साइंस एडवांसेज़ जर्नल में प्रकाशित एक नए अध्ययन के अनुसार, विश्व ने पृथ्वी की स्थिरता और लचीलेपन को बनाए रखने के लिये आवश्यक नौ ग्रहीय सीमाओं में से छह का उल्लंघन किया है।वैज्ञानिकों ने पृथ्वी के पारिस्थितिकी तंत्र के अंतर्गत उन प्रक्रियाओं की जाँच की है जिन्होंने पिछले 12,000 वर्षों में मानव अस्तित्व के लिये अनुकूल परिस्थितियों को बनाए रखने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
ग्रहीय सीमाएँ
- ग्रहीय सीमाओं की रूपरेखा सबसे पहले वर्ष 2009 में जोहान रॉकस्ट्रॉम और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्ध 28 वैज्ञानिकों के एक समूह द्वारा प्रस्तावित की गई थी ताकि उन पर्यावरणीय सीमाओं को परिभाषित किया जा सके जिनके भीतर मानवता, पृथ्वी की स्थिरता एवं जैवविविधता को बनाए रखने के लिये सुरक्षित रूप से कार्य किया जा सके।
नौ ग्रहीय सीमाएँ
- जलवायु परिवर्तन।
- जीवमंडल अखंडता में परिवर्तन (जैवविविधता हानि और प्रजातियों का विलुप्त होना)।
- समतापमंडलीय ओज़ोन क्षरण।
- महासागर अम्लीकरण।
- जैव-भू-रासायनिक प्रवाह (फास्फोरस और नाइट्रोजन चक्र)।
- भूमि-प्रणाली परिवर्तन (उदाहरण के लिये वनों की कटाई)।
- स्वच्छ जल का उपयोग (भूमि पर संपूर्ण जल चक्र में परिवर्तन)।
- वायुमंडलीय एरोसोल लोडिंग (वायुमंडल में सूक्ष्म कण जो जलवायु और जीवित जीवों को प्रभावित करते हैं)।
- नई संस्थाओं का परिचय (माइक्रोप्लास्टिक्स, अंतःस्रावी अवरोधक और कार्बनिक प्रदूषकों से युक्त)।
ग्रहीय सीमाओं का उल्लंघन
- इन सीमाओं का उल्लंघन किसी तात्कालिक तबाही का संकेत नहीं देता है बल्कि अपरिवर्तनीय पर्यावरणीय परिवर्तनों का खतरा उत्पन्न करता है।
- इससे पृथ्वी पर ऐसी स्थितियाँ उत्पन्न हो सकती हैं जो हमारी वर्तमान जीवनशैली का समर्थन नहीं करेंगी।
