वर्ष 2024 तक 98.5% ग्रामीण भू-अभिलेखों का डिजिटलीकरण कर दिया गया है, जिससे पारदर्शिता बढ़ने के साथ भूमि संबंधी समस्याओं का समाधान होगा।यह उपलब्धि वर्ष 2008 में शुरू किए गए डिजिटल इंडिया भूमि अभिलेख आधुनिकीकरण कार्यक्रम का हिस्सा है जिसका उद्देश्य कृषि भूमि रिकॉर्ड को डिजिटल तथा आधुनिक बनाना है ताकि इसकी पहुँच में सुधार होने के साथ इससे संबंधित विवादों में कमी आ सके। गाँवों का सर्वेक्षण और ग्रामीण क्षेत्रों में उन्नत प्रौद्योगिकी के साथ मानचित्रण (SVAMITVA) योजना, आवासीय क्षेत्रों से संबंधित भू-अभिलेख तैयार करने से संबंधित है, जिसका उद्देश्य भूमि संबंधी विवादों का समाधान करना, ग्रामीणों को उनकी संपत्तियों के आधार पर बैंक ऋण लेने में मदद करना तथा ग्राम पंचायतों को विकास योजना बनाने तथा संपत्ति कर एकत्र करने में सहायता करना है।
डिजिटल इंडिया भू-अभिलेख आधुनिकीकरण कार्यक्रम
- राष्ट्रीय भू-अभिलेख आधुनिकीकरण कार्यक्रम (NLRMP) को वर्ष 2016 में पुनः आरंभ किया गया और इसका नाम बदलकर डिजिटल इंडिया भू-अभिलेख आधुनिकीकरण कार्यक्रम (DILRMP) कर दिया गया, जो केंद्र द्वारा 100% वित्तपोषण वाली एक केंद्रीय क्षेत्रक योजना है।
- NLRMP एक केंद्र प्रायोजित योजना थी जिसे वर्ष 2008 में देश में भूमि अभिलेख प्रणाली का आधुनिकीकरण करने तथा स्वामित्व गारंटी के साथ निर्णायक भूमि-स्वामित्व प्रणाली को लागू करने के उद्देश्य से शुरू किया गया था।
DILRMP के अंतर्गत प्रमुख पहल
- विशिष्ट भूमि पार्सल पहचान संख्या (ULPIN): ULPIN या ” भू-आधार “प्रत्येक भूमि पार्सल के लिये उसके भू-निर्देशांक के आधार पर 14 अंकों का अल्फान्यूमेरिक कोड है। 29 राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों में कार्यान्वित यह योजना रियल एस्टेट लेन-देन को सुव्यवस्थित करने, संपत्ति विवादों को सुलझाने एवं आपदा प्रबंधन प्रयासों में सुधार करने में सहायक है।
- राष्ट्रीय सामान्य दस्तावेज़ पंजीकरण प्रणाली (NGDRS): NGDRS या ई-पंजीकरण द्वारा देश भर में विलेख/दस्तावेज़ पंजीकरण के लिये एक समान प्रक्रिया प्रदान की गई है जिससे ऑनलाइन प्रविष्टि, भुगतान, नियुक्तियाँ एवं दस्तावेज़ खोज की सुविधा मिलती है।अब तक 18 राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों ने इसे अपनाया है तथा 12 अन्य ने राष्ट्रीय पोर्टल के साथ डेटा साझा किया है।
- ई-न्यायालय एकीकरण: भू-अभिलेखों को ई-न्यायालय से जोड़ने का उद्देश्य न्यायपालिका को प्रामाणिक भूमि संबंधी जानकारी प्रदान करना, मामलों के त्वरित समाधान में सहायता करना और भूमि विवादों को कम करना है। 26 राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों में एकीकरण को मंजूरी दे दी गई है।
- भू-अभिलेखों का लिप्यंतरण: भू-अभिलेखों तक पहुँचने में भाषा संबंधी बाधाओं को दूर करने के लिये, यह कार्यक्रम भूमि दस्तावेज़ों को भारतीय संविधान की अनुसूची VIII में सूचीबद्ध 22 भाषाओं में से किसी एक में लिप्यंतरित कर रहा है।यह योजना 17 राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों में पहले से ही प्रयोग में है।
