Tue. Mar 31st, 2026

एक अध्ययन से पता चला है कि तटीय क्षरण के कारण तमिलनाडु के तटीय क्षेत्रों में मछुआरों और अन्य निवासियों की आजीविका को खतरे में है।इसके तट का लगभग 43% हिस्सा क्षरण/कटाव का सामना कर रहा है, जिससे 4,450 एकड़ से अधिक भूमि का क्षय/ह्रास हो रहा है।पूर्वी तट पर क्षरण का क्षेत्र प्रतिवर्ष 3 मीटर और पश्चिमी तट पर 2.5 मीटर प्रतिवर्ष बढ़ रहा है।आर्थिक विकास को बढ़ावा देने और समुद्री क्षरण को रोकने के उद्देश्य से बनाई गई विकास परियोजनाएँ तटरेखा को बदलकर स्थिति को और खराब कर रही हैं।

तमिलनाडु तट के संबंध में अध्ययन के मुख्य निष्कर्ष

  • तमिलनाडु में, वर्ष के अधिकांश समय (लगभग आठ महीने) पवन और समुद्री धाराएँ दक्षिण से उत्तर की ओर चलती हैं, अपने साथ रेत ले जाती हैं। पूर्वोत्तर मानसून (लगभग चार महीने) के दौरान, वे विपरीत दिशा में बहती हैं।
  • जब बंदरगाह, ब्रेकवाटर या ग्रोइन जैसी संरचनाओं का समुद्र में विस्तार होता हैं, तो वे रेत की प्राकृतिक गति को रोकती हैं।
  • इससे एक ओर रेत जमा हो जाती है और दूसरी तरफ क्षरण होता है, जहाँ रेत का क्षय होता है।
  • यह असंतुलन तटीय क्षरण को तेज़ करता है, जिससे लहरें स्थल की ओर बढ़ती जाती हैं और तटीय क्षेत्रों के लिये जोखिम बढ़ जाता है।

तटीय क्षरण

  • तटीय क्षरण तब होता है जब समुद्र के द्वारा भूमि का क्षरण होता है, जो प्रायः तट को तोड़ने वाली प्रबल व तेज़ लहरों के कारण होता है।
  • यह वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा स्थानीय समुद्र स्तर में वृद्धि, प्रबल समुद्री लहर क्रिया और तटीय भूमि के साथ चट्टानों, मिट्टी और/या रेत को नष्ट कर देती है या बहा ले जाती है।
  • प्रक्रिया: तटीय क्षरण की चार मुख्य प्रक्रियाएँ हैं। ये हैं: संक्षारण, अपघर्षण, हाइड्रोलिक क्रिया और घर्षण।
  • संक्षारण: यह तब होता है जब प्रबल लहरें सागरीय पदार्थ, मलबे, कंकड़ को चट्टान के आधार पर फेंकती हैं, धीरे-धीरे इसे तोड़ती हैं जिससे चट्टान के आधार पर एक तरंग-सदृश चिह्न (चट्टान के आधार पर छोटा, घुमावदार इंडेंट) बनता हैं।
  • अपघर्षण: यह तब होता है जब रेत और बड़े टुकड़े ले जाने वाली लहरें चट्टान या हेडलैंड के आधार को नष्ट कर देती हैं। यह सैंडपेपर प्रभाव की तरह है जो विशेष रूप से शक्तिशाली तूफानों के दौरान आम है।
  • हाइड्रोलिक क्रिया: यह तब होता है जब लहरें चट्टान से टकराती हैं, दरारों और जोड़ों में हवा को संपीड़ित करती हैं। जब लहरें पीछे हटती हैं, तो अंदर फँसी (Trapped) हुई हवा विस्फोटक तरीके से बाहर निकलती है, जिससे चट्टान टूट जाते हैं। यह अपक्षय चट्टान को कमज़ोर कर देता है, जिससे यह प्रक्रिया और अधिक प्रभावी हो जाती है।
  • संघर्षण: यह तब होता है जब लहरें चट्टानों और कंकड़ों को आपस में टकराकर तोड़ देती हैं।

