श्रीनगर में हाल ही में एक शिल्प विनियमन पहल का आयोजन किया गया, जिसके तहत साझा विरासत और सांस्कृतिक संबंधों के क्रम में 500 वर्षों के बाद कश्मीरी एवं मध्य एशियाई कारीगरों को एक साथ लाया गया। इस कार्यक्रम में विश्व शिल्प परिषद (WCC) द्वारा श्रीनगर को “वर्ल्ड क्राफ्ट सिटी” के रूप में मान्यता दिये जाने को सराहा गया।
मध्य एशिया ने श्रीनगर में शिल्प के विकास को किस प्रकार प्रभावित किया
- ऐतिहासिक शिल्प संबंध: कश्मीर के 9वें सुल्तान ज़ैन-उल-आबिदीन (15वीं शताब्दी) ने समरकंद, बुखारा तथा फारस के कारीगरों की सहायता से मध्य एशियाई शिल्प तकनीकों को कश्मीर में लाने को प्रेरित किया। उनके शासनकाल के बाद ये संबंध कमज़ोर हो गए तथा वर्ष 1947 तक समाप्त हो गए।ऐतिहासिक सिल्क रूट पर स्थित श्रीनगर सांस्कृतिक, आर्थिक तथा कलात्मक आदान-प्रदान का केंद्र बन गया। इस अंतर-सांस्कृतिक संपर्क से कश्मीर के विशिष्ट शिल्प के विकास में काफी प्रगति हुई।
शिल्प कौशल तकनीकें
- काष्ठ नक्काशी: कश्मीरी कारीगर, जो अपनी जटिल काष्ठ कारीगरी के लिये जाने जाते हैं, ने मध्य एशिया से तकनीकों को ग्रहण किया। जबकि कश्मीरी काष्ठ नक्काशीकार विस्तृत डिज़ाइन के लिये छेनी और हथौड़ों का इस्तेमाल करते थे, ईरानी काष्ठ नक्काशीकार आमतौर पर पुष्प रूपांकनों के लिये एक ही छेनी का इस्तेमाल करते थे।
- कालीन बुनाई: कश्मीर की कालीन बुनाई फारसी तकनीक से प्रभावित थी।फारसी गाँठें बनाने की पद्धति, जिसमें फारसी बफ़ और सेहना गाँठें शामिल हैं, को कश्मीरी कालीनों में शामिल किया गया। इसके अतिरिक्त कश्मीर के कालीन डिज़ाइनों का नाम ईरानी शहरों जैसे काशान और तबरीज़ के नाम पर रखा गया है, जो सांस्कृतिक संबंधों को उज़ागर करते हैं तथा कारीगरों के बीच आदान-प्रदान से कौशल में वृद्धि होती है, इससे शिल्प कौशल को प्रेरणा मिलती है।
- कढ़ाई: उज़्बेकिस्तान की सुज़ानी कढ़ाई को कश्मीर के सोज़िनी कढ़ाई का अग्रदूत माना जाता है। तकनीक, कलर पैलेट और पुष्प रूपांकनों में समानताएँ देखी गईं।
वर्ल्ड क्राफ्ट सिटी/विश्व शिल्प शहर
- विश्व शिल्प परिषद (AISBL) (WCC-इंटरनेशनल) द्वारा WCC-विश्व शिल्प शहर कार्यक्रम के तहत वर्ष 2014 में आरंभ की गई ” विश्व शिल्प शहर” पहल, शिल्प के माध्यम से सांस्कृतिक, आर्थिक और सामाजिक विकास में योगदान के लिये शहरों को मान्यता देती है।
- वर्ष 1964 में एक गैर-लाभकारी संगठन के रूप में स्थापित WCC AISBL का उद्देश्य सांस्कृतिक और आर्थिक जीवन में शिल्प की स्थिति को बढ़ाना और समर्थन एवं मार्गदर्शन के माध्यम से शिल्पियों के बीच भाईचारे को बढ़ावा देना है।
- भारतीय शहर: श्रीनगर (जम्मू और कश्मीर), जयपुर (राजस्थान), मामल्लपुरम (तमिलनाडु) और मैसूर (कर्नाटक) को WCC द्वारा विश्व शिल्प शहरों के रूप में मान्यता दी गई है।
