बलुआ पत्थर और लकड़ी जैसी सामग्रियों का परिवहन सोन भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण (ASI) ने पटना के कुम्हरार स्थित मौर्यकालीन पुरातात्त्विक स्थल पर 80 स्तंभों वाले सभा भवन के अवशेषों को उज़ागर करने के प्रयास शुरू किये हैं। इस पहल से मौर्य साम्राज्य और वास्तुकला में उनके योगदान की प्रति कला रुचि पुनः जागृति होने का वादा करती है।
कुम्हरार के 80 स्तंभों वाले सभा भवन के बारे में मुख्य तथ्य
- ऐतिहासिक महत्त्व: कुम्हरार का 80 स्तंभों वाला सभा भवन, मौर्य साम्राज्य (321-185 ईसा पूर्व) से जुड़ा हुआ है, जो प्राचीन भारत के महानतम राजवंशों में से एक था।
- ऐसा माना जाता है कि सम्राट अशोक (268-232 ईसा पूर्व) ने इस हॉल में तृतीय बौद्ध संगीति बुलाई थी, जिसका उद्देश्य खंडित बौद्ध संघ को एकीकृत करना और धम्म (बौद्ध शिक्षाओं) का प्रचार करना था।
- यह घटना बौद्ध धर्म को वैश्विक धर्म के रूप में स्थापित करने में महत्त्वपूर्ण थी।
- यह स्थल मौर्य साम्राज्य के राजनीतिक और सांस्कृतिक केंद्र के रूप में पाटलिपुत्र (मौर्य राजधानी) की भूमिका की पुष्टि करता है।
- वास्तुशिल्पीय महत्त्व: इस हॉल में 80 बलुआ पत्थर के खंभे हैं जो लकड़ी की छत और फर्श को सहारा देते हैं।
- -गंगा नदी मार्ग से किया जाता था, जो मौर्य काल के दौरान उन्नत योजना और संसाधन प्रबंधन को दर्शाता है।
पुरातात्त्विक खोजें:
- प्रथम उत्खनन (1912-1915): एक अक्षुण्ण स्तंभ, अन्य स्तंभों के स्थान को चिह्नित करने वाले 80 गड्ढे, तथा पत्थर के टुकड़े मिले।
- राख की मोटी परतों के साक्ष्य से पता चलता है कि यह विनाश आग से हुआ था, संभवतः इंडो-यूनानी आक्रमण के दौरान या बाद में हूणों के आक्रमण के दौरान।
- दूसरा उत्खनन (1961-1965): चार अतिरिक्त स्तंभ मिले।
- संरक्षण चुनौतियाँ: जल स्तर बढ़ने के कारण यह स्थल आंशिक रूप से जलमग्न हो गया, जिसके कारण ASI को संरक्षण उपाय के रूप में वर्ष 2004-2005 में इसे मृदा से ढकना पड़ा।
- असेंबली हॉल का पुनः उद्घाटन: पटना में घटते भूजल स्तर और मौर्यकालीन विरासत में बढ़ती रुचि के कारण ASI इस स्थल का उद्घाटन कर रहा है।
- प्रारंभ में, केंद्रीय भूजल बोर्ड के सहयोग से, आर्द्रता और भूजल प्रभावों का अध्ययन करने के लिये 6-7 स्तंभों को उज़ागर किया जाएगा।
- इसके पश्चात् एक विशेषज्ञ समिति 80 स्तंभों को पूर्ण रूप से पुनः खोलने पर निर्णय लेगी, जिसमें संरक्षण और सार्वजनिक पहुँच के बीच संतुलन बनाया जाएगा।
मौर्यकला और स्थापत्य की मुख्य विशेषताएँ
- स्थापत्य के प्रकार: मौर्य स्थापत्य को दरबारी कला (राजनीतिक और धार्मिक उद्देश्यों हेतु सुरचित) और लोकप्रिय कला (व्यापक रूप से सुलभ और स्थानीय परंपराओं से प्रभावित) में वर्गीकृत किया गया है ।
मौर्य दरबार कला
- महल: यूनानी इतिहासकार मेगस्थनीज ने मौर्य साम्राज्य के महलों की प्रशंसा करते हुए उन्हें उल्लेखनीय रचना बताया, जबकि चीनी यात्री फाह्यान ने इन्हें ईश्वर प्रदत्त स्मारक कहा। चंद्रगुप्त मौर्य का महल पर्सेपोलिस (अकेमेनिड साम्राज्य की राजधानी) के अकेमेनिड महलों से प्रभावित था। निर्माण में प्रयुक्त होने वाली प्राथमिक सामग्री लकड़ी थी।
- उदाहरण: कुम्रहार में अशोक का महल और चंद्रगुप्त का महल।
- स्तम्भ: मौर्य स्तंभ ऊँचे, स्वतंत्र, अखंड हैं तथा चुनार से प्राप्त बलुआ पत्थर से निर्मित हैं। इसमें चमकदार पॉलिश है, ये अकेमेनियन स्तंभों से प्रभावित हैं। मौर्यकालीन स्तंभ चट्टानों को काटकर बनाए गए हैं, जो नक्काशी के कौशल को दर्शाते हैं, जबकि अकेमेनियाई स्तम्भों का निर्माण टुकड़ों में किया गया था।उत्तर भारत में पाए जाने वाले अशोक के स्तंभों में प्रायः शेर और बैल जैसी पशु आकृतियाँ अंकित होती हैं, जो राजकीय प्रतीक हैं। इन्हें बौद्ध शिक्षाओं और दरबारी आदेशों के प्रसार के लिये बनवाया गया था, जिन पर पाली, प्राकृत, ग्रीक और आरमेइक भाषा में शिलालेख अंकित थे।
