तमिलनाडु स्कूल शिक्षा विभाग ने स्कूलों में शारीरिक दंड के उन्मूलन (GCEP) के लिये दिशा-निर्देश जारी किये।ये दिशा-निर्देश छात्रों के शारीरिक एवं मानसिक हितों की सुरक्षा पर केंद्रित हैं एवं विद्यार्थियों के किसी भी प्रकार के उत्पीड़न को रोकने करने के लिये शारीरिक दंड को समाप्त करते हैं।
दिशा-निर्देशों के मुख्य
- इन दिशा-निर्देशों का उद्देश्य शारीरिक दंड, मानसिक उत्पीड़न एवं भेदभाव को समाप्त कर विद्यार्थियों के लिये सुरक्षित एवं विकासपूर्ण वातावरण निर्मित करना है।
- GECP में विद्यार्थियों के मानसिक स्वास्थ्य की सुरक्षा करना एवं हितधारकों को राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग(NCPCR) के दिशा-निर्देशों से परिचित कराने के लिये जागरूकता शिविर आयोजित करना भी सम्मिलित है।
- GECP दिशा-निर्देशों के कार्यान्वयन की निगरानी और किसी भी मुद्दे का समाधान करने हेतु प्रत्येक स्कूल में स्कूल प्राचार्यों, अभिभावकों, शिक्षकों एवं वरिष्ठ विद्यार्थियों को सम्मिलित करते हुए निगरानी समितियों की स्थापना पर ज़ोर देता है।
- GECP ने शारीरिक दंड के विरुद्ध सकारात्मक कार्रवाइयों को भी सूचीबद्ध किया है, जिसमें बहु-विषयक हस्तक्षेप, जीवन-कौशल शिक्षा एवं बच्चों की शिकायतों के लिये तंत्र शामिल हैं।
शारीरिक दंड
- बाल अधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र समिति द्वारा शारीरिक दंड को परिभाषित किया गया है, “कोई भी दंड जिसमें शारीरिक बल का उपयोग किया जाता है और बच्चों के लिये कुछ हद तक दर्द अथवा परेशानी उत्पन्न करने का इरादा होता है, चाहे वह दंड कितना भी सरल क्यों न हो।”
- समिति के अनुसार, इसमें ज्यादातर बच्चों को हाथ या डंडे, बेल्ट आदि से मारना (पीटना, थप्पड़ मारना) सम्मिलित है।
- विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, शारीरिक या शारीरिक दंड वैश्विक स्तर पर घरों तथा स्कूलों दोनों में अत्यधिक प्रचलित है।
- 2 वर्ष से 14 वर्ष की आयु के लगभग 60% बच्चे नियमित रूप से अपने माता-पिता या अन्य देखभाल करने वालों द्वारा शारीरिक रूप से दंडित किये जाते हैं।
- भारत में बच्चों के लिये ‘शारीरिक दंड’ की कोई वैधानिक परिभाषा नहीं है।
शारीरिक दंड के प्रकार
- राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) द्वारा परिभाषित शारीरिक दंड में कोई भी ऐसा कार्य शामिल है जो किसी बच्चे को दर्द, चोट या हानि पहुँचाता है।
- इसमें बच्चों को बेंच पर खड़ा करना, दीवार के सामने कुर्सी जैसी मुद्रा में खड़ा करना या सिर पर स्कूल बैग लेकर बैठने जैसी असुविधाजनक स्थितियों में मजबूर करना सम्मिलित है।
- इसमें पैरों में हाथ डालकर कान पकड़ना, घुटनों के बल बैठना, जबरन पदार्थ खिलाना एवं बच्चों को स्कूल परिसर के भीतर बंद स्थानों तक सीमित रखना जैसी प्रथाएँ भी शामिल हैं।
- मानसिक उत्पीड़न का संबंध गैर-शारीरिक दुर्व्यवहार से है जो बच्चों के शैक्षणिक और मनोवैज्ञानिक कल्याण पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है।
- दंड के इस रूप में व्यंग्य, अपशब्दों तथा अपमानजनक भाषा का उपयोग करके डाँटना, डराना और अपमानजनक टिप्पणियों का उपयोग जैसे व्यवहार शामिल हैं।
- इसमें बच्चे का उपहास करना, उसका अपमान करना या उसे लज्जित करना, भावनात्मक कष्ट और समस्याग्रस्त वातावरण निर्मित करना जैसे कार्य भी शामिल हैं।
शारीरिक दंड का औचित्य
- वर्तमान में अमेरिका के 22 राज्यों में स्कूलों में शारीरिक दंड की विधिक अनुमति हैं।
- भारतीय दण्ड संहिता (IPC), 1860 की कुछ धाराएँ शारीरिक दंड हेतु आधार प्रदान करती हैं।
- धारा 88 “किसी व्यक्ति के लाभ के लिये सद्भावना से सहमति से किये गए ऐसे कृत्यों के लिये सुरक्षा प्रदान करती है, जो मृत्यु का कारण नहीं हैं।”
- धारा 89 किसी अभिभावक द्वारा या उसकी सहमति से किसी बच्चे या विक्षिप्त व्यक्ति के लाभ के लिये सद्भावना से किये गए कार्यों की रक्षा करती है।
- किशोर न्याय (बच्चों की देखभाल और संरक्षण) अधिनियम, 2015: शब्द “बच्चे का सर्वोत्तम हित” धारा 2(9) को संदर्भित करता है, जिसमें कहा गया है कि निर्णय लेते समय बच्चे की पहचान, शारीरिक, भावनात्मक और बौद्धिक विकास, साथ ही उनके बुनियादी अधिकारों एवं ज़रूरतों को ध्यान में रखा जाना चाहिये, जिसका उन पर प्रभाव पड़ता है।
शारीरिक दंड के प्रभाव
- मानसिक स्वास्थ्य
- बढ़ी हुई चिंता तथा अवसाद:शारीरिक दंड के कारण बच्चे असुरक्षित, डरा हुआ व वातावरण को अरुचिपूर्ण अनुभव कर सकते हैं। इससे उनमें मानसिक चिंता एवं अवसाद बढ़ सकता है तथा आगे चलकर शैक्षणिक प्रदर्शन खराब हो सकता है।
- आत्मसम्मान में कमी: जिन बच्चों को शारीरिक या मानसिक रूप से दंडित किया जाता है उनमें कम आत्मसम्मान और आत्म-मूल्य की नकारात्मक भावना विकसित हो सकती है।
- आक्रामकता एवं हिंसा:जो बच्चे हिंसक कृत्यों को देखते हैं उनके बड़े होकर आक्रामक या हिंसक होने की संभावना अधिक होती है। बच्चा अपने सहपाठियों और शिक्षक के प्रति प्रतिशोध की भावना भी विकसित कर सकता है।
- संबंधों में कठिनाई: जो बच्चे शारीरिक दंड का अनुभव करते हैं उन्हें दूसरों के साथ व्यावहारिक संबंध बनाने में कठिनाई हो सकती है।
