केंद्र सरकार और ऑटोमोटिव टायर मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन के साथ मिलकर पूर्वोत्तर राज्यों में प्राकृतिक रबड़ की खेती व उत्पादन के लिये समर्पित क्षेत्र को विस्तारित करने के लिये एक परियोजना शुरू की है।टायर निर्माताओं ने वर्ष 2021 में शुरू हुई इस पाँच वर्ष की परियोजना के लिये 1,000 करोड़ रुपए के निवेश का आश्वासन दिया है।
भारत में रबड़ बाज़ार की स्थिति
- प्राकृतिक रबड़ एक बहुपयोगी और आवश्यक कच्चा माल है जो कुछ पौधों की प्रजातियों( मुख्य रूप से रबड़ के पेड़) के लेटेक्स अथवा दूधिया तरल पदार्थ से प्राप्त होता है, जिसे वैज्ञानिक रूप से हेविया ब्रासिलिएन्सिस के नाम से जाना जाता है।
- इस लेटेक्स में कार्बनिक यौगिकों का एक जटिल मिश्रण होता है, जिसका प्राथमिक घटक पॉलीआइसोप्रीन नामक बहुलक होता है।
खेती हेतु उपयुक्त जलवायवीय स्थितियाँ
- इसकी खेती के लिये 2000 – 4500 मि.मी. वार्षिक वर्षा वाली उष्णकटिबंधीय जलवायु उपयुक्त होती है।
- इसके लिये 4.5 से 6.0 के अम्लीय pH तथा उपलब्ध फॉस्फोरस की न्यूनतम मात्रा वाली गहरी और लेटराइट उपजाऊ मृदा की आवश्यकता होती है।
- न्यूनतम और अधिकतम तापमान 25 से 34 डिग्री सेल्सियस के बीच होना चाहिये जिसमें 80% सापेक्ष आर्द्रता खेती के लिये आदर्श है।
- तीव्र पवनों की संभावना वाले क्षेत्रों से बचना चाहिये।
- वर्ष भर प्रतिदिन 6 घंटे की दर से प्रति वर्ष लगभग 2000 घंटे तक तेज़ धूप की आवश्यकता होती है।
रबड़ उत्पादन और खपत
- भारत वर्तमान में प्राकृतिक रबड़ का विश्व का पाँचवाँ सबसे बड़ा उत्पादक देश है, तो वहीं यह विश्व स्तर पर इसका दूसरा सबसे बड़ा उपभोक्ता भी है। (भारत की कुल प्राकृतिक रबड़ खपत का लगभग 40% वर्तमान में आयात के माध्यम से पूरा किया जाता है)
रबड़ का वितरण
- वर्तमान में भारत में लगभग 8.5 लाख हेक्टेयर रबड़ के बागान हैं।
- प्रमुख रबड़ उत्पादक राज्यों में शामिल हैं: केरल, तमिलनाडु, त्रिपुरा और असम।
- रबड़ की खेती का एक बहुत बड़ा हिस्सा, लगभग 5 लाख हेक्टेयर, दक्षिणी राज्यों केरल और तमिलनाडु के कन्याकुमारी ज़िले में स्थित है।
- इसके अतिरिक्त, त्रिपुरा रबड़ उत्पादन परिदृश्य में लगभग 1 लाख हेक्टेयर का योगदान करता है।