- मौर्य स्तंभों की संरचना में चार भाग हैं: जिसमें एकचट्टानी शाफ्ट, एक कमल या घंटी के आकार का शीर्ष, एक स्तंभ और एक शीर्ष आकृति शामिल है।
- अकेमेनियन स्तंभों के साथ समानताओं में पॉलिश किये गए पत्थर और कमल जैसी आकृतियाँ, साथ ही उद्घोष अंकित करने की प्रथा शामिल है।
- स्तूप: सामान्यतः स्तूपों में एक बेलनाकार ड्रम, एक अर्द्धगोलाकार टीला (अंडाकार), एक हर्मिका (वर्गनुमा रेलिंग), और एक छत्र (तीन छतरी के आकार को सहारा देने वाला केंद्रीय स्तंभ) होता है, जो बौद्ध सिद्धांतों का प्रतिनिधित्व करता है।
- स्तूप का मुख्य भाग कच्ची ईंटों से निर्मित था, जबकि बाह्य सतह पर पकी हुई ईंटों का प्रयोग किया गया था, जिसे प्लास्टर से ढका गया था तथा लकड़ी की मूर्तियों से सजाया गया था।
- साँची स्तूप (मध्य प्रदेश), सबसे प्रसिद्ध अशोक स्तूप। पिपरहवा स्तूप (उत्तर प्रदेश) सबसे प्राचीन।
- बुद्ध की मृत्यु के पश्चात् के अन्य स्तूप: राजगृह, वैशाली, कपिलवस्तु, अल्लकप्पा, रामग्राम, वेथापिडा, पावा, कुशीनगर, पिप्पलिवन।
मौर्य लोकप्रिय कला
- गुफा स्थापत्य: मौर्य काल के दौरान, जैन और बौद्ध भिक्षुओं द्वारा गुफाओं का उपयोग विहार के रूप में किया जाता था। अत्यधिक नक्काशीयुक्त अंदरूनी भाग और सजावटी प्रवेश द्वार इनकी विशेषता है।
- उदाहरण: बिहार में बराबर गुफाएँ (4 गुफाएँ), अशोक द्वारा आजीविक संप्रदाय के लिये निर्मित (गोशाला मस्करीपुत्र द्वारा स्थापित, इस बात पर बल दिया गया कि ब्रह्मांड नियति (भाग्य) द्वारा शासित था)।
- मूर्तियाँ: यक्ष और यक्षिणी की मूर्तियों की पूजा जैन धर्म, हिंदू धर्म और बौद्ध धर्म में की जाती थी।
- उदाहरण: लोहानीपुर यक्ष (नग्न पुरुष आकृति का धड़), और दीदारगंज यक्षिणी, पटना आदि।
- मृद्भांड: उत्तरी कृष्ण मार्जित मृद्भाण्ड (NBPW) के रूप में पहचाने जाने वाले मौर्यकालीन मृद्भांडो पर काला रंग और चमकदार सतह होती थी, जिसका उपयोग प्रायः विलासिता की वस्तुओं के लिये किया जाता था।
मौर्य साम्राज्य
- चन्द्रगुप्त मौर्य (321-297 ईसा पूर्व): मौर्य साम्राज्य के संस्थापक ने नंद वंश को समाप्त कर हिंदू कुश जैसे क्षेत्रों पर कब्जा करके साम्राज्य का विस्तार किया।
- 305-303 ईसा पूर्व में, उन्होंने सेल्यूकस निकेटर के साथ एक संधि की, जिससे उन्हें अतिरिक्त क्षेत्र प्राप्त हुए। बाद में चंद्रगुप्त जैन धर्म के अनुयायी बन गए।
- चाणक्य, चंद्रगुप्त मौर्य (322 ईसा पूर्व – 297 ईसा पूर्व) और उनके उत्तराधिकारी बिंदुसार के शासनकाल के दौरान प्रधानमंत्री थे। साम्राज्य की सफलता में चाणक्य ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
- बिंदुसार (298-272 ई.पू.): साम्राज्य का विस्तार दक्कन तक किया, जिसे “अमित्रघात” (शत्रुओं का नाश करने वाला) के नाम से जाना जाता है। बिंदुसार ने आजीविक संप्रदाय को अपनाया। डेमेकस उनके दरबार में एक यूनानी राजदूत था।
- अशोक (272-232 ईसा पूर्व): कलिंग युद्ध के बाद, जिसमें भारी जनहानि हुई, उन्होंने बौद्ध धर्म को अपना लिया तथा अपने धम्म (नैतिक कानून) के माध्यम से शांति को बढ़ावा दिया। उन्होंने तीसरी बौद्ध परिषद का आयोजन किया और बौद्ध धर्म को विश्व स्तर पर फैलाया।
- दशरथ (232-224 ई.पू.): शाही शिलालेख जारी करने वाले अंतिम मौर्य शासक दशरथ थे, जिन्हें क्षेत्रीय संघर्ष का सामना करना पड़ा।
- सम्प्रति (224-215 ईसा पूर्व): विघटित क्षेत्रों पर मौर्य नियंत्रण पुनः स्थापित किया और जैन धर्म को बढ़ावा दिया।
- शालिशुक (215-202 ईसा पूर्व): नकारात्मक प्रतिष्ठा के रूप में एक आक्रमणकारी शासक के रूप में जाना जाता था।
- देववर्मन (202-195 ईसा पूर्व): संक्षिप्त शासनकाल, पुराणों में उल्लेखित।
- शतधन्वन (195-187 ईसा पूर्व): बाहरी आक्रमणों के कारण कई क्षेत्रो का विघटन।
- बृहद्रथ (187-185 ईसा पूर्व): अंतिम मौर्य सम्राट, पुष्यमित्र शुंग द्वारा हत्या, मौर्य वंश के पतन का प्रतीक।
