सर्वोच्च न्यायालय ने संविधान की प्रस्तावना में ‘धर्मनिरपेक्ष, समाजवाद’ शब्दों को बरकरार रखा।
‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्द का अर्थ है एक ऐसा गणराज्य जो सभी धर्मों के लिए समान सम्मान रखता है।
‘समाजवादी’ एक ऐसा गणराज्य है जो शोषण के सभी रूपों को खत्म करने के लिए समर्पित है।
यह फैसला 1976 में 42वें संविधान संशोधन के माध्यम से प्रस्तावना में ‘समाजवादी’ और ‘धर्मनिरपेक्ष’ को शामिल करने की वैधता को चुनौती देने के लिए 2020 में दायर याचिकाओं के एक समूह पर आया।
उन्होंने तर्क दिया कि संविधान सभा द्वारा ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्द को जानबूझकर हटा दिया गया था।
न्यायालय ने माना कि प्रस्तावना संविधान का हिस्सा है और संसद के पास अनुच्छेद 368 के तहत संविधान में संशोधन करने की शक्ति है।
न्यायालय ने माना कि भारत ने धर्मनिरपेक्षता की अपनी व्याख्या विकसित की है जिसके तहत सरकार न तो किसी धर्म का समर्थन करती है और न ही किसी धर्म के पेशे और अभ्यास को दंडित करती है।