मत्स्यपालन विभाग, मत्स्यपालन, पशुपालन और डेयरी मंत्रालय ने राज्य सरकारों, अनुसंधान संस्थानों और अन्य संबंधित एजेंसियों के सहयोग से भारत में प्राकृतिक पर्ल फार्मिंग को बढ़ावा देने हेतु कई पहल की हैं।
पर्ल फार्मिंग
- पर्ल फार्मिंग/मोती उत्पादन के बारे में: पर्ल फार्मिंग एक नियंत्रित वातावरण में मीठे अथवा खारे जल के सीपों के अंदर पर्ल अथवा मोती उत्पादन की प्रक्रिया है।
- इसमें मोलस्क के शरीर में एक क्षोभक अथवा उत्तेजक पदार्थ (नाभिक) डालकर मोती उत्पादन की प्रक्रिया शामिल है, जो उसके चारों ओर नैक्रे की परतें स्रावित करता है। समय के साथ, ये परतें मोती का रूप ले लेती हैं।
- नैक्रे (मदर ऑफ पर्ल) एक कार्बनिक-अकार्बनिक मिश्रित पदार्थ है, जो कुछ मोलस्क द्वारा आंतरिक खोल/आवरण की परत के रूप में निर्मित होता है। यह पदार्थ मज़बूत, लचीला और इंद्रधनुषी चमक वाला होता है और इसी से मोती बनते हैं।
- इस वैज्ञानिक और व्यावसायिक प्रक्रिया में नियंत्रित परिस्थितियों में उच्च गुणवत्ता वाले मोती का उत्पादन करने के लिये मोलस्क की प्राकृतिक जैविक प्रक्रिया का उपयोग किया जाता है।
- मोलस्क कोमल शरीर वाले अकशेरुकी हैं जो समुद्री, मीठे जल, खारे जल या स्थलीय वातावरण में पाए जाते हैं, जैसे घोंघा, ऑक्टोपस, सीप।
प्रक्रिया: मीठे अथवा ताज़े जल में पर्ल का उत्पादन करने की प्रक्रिया में क्रमिक रूप से छह प्रमुख चरण शामिल हैं
- सीपियों (mussels) का संग्रह
- प्री-ऑपरेटिव कंडीशनिंग (सीपियों को एक साथ संकुल स्थिति में रखना)
- प्रत्यारोपण (सीपी में नाभिक या ग्राफ्ट ऊतक का अंतर्वेशन)
- पोस्ट ऑपरेटिव केयर (एंटीबायोटिक उपचार)
- तालाब में संवर्द्धन (12-18 माह)
- मोतियों को एकत्रित करना
पर्ल/मोती उत्पादन
- वैश्विक – ताज़े जल के मोतियों की बात की जाए तो चीन वैश्विक रूप से इस प्रकार के पर्ल उत्पादन में अग्रणी है, इसके बाद जापान, ऑस्ट्रेलिया, इंडोनेशिया और फिलीपींस का स्थान है।
- भारत – गुजरात, महाराष्ट्र, बिहार, ओडिशा, केरल, राजस्थान, झारखंड, गोवा और त्रिपुरा में पर्ल उत्पादन किया जा रहा है।
- वर्ष 2022 में, भारत विश्व भर में मोतियों का 19वाँ सबसे बड़ा निर्यातक था, जिसने 3.79 मिलियन अमरीकी डॉलर मूल्य के मोतियों का निर्यात किया।
भारत में पर्ल उत्पादन की चुनौतियाँ
- ताज़े जल के मोती अथवा फ्रेशवाटर पर्ल का उत्पादन करने वाले किसानों की संख्या सीमित है तथा इससे संबंधित संगठित क्षेत्र का अभाव है।
- विविध कृषि-जलवायु क्षेत्रों के अनुरूप ब्रूडस्टॉक प्रबंधन, प्रजनन और जल गुणवत्ता के लिये मानकीकृत प्रोटोकॉल का अभाव है।
- मसल ब्रूडस्टॉक (प्रजनन योग्य परिपक्व वयस्क जो प्रजनन करते हैं और अधिक संख्या में संतति प्रदान करते हैं) की छिट पुट उपलब्धता तथा अपर्याप्त अनुसंधान समर्थन।
- मौजूदा प्रौद्योगिकियों के प्रसार अपर्याप्त विस्तार नेटवर्क।
भारत में प्राकृतिक पर्ल फार्मिंग हेतु सरकार की पहल
प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना
- PMMSY के तहत सरकार ने विभिन्न राज्यों एवं केंद्रशासित प्रदेशों में 461 लाख रुपए के कुल निवेश के साथ मसल्स, क्लैम्स तथा मोती सहित बाइवाल्व उत्पादन इकाइयों की स्थापना को मंज़ूरी दी है।
- इसके अतिरिक्त विशेष पर्ल उत्पादन क्लस्टरों सहित मत्स्य पालन एवं जलकृषि क्लस्टरों के विकास के मार्गदर्शन हेतु एक मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) अपनाई गई है।
पर्ल उत्पादन क्लस्टर
- झारखंड के हज़ारीबाग में पहला पर्ल उत्पादन क्लस्टर स्थापित किया गया है। TRIFED (भारतीय जनजातीय सहकारी विपणन विकास संघ) ने भी आदिवासी क्षेत्रों में पर्ल उत्पादन को बढ़ावा देने हेतु झारखंड स्थित पूर्ति एग्रोटेक के साथ समझौता किया है।
नीली क्रांति के तहत सहायता
- मत्स्य पालन विभाग ने इस क्षेत्र को प्रोत्साहित करने के लिये नीली क्रांति योजना में पर्ल उत्पादन हेतु एक उप-घटक को शामिल किया है।
प्रशिक्षण एवं क्षमता निर्माण
- भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) संस्थानों द्वारा मीठे जल के पर्ल फार्मिंग और सी पर्ल फार्मिंग दोनों पर 1900 से अधिक प्रतिभागियों को प्रशिक्षण दिया गया है।
