केंद्रीय आवास एवं शहरी मामलों के राज्य मंत्री द्वारा उपलब्ध आँकड़ों से देश भर में इलेक्ट्रॉनिक तथा विद्युत उपकरणों के बढ़ते उपयोग पर प्रकाश पड़ा है।
ई-अपशिष्ट
- इलेक्ट्रॉनिक अपशिष्ट (ई-अपशिष्ट) से तात्पर्य ऐसे विद्युत एवं इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों से है जो पुराने हो गए हैं या जो कार्यशील नहीं हैं।
- ई-अपशिष्ट में अनेक विषैले रसायन होते हैं जिनमें सीसा, कैडमियम, पारा तथा निकल जैसी धातुएँ शामिल हैं।
भारत में ई-अपशिष्ट की स्थिति
- मात्रा में वृद्धि: भारत में पिछले पाँच वर्षों में ई-अपशिष्ट के उत्पादन में 72.54% की वृद्धि (जो वर्ष 2019-20 के 1.01 मिलियन मीट्रिक टन (MT) से बढ़कर वर्ष 2023-24 में 1.751 मिलियन मीट्रिक टन हो गया है) देखी गई है।
- प्रतिवर्ष लगभग 57% ई-अपशिष्ट (990,000 मीट्रिक टन के बराबर) अनुपचारित रह जाता है।
- भारत के 65 शहरों से कुल ई-अपशिष्ट का 60% से अधिक उत्पादित होता है जबकि 10 राज्यों की कुल ई-अपशिष्ट में 70% भागीदारी है।
- पुनर्चक्रण अंतराल: वर्ष 2023-24 में केवल 43% ई-अपशिष्ट का पुनर्चक्रण (वर्ष 2019-20 में यह 22% था) किया गया।
- ई-अपशिष्ट के प्रबंधन में अनौपचारिक क्षेत्रों का वर्चस्व है तथा इनमें पर्यावरणीय सुरक्षा उपायों का अभाव है।
- वैश्विक संदर्भ: चीन एवं अमेरिका के बाद भारत विश्व स्तर पर तीसरा सबसे बड़ा ई-अपशिष्ट उत्पादक देश है।
- संयुक्त राष्ट्र के अनुमान के अनुसार, वर्ष 2019 में विश्व भर में लगभग 53.6 मीट्रिक टन ई-अपशिष्ट उत्पन्न हुआ।
ई-अपशिष्ट (प्रबंधन) नियम
ई-अपशिष्ट (प्रबंधन) नियम 2022
- विस्तारित उत्पादक उत्तरदायित्व (EPR): उत्पादकों को पंजीकृत पुनर्चक्रणकर्त्ताओं के माध्यम से वार्षिक पुनर्चक्रण लक्ष्य प्राप्त करना अनिवार्य है।.
- EPR प्रमाण-पत्र से पुनर्चक्रित उत्पादों हेतु जवाबदेही सुनिश्चित होती है।
- विस्तारित उत्पाद कवरेज: वित्त वर्ष 2023-24 से इसके तहत 106 विद्युत एवं इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों (EEE) को शामिल किया गया।
- थोक उपभोक्ताओं का एकीकरण: सार्वजनिक संस्थानों एवं कार्यालयों द्वारा पंजीकृत पुनर्चक्रणकर्त्ताओं/नवीनीकरणकर्त्ताओं के माध्यम से ई-अपशिष्ट का निपटान कराने पर ज़ोर दिया गया।
- पंजीकृत पुनर्चक्रणकर्त्ताओं और नवीनीकरणकर्त्ताओं को ई-अपशिष्ट के संग्रहण एवं प्रसंस्करण के प्रबंधन का कार्य सौंपा गया।
- ई-अपशिष्ट (प्रबंधन) द्वितीय संशोधन नियम, 2023: ई-अपशिष्ट (प्रबंधन) नियम, 2022 के नियम 5 के अंतर्गत, प्रशीतन एवं वातानुकूलन विनिर्माण में सुरक्षित, जवाबदेह तथा धारणीय रेफ्रिजरेंट प्रबंधन सुनिश्चित करने के क्रम में खंड 4 जोड़ा गया।
ई-अपशिष्ट (प्रबंधन) संशोधन नियम, 2024
- केंद्र सरकार, केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा जारी दिशा-निर्देशों के अनुसार, उसके अनुमोदन से विस्तारित उत्पादक उत्तरदायित्व प्रमाण-पत्रों के व्यापार हेतु प्लेटफाॅर्म स्थापित कर सकती है।
- केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा विस्तारित उत्पादक उत्तरदायित्व प्रमाण-पत्रों के लिये मूल्य सीमा निर्धारण किया जाएगा जो गैर-अनुपालन के क्रम में पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति का 100% (अधिकतम) एवं 30% (न्यूनतम) होगा।
- ई-अपशिष्ट प्रबंधन से संबंधित राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय कन्वेंशन/अभिसमय कौन-से हैं?
