भारतीय वैज्ञानिकों ने पहली बार कम तीखी गंध वाली सरसों (Low-Pungent Mustard) विकसित की है जो कीटरोधी होने के साथ रोग प्रतिरोधी भी है। यह गैर-GM और ट्रांसजीन-मुक्त होने के साथ-साथ CRISPR/Cas9 जीन एडिटिंग पर आधारित है।
सरसों की ब्रीडिंग में जीन संपादन का महत्त्व
- भारत में उगाए जाने वाले पारंपरिक सरसों के बीज (ब्रैसिका जंकिया) में ग्लूकोसाइनोलेट्स नामक यौगिकों के लगभग 120-130 भाग प्रति मिलियन (ppm) होते हैं, जो सल्फर और नाइट्रोजन युक्त यौगिकों का एक समूह है तथा उसके तेल और भोजन की विशिष्ट तीक्ष्णता में योगदान देता है।
- ये यौगिक प्राकृतिक रक्षक के रूप में काम करते हैं, पौधे को कीटों और बीमारियों से बचाते हैं।
- इसकी तुलना में कैनोला के बीजों में बहुत कम, लगभग 30 ppm ग्लूकोसाइनोलेट्स होते हैं। इसका निम्न स्तर कैनोला तेल और भोजन को एक विशिष्ट सुखद स्वाद देता है।
- तिलहन से खाना पकाने के लिये तेल प्राप्त होता है और इसमें बना बचा हुआ भोजन एक प्रोटीन युक्त घटक के रूप में पशु आहार में उपयोग किया जाता है। ग्लूकोसाइनोलेट्स से भरपूर रेपसीड मील (एक उच्च गुणवत्ता वाला पशु चारा) पशुओं को खिलाया जाता है लेकिन इसे घास और पानी के साथ मिलाने की आवश्यकता होती है।
- उच्च ग्लूकोसाइनोलेट्स को पशुओं में गण्डमाला (गर्दन की सूजन) और आंतरिक अंग असामान्यताओं का कारण भी माना जाता है।
- वैज्ञानिक कैनोला बीजों के समान सरसों के बीज विकसित करने के लक्ष्य पर काम कर रहे हैं जिनमें ग्लूकोसाइनोलेट्स कम हो।
- हालाँकि सरसों के बीज में ग्लूकोसाइनोलेट्स को कम करने से पौधे की कीटों और बीमारियों से लड़ने की क्षमता कमज़ोर हो सकती है, जो एक चुनौती पेश करती है।
सरसों की ब्रीडिंग में जीन/जीनोम संपादन की भूमिका
- वैज्ञानिक ग्लूकोसाइनोलेट ट्रांसपोर्टर (GTR) जीन के रूप में ज्ञात विशिष्ट जीन को संशोधित करने की दिशा में प्रयास कर रहे हैं।
- ये जीन सरसों के बीज में प्रमुख यौगिक ग्लूकोसाइनोलेट्स के निर्माण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं
- इस संशोधन के लिये वैज्ञानिकों ने CRISPR/Cas9 नामक एक जीन-संपादन तकनीक का उपयोग किया, जो जीन अनुक्रमों को सटीकता से परिवर्तित करने में मदद करता है।
- ‘वरुण’ नामक सरसों की एक विशेष किस्म में शोधकर्ताओं ने 12 GTR जीनों में से 10 पर विशेष अध्ययन किया है।
- इन आनुवंशिक संशोधनों के माध्यम से उन्होंने इन जीनों द्वारा उत्पादित प्रोटीन को निष्क्रिय किया, जिसके परिणामस्वरूप बीजों के भीतर ग्लूकोसाइनोलेट स्तर में काफी कमी देखने को मिली।
कीट प्रतिरोध और पौधों की सुरक्षा पर जीन संपादन के प्रभाव
- संशोधित सरसों के पौधों के बीजों में ग्लूकोसाइनोलेट स्तर कैनोला-गुणवत्ता वाले बीजों के लिये निर्धारित 30 ppm सीमा से कम पाया गया।
- जबकि बीजों के आसपास की पत्तियों और फलियों में ग्लूकोसाइनोलेट्स का स्तर अधिक पाया गया।
- इस वृद्धि को इन यौगिकों के संचरण में उत्पन्न व्यवधान का प्रमुख कारक माना गया। पत्तियों और फलियों में ग्लूकोसाइनोलेट्स का बढ़ा हुआ यह स्तर पौधों की कीटों की प्रतिरोधक क्षमता में वृद्धि करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
- इन आनुवंशिक संशोधनों के परिणामस्वरूप संपादित सरसों में कवक व कीट दोनों के प्रति रक्षा तंत्र मज़बूत होता पाया गया।
