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भारत ने अपने राजकोषीय घाटे को वित्त वर्ष 2020-21 में महामारी काल के सकल घरेलू उत्पाद के 9.2% के उच्च स्तर से घटाकर वित्त वर्ष 2023-24 में अनुमानित 5.6% कर दिया है, जबकि वित्त वर्ष 2024-25 में इसे 4.9% किये जाने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है ।लक्षित व्यय और बढ़े हुए राजस्व संग्रह के माध्यम से, देश ने राजकोषीय उत्तरदायित्व और बजट प्रबंधन (FRBM) अधिनियम, 2003 के अंतर्गत राजकोषीय समेकन में पर्याप्त प्रगति की है।

राजकोषीय समेकन

  • राजकोषीय समेकन का तात्पर्य दीर्घकालिक आर्थिक स्थिरता सुनिश्चित करने के लिये  सरकारी वित्त के विवेकपूर्ण प्रबंधन से है।
  • यह सरकारी राजस्व (कर और गैर-कर प्राप्तियाँ) को व्यय के साथ संतुलित करने पर केंद्रित है, जिसका उद्देश्य राजकोषीय घाटे को न्यूनतम करना, लोक ऋण को नियंत्रित करना और सतत् आर्थिक विकास में सहायता करना है।

प्रमुख विशेषताएँ

  • विवेकपूर्ण व्यय: बुनियादी ढाँचे, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे आवश्यक, कुशल और उत्पादक क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित किया जाता है।
  • राजस्व अनुकूलन: कर संग्रह को अधिकतम करना, कर चोरी को कम करना और कर आधार को व्यापक बनाना।
  • घाटा नियंत्रण: अत्यधिक उधार लेने से बचने के लिये राजकोषीय घाटे को सीमित किया जाता है।
  • ऋण प्रबंधन: आर्थिक संकटों से बचने के लिये लोक ऋण को धारणीय बनाए रखना।
  • जवाबदेही: अंकेक्षण और विनियमों के अनुपालन के माध्यम से पारदर्शिता सुनिश्चित करना।

महत्त्व

  • समष्टि आर्थिक स्थिरता: इसके माध्यम से सरकारी उधारी में कमी ला कर (मुद्रा का अल्प परिसंचरण) मुद्रास्फीति नियंत्रित होती है, मुद्रा विनिमय दरों में स्थिरता आती है (विनिमय दरों की अस्थिरता में कमी ला कर) और स्थिर आर्थिक विकास सुनिश्चित होता है।
  • ऋण बोझ में कमी: इससे अधारणीय उधारी से बचा जा सकता है, जिससे भावी पीढ़ियों पर बोझ कम हो जाता है।
  • निवेशक विश्वास: घरेलू और विदेशी निवेश आकर्षित करते हुए सुदृढ़ आर्थिक प्रबंधन होता है।
  • कुशल संसाधन उपयोग: इससे व्यर्थ व्यय की रोकथाम होती है और यह सुनिश्चित होता है कि संसाधन विकास प्राथमिकताओं की ओर निर्देशित हों।