अंतर्राष्ट्रीय
- खतरनाक अपशिष्टों की सीमा पार गतिविधियों एवं उनके निपटान के नियंत्रण पर बेसल कन्वेंशन (1989)।
- भारत बेसल कन्वेंशन का एक पक्षकार है।
- बामाको कन्वेंशन (1991): इसके तहत अफ्रीका में खतरनाक अपशिष्ट (ई-अपशिष्ट सहित) के आयात पर प्रतिबंध लगाया गया है तथा इस महाद्वीप से ऐसे अपशिष्ट की सीमा पार आवाजाही को नियंत्रित किया गया है।
- पारा पर मिनामाता कन्वेंशन (2013)
- भारत ने वर्ष 2018 में मिनामाता कन्वेंशन की पुष्टि की।
- स्टॉकहोम कन्वेंशन ऑन पर्सिस्टेंट ऑर्गेनिक पॉल्यूटेंट्स (POP) (2001)
- भारत ने स्टॉकहोम कन्वेंशन का अनुसमर्थन किया है तथा घरेलू कानूनों के माध्यम से इसके प्रावधानों को क्रियान्वित करने पर ज़ोर दिया है।
राष्ट्रीय
- ई-अपशिष्ट (प्रबंधन) नियम, 2022: इसके तहत EPR और उचित पुनर्चक्रण पर ज़ोर दिया गया है।
- हानिकारक अपशिष्ट (प्रबंधन और पारगमन गतिविधि) नियम, 2016
- रासायनिक एवं अपशिष्ट प्रबंधन के लिये राष्ट्रीय कार्ययोजना: स्टॉकहोम और रॉटरडैम सम्मेलनों के प्रति प्रतिबद्धताओं को प्रतिबिंबित किया गया है।
भारत में ई-अपशिष्ट निपटान के सामान्य तरीके
- लैंडफिलिंग: इसके तहत ई-अपशिष्ट को मृदा के अंदर डंप करना शामिल है।एक गंभीर चिंता का विषय यह है कि संकटजनक पदार्थों का मृदा और भूजल में रिसकर पर्यावरण को नुकसान पहुँचने का खतरा है।
- भस्मीकरण (Incineration): उच्च तापमान (900-10,000 डिग्री सेल्सियस) पर ई-अपशिष्ट का नियंत्रित विधि से दहन करने से अपशिष्ट की मात्रा कम हो जाती है और कुछ संकटजनक पदार्थ निष्प्रभावी हो जाते हैं।
- पुनर्चक्रण: मूल्यवान सामग्री (जैसे- धातु, प्लास्टिक) को पुनः प्राप्त करने के लिये ई-अपशिष्ट को नष्ट करना और विषाक्त घटकों का सुरक्षित रूप से विनष्टीकरण करना। यह पारा, कैडमियम और सीसा जैसे संकटजनक पदार्थों को कम करता है, जिससे पर्यावरण एवं स्वास्थ्य जोखिम कम होते हैं।
- उदाहरण: मुद्रित सर्किट बोर्ड, सी.आर.टी., मोबाइल फोन और तारों का पुनर्चक्रण।
