भारत ने वित्तीय वर्ष 2022-23 में प्रथम बार चिकित्सा उपभोग्य सामग्रियों और डिस्पोज़ेबल्स सामग्री का शुद्ध निर्यातक बनकर चिकित्सा संबंधी सामान व्यवसाय में एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि प्राप्त की है।यह उस पुरानी प्रवृत्ति के परिवर्तित होने का संकेत है जहाँ ऐसे उत्पादों का आयात निर्यात से अधिक था।
भारत के फार्मास्यूटिकल उद्योग की क्या स्थिति है
- भारत ऐतिहासिक रूप से चिकित्सा उपभोग्य सामग्रियों एवं डिस्पोज़ेबल्स के लिये आयात पर निर्भर रहा है। भारत ने अब इस प्रवृत्ति को परिवर्तित कर दिया है, जो इस क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की ओर हो रहे बदलाव का संकेत देता है।
- भारत वैश्विक स्तर पर जेनेरिक दवाओं का सबसे बड़ा निर्माता है। इसका फार्मास्युटिकल उद्योग वैश्विक स्वास्थ्य देखभाल में सस्ती जेनेरिक दवाएँ उपलब्ध कराने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
- वर्तमान में एक प्रमुख फार्मास्युटिकल निर्यातक के रूप में इसका मूल्य 50 बिलियन अमेरिकी डॉलर है, जिसमें 200 से अधिक देशों में भारतीय फार्मा निर्यात होता है।
- वर्ष 2024 तक इसके 65 बिलियन अमेरिकी डॉलर और वर्ष 2030 तक 130 बिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुँचने की उम्मीद है।
निर्यात और आयात आँकड़े
- निर्यात: भारत ने 1.6 बिलियन अमेरिकी डॉलर मूल्य की चिकित्सा उपभोग्य सामग्रियों और डिस्पोज़ेबल्स का निर्यात किया, जो पिछले वित्तीय वर्ष (2021-22) की तुलना में 16% की वृद्धि दर्शाता है।
- आयात: लगभग 1.1 बिलियन अमेरिकी डॉलर का आयात हुआ, जो 33% की गिरावट दर्शाता है।
भारत के फार्मा सेक्टर की प्रमुख चुनौतियाँ
- अनुसंधान एवं विकास (Lagging Research and Development- R&D) में पिछड़ना: फार्मा क्षेत्र में भारत का अनुसंधान एवं विकास खर्च विकसित देशों की तुलना में कम है। इससे नई दवाओं के निर्माण में बाधा आती है।
- सीमित नवाचार पारिस्थितिकी तंत्र: शिक्षा जगत, अनुसंधान संस्थानों और दवा कंपनियों के मध्य सहयोग का अभाव है, जिससे उच्च गुणवत्ता वाली दवाओं तथा चिकित्सा उपकरणों का विकास धीमा हुआ है।
- मूल्य नियंत्रण और लाभ मार्जिन: कुछ दवाओं पर सरकारी मूल्य नियंत्रण मुनाफे को सीमित कर सकता है, जिससे कंपनियों के लिये नई दवाओं के अनुसंधान एवं विकास में भारी निवेश करना कम आकर्षक हो जाता है।
- जटिल नियामक ढाँचा: नई दवाओं के लिये अनुमोदन प्रक्रिया को नेविगेट करने की प्रक्रिया लंबी और जटिल हो सकता है, जो लाल फीताशाही को जन्म देता है।
- कुशल कार्यबल की कमी: फार्मा क्षेत्र में उच्च योग्य वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं की कमी है, जिसके कारण कर्मचारियों की कार्यकुशलता प्रभावित हो रही है।
- बौद्धिक संपदा (Intellectual Property- IP) चिंताएँ: अनिवार्य लाइसेंसिंग (भारतीय पेटेंट अधिनियम 1970) जैसे प्रावधानों के कारण IP सुरक्षा के आसपास अनिश्चितताएँ, भारत में बड़े फार्मा निवेश को हतोत्साहित कर सकती हैं।
- आयात निर्भरता: प्रगति के बावजूद, भारत चिकित्सा उपकरणों के लिये काफी हद तक आयात पर निर्भर है, जिसमें लगभग 70% उपकरण अन्य देशों से आते हैं।
- सक्रिय फार्मास्युटिकल सामग्री (API) के आयात के लिये भारत की चीन जैसे देशों पर अत्यधिक निर्भर है।
- नकली दवाइयाँ: भारतीय फार्मास्युटिकल क्षेत्र का एक महत्त्वपूर्ण मुद्दा घटिया या नकली दवाओं के सेवन से होने वाली मौतों की घटना है।
- भारतीय मूल की नकली दवाओं के सेवन के कारण ही मध्य एशिया और अफ्रीका में बच्चों की मौतें होती हैं।