- WCC ने कश्मीर के हस्तशिल्प के लिये ‘शिल्प की प्रामाणिकता की मुहर’ की घोषणा की, जो जम्मू-कश्मीर के हस्तनिर्मित उत्पादों को प्रमाणित करता है। इस पहल का उद्देश्य कपड़ा उद्योग में वैश्विक मान्यता प्रदान करना और गुणवत्ता को बढ़ाना है।
श्रीनगर के प्रमुख शिल्प
- पश्मीना शॉल: अपनी उत्कृष्ट गुणवत्ता और जटिल हस्तनिर्मित पैटर्न के लिये जानी जाने वाली पश्मीना शॉल कश्मीर से आती हैं, जहाँ पश्मीना कपड़े को हाथ से काता और बुना जाता है। मुगल सम्राट अकबर ने शाही परिवार के लिये शॉल बनवाने का काम शुरू करके इस शिल्प को बढ़ावा दिया।
- कश्मीरी कालीन: अपनी समृद्ध डिजाइनों, विशेष रूप से पारंपरिक फारसी शैली की कालीनों के लिये प्रसिद्ध। हाथ से बुनी गई अनूठी कश्मीरी कालीनों में डिज़ाइन निर्देशों के लिये तालीम नामक कोडित लिपि का उपयोग किया जाता है। इन कालीनों में पारंपरिक प्राच्य और पुष्प रूपांकनों की विशेषता है और इन्हें रेशम और ऊन जैसी विभिन्न सामग्रियों से बनाया जाता है।
- पेपर मेशी (Paper Mâché): यह परंपरागत रूप से चित्रित और रोगन किये गए ढाले हुए कागज़ के गूदे से वस्तुएँ बनाने की कला है।कश्मीर में इसकी शुरुआत कलमदान से हुई और बाद में यह सतह सजावट (नक्काशी) की एक विशिष्ट कला के रूप में विकसित हुई।
- कशीदाकारी वस्त्र: सुज़नी और आरी जैसी उत्कृष्ट कढ़ाई तकनीकें, जिनका उपयोग वस्त्रों और सहायक वस्तुओं में किया जाता है।सोज़नी शॉल की उत्पत्ति कश्मीर से हुई है, फ़ारसी में “सोज़नी” का अर्थ सुई होता है।
- लकड़ी की नक्काशी: अखरोट की लकड़ी पर नक्काशी करके जटिल डिजाइनों से सुंदर फर्नीचर और घरेलू सजावट बनाई जाती है।
- ताँबे के बर्तन: पारंपरिक कश्मीरी धातु शिल्प, विशेष रूप से ताँबे के समोवर और चाय के सेट। यह कश्मीर की प्राचीन विरासत का हिस्सा है, जहाँ धातुकर्म में कुशल कारीगर काम करते हैं।
- खतमबंद: यह अखरोट या देवदार की लकड़ी के छोटे-छोटे टुकड़ों को बिना कील का उपयोग किये ज्यामितीय पैटर्न में व्यवस्थित करके छत बनाने की एक हस्तनिर्मित कला है।
| वर्ष 2021 में, श्रीनगर शहर को शिल्प और लोक कलाओं के लिये UNESCO (संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक संगठन) क्रिएटिव सिटी नेटवर्क (UCCN) के हिस्से के रूप में एक रचनात्मक शहर नामित किया गया था। UCCN में शामिल अन्य भारतीय शहरों में जयपुर को ‘शिल्प और लोक कला का शहर’ (2015), वाराणसी को ‘संगीत का रचनात्मक शहर’ (2015), चेन्नई को ‘संगीत का रचनात्मक शहर’ (2017), मुंबई को ‘फिल्म का शहर’ (2019), हैदराबाद को ‘पाक-कला का शहर’ (2019), कोझीकोड को ‘साहित्य का शहर’ (2023) और ग्वालियर को ‘संगीत का शहर’ (2023) शामिल हैं। |