राजकोषीय समेकन से आर्थिक स्थिरता और विकास किस प्रकार प्रभावित होता है

  • मुद्रास्फीति नियंत्रण: FRBM अधिनियम, 2003 के तहत, सरकार की उधारी को कम करते हुए वित्तीय वर्ष 2018-19 में राजकोषीय घाटा GDP का 3.4% हो गया जो वित्तीय वर्ष 2013-14 में GDP का 4.5% था।अत्यधिक उधारी और सरकारी खर्च पर अंकुश लगाकर, राजकोषीय समेकन कीमतों को स्थिर रखने और मुद्रास्फीति को नियंत्रण में रखने में मदद करता है।
  • पूंजीगत व्यय में वृद्धि: कोविड-19 महामारी के दौरान, भारत ने MSME और विस्थापित व्यक्तियों जैसे क्षेत्रों पर वित्तीय राहत पर ध्यान केंद्रित किया, जबकि पूंजीगत व्यय को प्राथमिकता दी, जो वित्त वर्ष 2014-15 में सकल घरेलू उत्पाद के 1.6% से बढ़कर वित्त वर्ष 2023-24 में 3.2% हो गया।इससे सुभेद्य क्षेत्रों पर नकारात्मक आर्थिक प्रभाव को कम करने में मदद मिली और महत्त्वपूर्ण बुनियादी ढाँचे में सुधार हुआ जिससे दीर्घकालिक आर्थिक विकास सुनिश्चित हुआ।
  • राजस्व संग्रहण: कर प्रणाली के डिजिटलीकरण से कर संग्रह में अधिक दक्षता आई है, जिससे कर प्राप्तियाँ वित्त वर्ष 2014-15 में सकल घरेलू उत्पाद के 10% से बढ़कर वित्त वर्ष 2023-24 में 11.8% हो गई हैं।कर राजस्व में वृद्धि से सरकार की लोक सेवाओं में निवेश करने की क्षमता का वर्द्धन हुआ।
  • दीर्घकालिक संरचनात्मक सुधार: भारत ने घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा देने के लिये उत्पादन संबद्ध प्रोत्साहन (PLI) योजना शुरू की।इससे वैश्विक व्यापार व्यवधानों और भू-राजनीतिक तनावों के प्रभावों को कम करने में मदद मिली तथा वैश्विक अनिश्चितताओं के बावजूद स्थिर विकास सुनिश्चित हुआ।
  • क्षमता निर्माण: राजकोषीय घाटे में क्रमिक कमी के साथ, भारत निर्यात में अधिक प्रतिस्पर्द्धी बन गया, आयात पर इसकी निर्भरता कम हो गई तथा इसके व्यापार संतुलन में सुधार हुआ। जैसे-जैसे राजकोषीय घाटा कम हुआ और अर्थव्यवस्था अधिक स्थिर हुई, निर्यात में भारत की प्रतिस्पर्द्धात्मकता में सुधार हुआ।

FRBM अधिनियम, 2003

  • परिचय: राजकोषीय घाटे को कम करने और राजकोषीय उत्तरदायित्व को बढ़ावा देने के लिये सरकार में वित्तीय समेकन स्थापित करने हेतु वर्ष 2003 में FRBM अधिनियम अधिनियमित किया गया था।
  • मुख्य विशेषताएँ: संघ और राज्यों द्वारा राजकोषीय घाटे को सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के 3% (संघ) और GSDP (राज्य) के 3% तक कम करना तथा वर्ष 2008 तक राजस्व घाटे को समाप्त करना।  केंद्रीय बजट के साथ मध्यम अवधि की राजकोषीय नीति, व्यापक आर्थिक ढाँचा और राजकोषीय नीति रणनीति विवरण प्रस्तुत करना।
  • छूट संबंधी खंड: FRBM अधिनियम, 2003 की धारा 4(2) के तहत सरकार राष्ट्रीय सुरक्षा/युद्ध की स्थिति, राष्ट्रीय आपदा आदि जैसी स्थितियों में गंभीर आर्थिक संकट के समय अपने राजकोषीय घाटे के लक्ष्य को सकल घरेलू उत्पाद के 0.5% तक बढ़ा सकती है।
  • संशोधन: वर्ष 2012 में इसमें संशोधन करके 0% राजस्व घाटे की आवश्यकता को हटा दिया गया तथा इसके स्थान पर वर्ष 2015 तक 0% प्रभावी राजस्व घाटा अनिवार्य कर दिया गया।प्रभावी राजस्व घाटा का तात्पर्य राजस्व घाटे में से उस धनराशि को घटाना है जो पूंजीगत परिसंपत्तियों के निर्माण के लिये राज्यों को दी गई है।वर्ष 2016 में इस अधिनियम के लक्ष्यों की कठोरता को देखते हुए इसमें सुधार का सुझाव देने के लिये एन.के. सिंह समिति का गठन किया गया था।

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