियों को ज़िम्मेदारी से काम करना चाहिये।
  • भ्रामक विज्ञापन से बचने के लिये विज्ञापनदाताओं को उन उत्पादों के बारे में पर्याप्त जानकारी होनी चाहिये, जिनका वे प्रचार करते हैं।

उपभोक्ता संरक्षण सुनिश्चित करना

  • उपभोक्ताओं के लिये भ्रामक विज्ञापनों की रिपोर्ट करने के लिये एक पारदर्शी प्रक्रिया स्थापित करना और सुनिश्चित करना कि उन्हें शिकायत की स्थिति एवं परिणामों पर अपडेट प्राप्त हो।

भ्रामक विज्ञापनों के हाल ही में कौन-से मामले सामने

  • भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (Food Safety and Standards Authority of India- FSSAI) की विज्ञापन निगरानी समिति ने पिछले छह महीनों में खाद्य व्यवसाय ऑपरेटरों (FBO) द्वारा भ्रामक दावों के 32 मामलों की पहचान की, जिससे ऐसे उल्लंघनों की कुल संख्या 170 हो गई।
  • अपराधियों की विविधता: उल्लंघनकर्त्ता विभिन्न उत्पाद श्रेणियों तक अपनी पहुँच बनाए हुए हैं, जिनमें स्वास्थ्य पूरक, जैविक उत्पाद और स्टेपल (मूलभूत भोज्य पदार्थ) शामिल हैं।
  • सर्वोच्च न्यायालय ने हाल ही में भ्रामक विज्ञापन प्रसारित करने के लिये पतंजलि आयुर्वेद को फटकार लगाई, जिसके कारण इसकी मार्केटिंग गतिविधियों पर प्रतिबंध लगा दिया गया।
  • इंडियन मेडिकल एसोसिएशन ने पतंजलि पर एलोपैथिक चिकित्सा को बदनाम करने और कोविड-19 के दौरान टीकों के बारे में गलत जानकारी फैलाने का आरोप लगाया।
  • आरोपों के कारण ओषधि एवं चमत्कारिक उपचार (आक्षेपणीय विज्ञापन) अधिनियम, 1954 और उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 के उल्लंघन का हवाला देते हुए कानूनी बहस हुई।

भ्रामक विज्ञापन नैतिक सिद्धांतों का उल्लंघन कैसे करते हैं

  • सत्यता का उल्लंघन: ईमानदारी और सच्चाई आवश्यक नैतिक सिद्धांत हैं, जिन्हें विज्ञापन सहित सभी व्यावसायिक प्रथाओं का मार्गदर्शन करना चाहिये।
  • ये विज्ञापन उपभोक्ताओं की धारणाओं में हेरफेर करते हैं और व्यावसायिक लाभ के लिये उनकी कमज़ोरियों का लाभ उठाते हैं; वे व्यक्तियों को गलत आधार पर खरीदारी संबंधी निर्णय लेने के लिये प्रेरित करते हैं।
  • निष्पक्षता और न्याय: भ्रामक विज्ञापन एक असमान क्षेत्र बनाते हैं, जिससे उन कंपनियों को अनुचित लाभ मिलता है जो नैतिक विज्ञापन को प्राथमिकता देने वाली कंपनियों की तुलना में भ्रामक गतिविधियों में संलग्न होती हैं।
  • यह बाज़ार में निष्पक्षता और न्याय के सिद्धांत का उल्लंघन करता है, क्योंकि यह ईमानदार प्रतिस्पर्धियों को हानि पहुँचाता है तथा उपभोक्ता के विश्वास को कमज़ोर करता है।
  • उदाहरण: कंपनियाँ टिकाऊ उत्पादों की बढ़ती मांग को पूरा करने के लिये झूठे पर्यावरणीय दावे (ग्रीनवॉशिंग) कर रही हैं, जबकि उनके प्रतिस्पर्द्धी अपने उत्पादक के पर्यावरणीय प्रभाव का खुलासा करते हैं।
  • उपभोक्ता हानि: भ्रामक विज्ञापनों से उन उपभोक्ताओं को वित्तीय हानि हो सकती है जो झूठे दावों के आधार पर उत्पाद या सेवाएँ खरीदते हैं, जिसके परिणामस्वरूप असंतोष उत्पन्न होता है।
  • यदि विज्ञापित उत्पाद अथवा सेवाएँ संभावित रूप से हानिकारक या अप्रभावी हैं तो यह उपभोक्ताओं के शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य को भी हानि पहुँचा सकता है।
  • विश्वास में कमी: भ्रामक विज्ञापनों के बार-बार संपर्क में आने से उत्पादों, बॉण्डों और विज्ञापनों में विश्वास कम हो जाता है, जिससे व्यापार के साथ-साथ समाज में अखंडता का नैतिक सिद्धांत भी कमज़ोर हो जाता है।
  • जब उपभोक्ता ठगा हुआ महसूस करते हैं, तो उनका बाज़ार की अखंडता पर से विश्वास उठ जाता है, क्योंकि कथनी और करनी में अंतर स्पष्ट होने लगता है।

भारत में भ्रामक विज्ञापन कैसे नियंत्रित होते हैं

भ्रामक विज्ञापन की परिभाषा

उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 की धारा 2 (28) के तहत एक भ्रामक विज्ञापन को ऐसे किसी भी विज्ञापन के रूप में परिभाषित किया गया है, जो:

  • किसी उत्पाद या सेवा का गलत विवरण प्रदान करता है;
  • उपभोक्ताओं को गुमराह करने वाली झूठी गारंटी प्रदान करता है;
  • व्यक्त प्रतिनिधित्व के माध्यम से एक अनुचित व्यापार अभ्यास;
  • जानबूझकर उत्पाद के बारे में आवश्यक जानकारी प्रदान करता है।

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