तमिलनाडु के तिरुवल्लूर ज़िले के मप्पेडु गाँव स्थित श्री सिंगेश्वर मंदिर में 16वीं शताब्दी के दो पृष्ठों वाले ताम्रपत्र अभिलेख के एक समूह की खोज की गई है।तांबे की प्लेटों के दो पृष्ठों/पत्तों को एक अंगूठी की सहायता से आपस में पिरोया गया है जिस पर विजयनगर साम्राज्य की मुहर बनी हुई है।चंद्रगिरी के राजा द्वारा ब्राह्मणों को एक गाँव दान में देने का उल्लेख करने वाला अभिलेख संस्कृत और नंदीनगरी लिपि में लिखा गया है। इसे राजा कृष्णदेवराय के शासनकाल के दौरान 1513 ई. में उत्कीर्ण किया गया था।
राजा कृष्णदेवराय
कृष्णदेवराय का शासनकाल
- विजयनगर साम्राज्य पर 1509 से 1529 ई. तक कृष्णदेवराय का शासन रहा।
- कृष्णदेव राय के बाद, 1530 ई. में अच्युत राय और उसके बाद 1542 ई. में सदा शिव राय ने शासन संभाला।
- उन्हें विभिन्न उपाधियों से जाना जाता था, जिनमें “कन्नड़राय (Kannadaraya)” और “कन्नड़ राज्य रामरमण (Kannada Rajya Ramaramana)” शामिल थे।
- उन्हें भारतीय इतिहास के सबसे महान राजनेताओं में से एक माना जाता है तथा उन्हें मध्यकालीन दक्षिण भारत के सबसे महत्त्वपूर्ण शासकों में से एक माना जाता है।
साहित्यिक योगदान
- वह एक प्रख्यात विद्वान थे और उन्होंने मदालसा चरित, सत्यवेदु परिणय, रसमंजरी, जाम्बवती कल्याण (Jambavati Kalyana) और अमुक्तमालक्यदा (Amuktamalkyada) जैसी रचनाएँ लिखीं।
- अनेक भाषाओं में निपुण होने के कारण उन्होंने संस्कृत, तेलुगु, तमिल और कन्नड़ में लिखने वाले कवियों को सहयोग दिया।
शिक्षा और साहित्य का संरक्षण
- उनके दरबार में अष्टदिग्गज, आठ प्रमुख विद्वान शामिल थे, उनमें अल्लासानि पेद्दन्ना भी शामिल थे, जिन्हें आंध्र-कवितापितामह के नाम से जाना जाता था, जो अपने कार्य मनुचरितमु के लिये प्रसिद्ध थे।
- कन्नड़ कवि थिमन्ना ने कृष्णदेवराय के अनुरोध पर कन्नड़ महाभारत को पूरा किया, जो मूल रूप से कुमार व्यास द्वारा शुरू किया गया था।
- उनके शासनकाल के दौरान अन्य उल्लेखनीय कवियों को संरक्षण प्राप्त हुआ।
- कन्नड़ कवि मल्लनार्य, वीरशैवमृत और भावचिंतरत्न के लेखक।
- चतु विट्ठलनाथ , जिन्होंने भागवत लिखी।
- तिम्मन्ना कवि अपनी स्तुति कृष्णराय भरत के लिये जाने जाते हैं।
- तेलुगु कवि पेद्दन्ना को तेलुगु और संस्कृत में उनकी दक्षता के लिये सम्मानित किया गया।
सांस्कृतिक विकास
- कृष्णदेवराय ने कर्नाटक संगीत परंपरा को पोषित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
- उन्होंने भरतनाट्यम और कुचिपुड़ी सहित शास्त्रीय नृत्य शैलियों को भी प्रोत्साहित किया।
बुनियादी ढाँचा विकास
- उन्हें कुछ बेहतरीन मंदिरों के निर्माण और कई महत्वपूर्ण दक्षिण भारतीय मंदिरों में प्रभावशाली गोपुरम जोड़ने का श्रेय दिया जाता है।
- उन्होंने विजयनगर के निकट अपनी माँ के नाम पर नागलपुरम नामक एक उपनगरीय नगर भी बसाया।
विजयनगर साम्राज्य के प्रमुख बिंदु
साम्राज्य की स्थापना और अवधि
- विजयनगर साम्राज्य की स्थापना 1336 ई. से दक्कन क्षेत्र में हुई थी, जिसकी स्थापना हरिहर (जिसे हक्का भी कहा जाता है) और उनके भाई बुक्का राय ने की थी।
- उन्होंने हम्पी को राजधानी शहर बनाया (जिसे वर्ष 1986 में यूनेस्को द्वारा विश्व धरोहर स्थल घोषित किया गया)।