- भूमि सम्मान: इस पहल के तहत, 16 राज्यों के 168 ज़िलों ने भूमि रिकॉर्ड कंप्यूटरीकरण और मानचित्र डिजिटलीकरण सहित कार्यक्रम के 99% से अधिक मुख्य घटकों को पूरा करने के लिये “प्लैटिनम ग्रेडिंग” हासिल की है।
भारत को डिजिटल भूमि रिकॉर्ड प्रबंधन प्रणाली की आवश्यकता
- भूमि भारत के लिये एक महत्त्वपूर्ण संसाधन है क्योंकि आर्थिक सर्वेक्षण 2023-24 के अनुसार, भारत का 45% से अधिक कार्यबल कृषि में कार्यरत है, जिसके लिये एक आधुनिक और पारदर्शी भूमि रिकॉर्ड प्रबंधन प्रणाली की आवश्यकता है।
- वर्ष 2008 में सरकार ने NLRMP शुरू किया, जिसका नाम वर्ष 2016 में DILRMP रखा गया।
डिजिटल भू-अभिलेखों की आवश्यकता
- समानता सुनिश्चित करना: पारदर्शी भू-अभिलेखों से निष्पक्ष भूमि सुधार संभव होता है, जिससे भूमिहीनों और हाशिये पर पड़े लोगों को लाभ मिलता है। वे महिलाओं और कमज़ोर समूहों को उनके भूमि अधिकारों और संबंधित सेवाओं तक पहुँच सुनिश्चित करके सशक्त बनाते हैं।
- मुकदमेबाज़ी को कम करना: भारत में भूमि विवाद न्यायालयी मामलों में प्रमुख स्थान रखते हैं, जिनमें समय और धन दोनों खर्च होते है। पारदर्शी भूमि रिकॉर्ड प्रबंधन स्पष्ट, सरकार समर्थित स्वामित्व अधिकार सुनिश्चित करके विवादों को कम कर सकता है।
- विकास को बढ़ावा देना: निवेश और विकास के लिये भूमि एक महत्त्वपूर्ण परिसंपत्ति है। सुव्यवस्थित भूमि अभिलेख प्रणालियाँ लेन-देन के जोखिम को कम करती हैं, निवेश को प्रोत्साहित करती हैं, तथा भूस्वामियों को ऋण और बीमा के लिये स्वामित्व का लाभ उठाने में सहायता करती हैं।
- पारदर्शिता में सुधार: भारत के भू-अभिलेख प्रायः पुराने और बिखरे हुए हैं। उन्हें डिजिटल बनाने और स्थानिक तथा आधार जैसे अन्य डेटाबेस के साथ एकीकृत करने से सटीकता और पहुँच में वृद्धि हो सकती है, साथ ही बेनामी संपत्तियों की समस्या का समाधान भी हो सकता है।
DILRMP (भू-अभिलेखों का डिजिटलीकरण) के लाभ
- भू-अभिलेखों की गुणवत्ता में सुधार: DILRMP भूमि स्वामित्व और संव्यवहार अभिलेखों को डिजिटल बनाता है तथा उन्हें अद्यतन करता है, जिससे सटीकता, विश्वसनीयता एवं पारदर्शिता बढ़ाने के लिये उन्हें ऑनलाइन उपलब्ध कराया जा सके।
- मुकदमेबाजी और धोखाधड़ी में कमी: DILRMP का उद्देश्य सरकार समर्थित गारंटी के साथ एक निर्णायक भूमि-शीर्षक प्रणाली स्थापित करना, निर्विवाद स्वामित्व सुनिश्चित करना, शीर्षक दोषों के विरुद्ध क्षतिपूर्ति, और भारत में भूमि विवादों एवं धोखाधड़ी में कमी लाना है।
- वृद्धि एवं विकास को बढ़ावा देना: DILRMP कुशल भूमि बाज़ार की सुविधा प्रदान करता है, लेन-देन के जोखिम को कम करता है, भूमि स्वामित्व का उपयोग करके ऋण तक पहुँच को सक्षम बनाता है, साथ ही कृषि, बुनियादी ढाँचे और आवास में निवेश, औद्योगीकरण एवं क्षेत्रीय विकास को बढ़ावा देता है।
