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अनाज, चीनी एवं प्याज के शिपमेंट पर विभिन्न प्रतिबंधों के कारण 31 मार्च, 2024 को समाप्त हुए वित्तीय वर्ष में भारत का कृषि निर्यात 8.2% कम हो गया। भारत को आयात-निर्यात में संतुलन करते हुए वैश्विक कृषि बाज़ार के अनुकूल कृषि नीति में सुधार की आवश्यकता है।

आयात एवं निर्यात की वर्तमान स्थिति

  • वाणिज्य विभाग के आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2023-24 में कुल कृषि निर्यात मूल्य 48.82 बिलियन डॉलर था, जो वर्ष 2022-23 के रिकॉर्ड 53.15 बिलियन डॉलर और वर्ष 2021-22 के 50.24 बिलियन डॉलर से कम है।
  • वर्ष 2013-14 से वर्ष 2019-20 के मध्य निर्यात में गिरावट आई जबकि इस दौरान आयात में वृद्धि हुई।

निर्यात में गिरावट के कारण

  • वैश्विक असंतुलन : अंतर्राष्ट्रीय कीमतों में कमी ने देश के निर्यात लागत प्रतिस्पर्धात्मकता को कम कर दिया है। साथ ही, इसे आयात के प्रति अधिक संवेदनशील बना दिया।
  • हालाँकि, कोविड-19 महामारी और रूस-यूक्रेन संघर्ष के बाद भारत के कृषि निर्यात के साथ-साथ आयात भी वर्ष 2022-23 में सर्वकालिक उच्चतम स्तर पर पहुंच गया, लेकिन वित्तीय वर्ष 2023-24 में इसमें गिरावट आई।

घरेलू उपलब्धता एवं खाद्य मुद्रास्फीति

  • घरेलू उपलब्धता एवं खाद्य मुद्रास्फीति के कारण आपूर्ति संबंधी प्रतिबंध से कुल गैर-बासमती निर्यात में कमी आई। साथ ही, गेहूं व प्याज को भी निर्यात प्रतिबंधों का खामियाजा भुगतना पड़ा है।
  • मई 2022 में गेहूं का निर्यात पूरी तरह से बंद कर दिया गया, जिसके बाद 2021-22 में 2.12 बिलियन डॉलर के सर्वकालिक उच्च स्तर पर पहुंचने के बाद वर्ष 2023-24 में इसका मूल्य गिरकर 56.74 मिलियन डॉलर हो गया।

वर्तमान नीति का प्रभाव

  • उच्च आयात शुल्क से दालों व तिलहनों के घरेलू उत्पादन को बढ़ावा मिल सकता है, आयात पर निर्भरता कम हो सकती है और किसानों को समर्थन मिल सकता है।
  • भारत दुनिया में चावल का सबसे बड़ा निर्यातक है। अधिकांश गैर-बासमती चावल कई अफ्रीकी देशों को जाता है। भारत द्वारा गैर-बासमती सफेद चावल के निर्यात पर प्रतिबंध की घोषणा से अफ्रीकी देशों के समक्ष भारत की अच्छी छवि नहीं प्रस्तुत हुई।

नई कृषि नीति की आवश्यकता

  • आय में वृद्धि के लिए : किसानों की आय को बढ़ाने के लिए उनकी उपज को सर्वोत्तम बाजारों तक निर्बाध पहुंच के साथ जोड़ना होगा। इसके लिए प्रतिबंधात्मक निर्यात नीति के बजाए गतिशील नीति की आवश्यकता है।
  • खाद्य सुरक्षा के लिए : भारत दुनिया की 17.84% आबादी का समर्थन करता है लेकिन उसके पास सीमित संसाधन हैं।
  • इसके लिए सुनियोजित निर्यात नीति लागू कर अतिरिक्त राजस्व उत्पन्न किया जा सकता है जिसे खाद्य सुरक्षा बढ़ाने और किसानों की आय बढ़ाने में पुनर्निवेश किया जा सकता है।
  • रोज़गार सृजन के लिए : वर्ष 2021-22 के लिये NSSO के आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण के अनुसार, कृषि क्षेत्र भारत में सबसे बड़ा नियोक्ता है, जहाँ लगभग 45% कार्यबल कृषि में संलग्न है।
  • कृषि निर्यात को बढ़ावा देने से रोज़गार के अधिक अवसर सृजित करने में मदद मिल सकती है, विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में, जहाँ आजीविका कृषि कार्यों से निकटता से संबद्ध है।
  • अनुसंधान एवं विकास के लिए : कृषि अनुसंधान एवं विकास में भारत का कुल निवेश केंद्र व राज्यों दोनों को मिलाकर कृषि-जीडीपी का लगभग 0.5% ही है। यदि भारत को कृषि उत्पादन के साथ-साथ कृषि-निर्यात का पावरहाउस बनना है, तो इसे तुरंत दोगुना करने की जरूरत है।
  • कार्बन सिंक के संबंध में : पर्यावरणीय परिणामों को ध्यान में रखते हुए समर्थन नीतियों को फिर से तैयार करने की आवश्यकता है। बाजरा, दलहन, तिलहन और अधिकांश बागवानी की खेती को प्रोत्साहित करने के लिए कार्बन क्रेडिट दिया जा सकता है।
  • सकारात्मक संदेश : कृषि निर्यात यह भी दर्शाता है कि भारतीय कृषि बाकी दुनिया की तुलना में कितनी प्रतिस्पर्धी है और यह कितना अधिशेष उत्पन्न कर सकती है।
  • प्रतिस्पर्धात्मकता मुख्य रूप से उत्पादकता बढ़ाने और न्यूनतम आदानों से अधिकतम लाभ प्राप्त करने से उत्पन्न होती है। इसके लिए नीतियों में समयानुसार परिवर्तन आवश्यक है।
  • किसानों के लिए प्रतिबंधात्मक निर्यात में सुधार की आवश्यकता है क्योंकि निर्यात बाज़ार प्रीमियम बाज़ार हैं और इन्हें वर्षों तक विकसित एवं बनाए रखने की आवश्यकता है।

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