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संयुक्त राष्ट्र 2025 को ग्लेशियरों के संरक्षण का अंतर्राष्ट्रीय वर्ष मानेगा, तथा वर्ष 2025 से प्रतिवर्ष 21 मार्च को विश्व ग्लेशियर दिवस के रूप में मनाया जाएगा।

ग्लेशियर

  • सदियों से जमी बर्फ से धीरे-धीरे विशाल बर्फ के पिंडों का निर्माण होता है, जिन्हें ग्लेशियर के रूप में जाना जाता है।
  • ऐतिहासिक संदर्भ: अधिकांश ग्लेशियर विशाल बर्फ की चादरों के रूप में पाए जाते हैं, जो हिमयुग (लगभग 10,000 वर्ष पूर्व) के दौरान पृथ्वी में पाई जाती थीं। पृथ्वी के इतिहास में कई ऐसे अन्तर-हिमनदी काल रहे हैं जब ग्लेशियर पिघले, तथा हिमयुग (जिन्हें हिमयुग भी कहा जाता है) का निर्माण हुआ।
  • वैश्विक वितरण: अधिकांश ग्लेशियर ध्रुवीय क्षेत्रों जैसे ग्रीनलैंड, कनाडा आर्कटिक और अंटार्कटिका में पाए जाते हैं, क्योंकि उच्च अक्षांशों पर सौर विकिरण कम होता है।उष्णकटिबंधीय ग्लेशियर भूमध्य रेखा के पास पर्वत शृंखलाओं में मौजूद हैं, जैसे दक्षिण अमेरिका में एंडीज पर्वतमाला बहुत ऊँचाई पर स्थित है।पृथ्वी का लगभग 2% जल ग्लेशियरों में संग्रहित है।
  • ग्लेशियरों का पिघलना: बढ़ते ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन ने विशेष रूप से ध्रुवों पर तापमान बढ़ा दिया है, जिसके कारण ग्लेशियर पिघल रहे हैं, जिससे समुद्र के जल स्तर में वृद्धि हो रही हैं।  उत्सर्जन में बड़ी कटौती के बावजूद, 2100 तक विश्व के एक तिहाई से अधिक ग्लेशियर पिघल जायेंगे।

महत्त्व

जल आपूर्ति:  ग्लेशियर लाखों लोगों के लिये पीने के पानी का एक महत्वपूर्ण स्रोत हैं, विशेष रूप से शुष्क क्षेत्रों में।

  • ग्रीष्म ऋतु के अंत में ग्लेशियर अमु दरिया की नदी के प्रवाह का 27% तक प्रदान करते हैं , जबकि ला पाज़ (बोलीविया की राजधानी) शुष्क अवधि के दौरान ग्लेशियरों के पिघले पानी पर निर्भर रहती है ।
  • ग्रीष्म ऋतु के अंत में, ग्लेशियर अमु दरिया के नदी प्रवाह का 27% तक आपूर्ति करते हैं, जबकि शुष्क अवधि के दौरान, बोलीविया की राजधानी ला पाज़, ग्लेशियर के पिघलने पर निर्भर रहती है।
  • भारत स्थित लद्दाख के कृत्रिम हिमनदों में, जिन्हें बर्फ स्तूप कहते हैं, शीत ऋतु में जल संग्रहीत होता है और वसंत ऋतु के दौरान शीत मरुस्थलीय क्षेत्रों की फसलों की सिंचाई की जलापूर्ति इससे की जाती है।
  • पोषक चक्रण: हिमनदों से ऐसे पोषक तत्त्व निर्मुक्त होते हैं जो फाइटोप्लांकटन की वृद्धि में सहायक होते हैं, जो जलीय खाद्य शृंखलाओं का आधार हैं  तथा समुद्री जैवविविधता और मत्स्य पालन को प्रभावित करते हैं।
  • जलवायु नियंत्रण: ग्लेशियर सूर्य प्रकाश को परावर्तित कर (अल्बेडो प्रभाव) पृथ्वी की जलवायु को नियंत्रित करने में भूमिका निभाते हैं, जिससे ग्रह का शीतलन करने में में मदद मिलती है। ऊर्जा उत्पादन: नॉर्वे, कनाडा और न्यूज़ीलैंड जैसे देशों में जलविद्युत शक्ति उत्पन्न करने के लिये हिमनदों के पिघले जल का उपयोग किया जाता है।
  • पर्यटन: क्रायो जैवविविधता को बढ़ावा देने तथा अनुसंधान और शिक्षा के अवसरों के साथ हिमनदों से पर्वतीय क्षेत्रों में पर्यटक आकर्षित होते हैं।

हिमनदों की वर्तमान स्थिति

  • वैश्विक परिदृश्य: विश्व हिमनद अनुवीक्षण सर्विस (WGMS) जो 210,000 हिमनदों का अनुवीक्षण करती है, के अनुसार वर्ष 1976 से 2023 की अवधि में हाल के वर्षों में वृहद स्तर पर विहिमनदन (ग्लेशियरों का पिघलना) दर्ज किया गया है।WGMS समग्र विश्व में ग्लेशियरों की स्थिति की निगरानी और उनका आकलन करता है और संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण, UNESCO और WMO के तत्त्वावधान में कार्य करता है।
  • क्षेत्रीय ग्लेशियर: हिंदू कुश हिमालयी क्रायोस्फीयर का तापन वैश्विक औसत दर से दोगुनी गति से हो रहा है। यह क्षेत्र हिमनदीय झील बहिर्स्फोट बाढ़ जैसी हिम आपदाओं के प्रति सबसे अधिक सुभेद्य है।क्रायोस्फीयर का आशय पृथ्वी तंत्र के हिमशीतित जल वाले भाग से है, जिसमें वे सभी क्षेत्र शामिल हैं जहाँ जल ठोस अवस्था में मौजूद है।
  • ग्लेशियरों का निवर्तन: विशेषज्ञों का अनुमान है कि वर्ष 2030 तक कई महत्त्वपूर्ण ग्लेशियर लुप्त हो जाएंगे तथा कई बड़े ग्लेशियर छोटे ग्लेशियरों में खंडित हो जाएंगे।उदाहरण के लिये, नेपाल की लांगटांग घाटी में याला ग्लेशियर और पश्चिमी कनाडा में पेयतो ग्लेशियर का निवर्तन हुआ।वेनेज़ुएला में हम्बोल्ट ग्लेशियर की सघनता अत्यंत कम हो गई है और अब इसे हिम क्षेत्र के रूप में वर्गीकृत किया गया है।ग्लेशियरों के निवर्तन का अर्थ उनकी सघनता में कमी आना और उनका लोपन हो जाना है।
  • अंतर्राष्ट्रीय प्रतिक्रिया: दिसंबर 2022 में, संयुक्त राष्ट्र महासभा ने ग्लेशियर के ह्रास की तात्कालिकता पर प्रकाश डालने और वैश्विक जागरूकता को बढ़ावा देने के लिये एक प्रस्ताव अपनाया।इसके संबंध में अंतर्राष्ट्रीय ग्लेशियर वर्ष और विश्व ग्लेशियर दिवस जैसी पहल की गई हैं।हिम परतों में विश्व के लगभग 70% अलवणीय जल का भंडारण है, जो वैश्विक जल आपूर्ति हेतु ग्लेशियरों के महत्त्व को उजागर करती है।

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