- विजयनगर साम्राज्य पर चार महत्त्वपूर्ण राजवंशों (संगामा, सलुवा, तुलुवा, अरविडु) का शासन था।
- यह साम्राज्य 1336 ई. से लेकर लगभग 1660 ई. तक चला, हालाँकि अंतिम शताब्दी में दक्कन सल्तनतों के गठबंधन द्वारा विनाशकारी पराजय के बाद इसे धीरे-धीरे पतन का सामना करना पड़ा, जिसके परिणामस्वरूप राजधानी पर कब्ज़ा कर उसे नष्ट का दिया गया।
पुर्तगाली संबंध
- वर्ष 1510 के आसपास पुर्तगालियों ने विजयनगर के सहयोग से बीजापुर के सुल्तान के अधीन गोवा पर कब्जा कर लिया।
- पुर्तगालियों ने विजयनगर साम्राज्य को बंदूकें और अरबी घोड़े उपलब्ध कराए, जबकि कपास, चावल, चीनी, मसाले, नील और लकड़ी के सामान निर्यात किया गया।
सांस्कृतिक एवं स्थापत्य कला का उत्कर्ष
- आमतौर पर यह माना जाता है कि कृष्णदेव राय के शासनकाल में यह साम्राज्य अपने चरमोत्कर्ष पर पहुँच गया था, जिन्होंने दक्कन के पूर्व में उन क्षेत्रों पर विजय प्राप्त की थी जो पहले उड़ीसा का हिस्सा थे।
- साम्राज्य के कई उल्लेखनीय स्मारक, जिनमें हज़ारा राम मंदिर, कृष्ण मंदिर और उग्र नरसिंह प्रतिमा शामिल हैं, उनके समय के हैं।
- विजयनगर शासकों ने भव्य मंदिरों के निर्माण को बढ़ावा दिया, जैसे विरुपाक्ष मंदिर और विट्ठल मंदिर, जो अपनी जटिल नक्काशी और आश्चर्यजनक वास्तुकला के लिये जाने जाते हैं।
दक्षिणी भारत में प्रभुत्त्व
- दो शताब्दियों से अधिक समय तक विजयनगर साम्राज्य ने दक्षिणी भारत पर अपना प्रभुत्त्व बनाए रखा और इस अवधि के दौरान यह भारतीय उपमहाद्वीप की सबसे शक्तिशाली साम्राज्य था।
- यह साम्राज्य सिंधु-गंगा के मैदान के तुर्क सल्तनतों के आक्रमणों के विरुद्ध रक्षा के रूप में कार्य करता था।
दक्कन सल्तनत और मुगलों के साथ संघर्ष
- विजयनगर साम्राज्य की स्थापना आंशिक रूप से मुहम्मद बिन तुगलक के अधीन दिल्ली सल्तनत के कमज़ोर होने की प्रतिक्रियास्वरूप की गई थी, जिसकी नीतियों के कारण दक्कन में अशांति का वातावरण था।
- अपनी राजधानी को दिल्ली से दौलताबाद स्थानांतरित करने के उनके प्रयास और उनकी कठोर कर नीतियों के कारण विद्रोह हुए, जिससे विजयनगर सहित स्वतंत्र क्षेत्रीय राज्यों का उदय हुआ।
- साम्राज्य का अक्सर बहमनी सल्तनत के साथ संघर्ष होता रहता था, जो दक्कन में तुगलक के नियंत्रण के पतन के बाद उभरा था।
- दक्कन सल्तनत के साथ क्षेत्रीय संघर्ष, विशेष रूप से रायचूर दोआब को लेकर, विशुद्ध धार्मिक मतभेदों के बजाय सामरिक और आर्थिक संसाधनों के लिये प्रतिस्पर्द्धा से प्रेरित थे।
विजयनगर के अधीन शासन का क्षेत्र
- अपने चरम पर, साम्राज्य दक्षिणी भारत के विशाल क्षेत्र में फैला हुआ था, जिसमें वर्तमान कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, केरल और तेलंगाना के कुछ हिस्से शामिल थे।
- यह उत्तर में कृष्णा नदी से लेकर भारतीय प्रायद्वीप के सुदूर दक्षिणी सिरे तक तथा पश्चिम में अरब सागर से लेकर पूर्व में बंगाल की खाड़ी तक फैला हुआ था।
गिरावट और पतन
- वर्ष 1565 में, तालीकोटा के युद्ध (रक्कसगी-तांगदागी की लड़ाई) के परिणामस्वरूप मित्र देशों की दक्कन सल्तनतों द्वारा विजयनगर सेना की निर्णायक हार हुई।
