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प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद (PM-EAC) के एक नए विश्लेषण के अनुसार, वर्ष 1950 से वर्ष  2015 के बीच भारत में हिंदुओं के जनसंख्या प्रतिशत में 7.82% की कमी आई है, जबकि मुसलमानों, ईसाइयों तथा सिखों के प्रतिशत में वृद्धि हुई है।

PM-EAC रिपोर्ट के मुख्य निष्कर्ष

विश्व भर में घटती बहुसंख्यक जनसंख्या

  • वर्ष 1950 से वर्ष 2015 तक 38 OECD देशों की धार्मिक जनसांख्यिकी पर एकत्रित किये गए आँकड़ों के अनुसार, इनमें से 30 देशों के प्रमुख धार्मिक समूह रोमन कैथोलिकों के अनुपात में उल्लेखनीय कमी देखी गई।
  • सर्वेक्षण में शामिल 167 देशों में वर्ष 1950-2015 की अवधि के दौरान वैश्विक स्तर पर बहुसंख्यक धार्मिक समूहों की जनसंख्या में औसत गिरावट 22% आई।
  • OECD देशों में बहुसंख्यक जनसंख्या तेज़ी से घटी है, जिसमें औसतन 29% की गिरावट दर्ज की गई है।
  • वर्ष 1950 में अफ्रीका के 24 देशों में जीववाद अथवा स्थानीय मूल धर्म प्रमुख था।
  • वर्ष 2015 में अफ्रीका के इन 24 देशों में से किसी में भी जीववाद अथवा स्थानीय धर्म मानने वाले बहुसंख्यकों की मौजूदगी नहीं देखी गई।
  • दक्षिण एशियाई क्षेत्र में बहुसंख्यक धार्मिक समूह की जनसंख्या बढ़ रही है, जबकि बांग्लादेश, पाकिस्तान, श्रीलंका, भूटान और अफगानिस्तान जैसे देशों में अल्पसंख्यक धार्मिक समूहों की जनसंख्या में काफी गिरावट आई है।

भारत के संदर्भ में

  • हिंदू जनसंख्या में गिरावट: हिंदुओं की जनसंख्या में 7.82% की गिरावट आई है। वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार, वर्ष 2011 तक भारत में हिंदू जनसंख्या लगभग 79.8% थी।
  • अल्पसंख्यक जनसंख्या में वृद्धि: मुस्लिम जनसंख्या 9.84% से बढ़कर 14.095% और ईसाई जनसंख्या 2.24% से बढ़कर 2.36% हो गई।
  • सिख जनसंख्या 1.24% से बढ़कर 1.85% और बौद्ध जनसंख्या 0.05% से बढ़कर 0.81% हो गई।
  • जैन और पारसी समुदाय की जनसंख्या में गिरावट देखी गई है। जैन जनसंख्या 0.45% से घटकर 0.36% तथा पारसी जनसंख्या में 85% की गिरावट के साथ यह 0.03% से 0.0004% रह गई है।
  • स्वस्थ जनसंख्या वृद्धि दर: राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के आँकड़ों के अनुसार, भारत की कुल प्रजनन दर (Total Fertility Rate- TFR) वर्तमान में 2 के आसपास है, जो 2.19 के वांछित TFR के निकट है। जनसंख्या वृद्धि का अनुमान लगाने के लिये TFR एक विश्वसनीय संकेतक है।
  • हिंदुओं के संदर्भ में यह वर्ष 1991 के 3.3 से घटकर वर्ष 2015 में 2.1 और वर्ष 2024 में 1.9 हो गई है।
  • मुसलमानों में यह वर्ष 1991 के4.4 से घटकर वर्ष 2015 में 2.6 और वर्ष 2024 में 2.4 हो गई है।
  • अल्पसंख्यकों को समान लाभ: भारत में अल्पसंख्यकों को समान लाभ मिलता है और वे सुखद जीवन जीते हैं, जबकि वैश्विक स्तर पर जनसांख्यिकीय बदलाव चिंता का कारण बना हुआ है।

जनसांख्यिकीय प्रतिरूप और इसकी प्रासंगिकता

जनसांख्यिकी प्रतिरूप

  • यह मानव जनसंख्या में देखी जाने वाली भिन्नताओं और प्रवृत्तियों को संदर्भित करता है।
  • ये पैटर्न जनसंख्या गतिकी के अध्ययन के उपरांत प्राप्त होते हैं, जिसमें जन्म दर, मृत्यु दर, प्रवास और जनसंख्या संरचना जैसे कारक शामिल हैं।

प्रासंगिकता

जनसंख्या की प्रवृत्तियों को समझना

  • जनसांख्यिकीय डेटा का उपयोग समय के साथ प्रतिरूप की पहचान करने के लिये किया जाता है। जन्म और मृत्यु दर का अध्ययन कर जनसंख्या में वृद्धि या गिरावट का अनुमान लगाया जा सकता है।
  • यह आधारभूत ढाँचा, स्वास्थ्य देखभाल, शिक्षा एवं सामाजिक सेवाओं संबंधी योजनाएँ बनाने के लिये महत्त्वपूर्ण है।

कारणों और परिणामों का विश्लेषण

  • यह जनसंख्या में परिवर्तन के पीछे के कारणों की जाँच करता है। आर्थिक विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य देखभाल और सांस्कृतिक मानदंड जैसे कारक जन्म एवं मृत्यु दर को प्रभावित करते हैं।
  • परिणामों में कार्यबल की गतिशीलता, निर्भरता अनुपात (गैर-कार्यशील आयु समूहों का अनुपात) और सामाजिक सुरक्षा प्रणालियों संबंधी निहितार्थ शामिल हैं।

नीति निर्माण एवं कार्यान्वयन

  • स्वास्थ्य देखभाल: आयु-विशिष्ट स्वास्थ्य आवश्यकताओं की समझ से संसाधनों के  प्रभावी ढंग से आवंटन में सहायता मिलती है।
  • शिक्षाः जनसांख्यिकी शैक्षिक योजना का मार्गदर्शन करती है, जैसे कि विद्यालय की अवसंरचना और शिक्षक भर्ती।
  • शहरी नियोजन: जनसंख्या वितरण शहरी अवसंरचनात्मक ढाँचे, आवास और परिवहन को प्रभावित करता है।
  • बुज़ुर्ग जनसंख्या: वरिष्ठ लोगों से संबंधित दो प्रमुख मुद्दों- पेंशन और स्वास्थ्य देखभाल को जनसांख्यिकी नीतियों में प्रमुखता दी गई है।

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