कारण

  • लहरें: शक्तिशाली लहरें घर्षण, क्षरण और हाइड्रोलिक क्रिया के माध्यम से तटरेखाओं को नष्ट कर सकती हैं। उदाहरण के लिये, इंग्लैंड में डोवर की चट्टानें इंग्लिश चैनल की लहरों की निरंतर क्रिया से नष्ट हो रही हैं।
  • ज्वार: उच्च और निम्न ज्वार क्षरण की मात्रा को प्रभावित कर सकते हैं, विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण ज्वारीय सीमाओं वाले क्षेत्रों में। उदाहरण के लिये कनाडा में फंडी की खाड़ी में अत्यधिक समुद्री ज्वार की घटनाएँ होती हैं जो तटरेखाओं को काफी हद तक नष्ट कर सकते हैं।
  • पवन और समुद्री धाराएँ: यह धीरे-धीरे और दीर्घकालिक क्षरण का कारण बन सकती हैं। उदाहरण के लिये, तमिलनाडु तट पर, वर्ष के अधिकांश समय (आठ महीने) पवन और समुद्री धाराएँ दक्षिण से उत्तर की ओर चलती हैं, जो तट के साथ रेत ले जाती हैं। पूर्वोत्तर मानसून (चार महीने) के दौरान, यह दिशा उत्क्रमित हो जाती है।
  • कठोर संरचनाएँ: बंदरगाह, ब्रेकवाटर और ग्रोइन रेत की प्राकृतिक गतिशीलता में बाधा डालते हैं, जिससे नीचे की ओर क्षरण होता है तथा ऊपर की ओर रेत जमा होती है।
  • ग्रोइन निम्न स्तर की लकड़ी या कंक्रीट की संरचनाएँ हैं जो तलछट को रोकने, तरंग ऊर्जा को नष्ट करने तथा तटीय बहाव के माध्यम से तलछट को समुद्र तट से दूर स्थानांतरित होने से रोकने के लिये डिज़ाइन किया गया है।
  • विकास परियोजनाएँ: आर्थिक विकास को बढ़ावा देने के उद्देश्य से बनाई गई बुनियादी ढाँचा परियोजनाएँ तटरेखा में बदलाव करके क्षरण को बढ़ा रही हैं। उदाहरण के लिये, मुंबई जैसी जगहों पर भूमि पुनर्ग्रहण से आस-पास के तटीय क्षेत्रों में क्षरण होता है।
  • बंदरगाह विस्तार: जब पत्तन और बंदरगाहों का विस्तार किया जाता है, तो ब्रेकवाटर एवं जेटी जैसी संरचनाएँ तट के किनारे रेत तथा तलछट की प्राकृतिक गति को अवरुद्ध करती हैं। इससे संरचना के एक तरफ तलछट जमा हो सकती है और दूसरी तरफ क्षरण बढ़ सकता है। उदाहरण के लिये, तमिलनाडु में एन्नोर बंदरगाह और अदानी कट्टुपल्ली बंदरगाह।

भारत की तटरेखा

  • भारत की तटरेखा 7516.6 किमी. [मुख्य भूमि की 6100 किमी. + द्वीपों की 1197 किमी.] लंबी है, जो 13 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों (UT) से लगती है।
  • राज्यों में सबसे लंबी तटरेखा गुजरात (1214.7 किमी.) की है, जिसके बाद आंध्र प्रदेश (973.7 किमी.) और तमिलनाडु (906.9 किमी.) का स्थान है।
  • अंडमान और निकोबार द्वीप समूह (1962 किमी.) की तटरेखा केंद्रशासित प्रदेशों में सबसे लंबी है।
  • कोरोमंडल तट (तमिलनाडु) उभरता हुआ तट है, जबकि कोंकण तट (महाराष्ट्र और गोवा तट) डूबता हुआ तट है।

तटीय क्षरण के प्रभाव

  • भूमि की हानि: कटाव से मूल्यवान तटीय भूमि का नुकसान हो सकता है, जिससे संपत्ति और बुनियादी ढाँचे पर असर पड़ता है। उदाहरण के लिये, चेन्नई में मरीना बीच क्षेत्र के साथ भूमि के नुकसान ने संपत्ति तथा सार्वजनिक स्थानों को बुरी तरह प्रभावित किया।
  • तटीय पारिस्थितिकी तंत्र पर प्रभाव: कटाव से मैंग्रोव, नमक दलदल और रेत के टीले जैसे आवास नष्ट हो सकते हैं, जो विभिन्न प्रजातियों के लिये महत्त्वपूर्ण हैं। उदाहरण के लिये, पश्चिम बंगाल के सुंदरबन क्षेत्र में कटाव के कारण मैंग्रोव वन नष्ट हो गए हैं।
  • बाढ़ का खतरा: कटाव से तटीय क्षेत्रों को बाढ़ से बचाने वाली प्राकृतिक बाधाएँ कम हो सकती हैं। उदाहरण के लिये, केरल के तटीय क्षेत्रों में, कटाव से बाढ़ का खतरा बढ़ गया है, निचले इलाकों पर असर पड़ा है और भारी बारिश तथा तूफानों का असर और भी बढ़ गया है।
  • समुदायों का विस्थापन: कटाव के कारण समुदायों को स्थानांतरित होना पड़ सकता है, जिससे सामाजिक और आर्थिक व्यवधान पैदा हो सकता है। उदाहरण के लिये, अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में तटीय कटाव के कारण स्थानीय समुदायों का विस्थापन हुआ है, खासकर छोटे द्वीपों पर जहाँ भूमि का नुकसान अधिक है।
  • खारे पानी का अतिक्रमण: तटीय कटाव से कृषि भूमि में लवणीकरण हो सकता है, जिससे फसल की पैदावार कम हो सकती है।
  • उदाहरण के लिये, आंध्र प्रदेश में खारे पानी के प्रवेश से फसल की पैदावार पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा और कृषि भूमि की उत्पादकता कम हो गई।
  • समुद्री और तटीय जैवविविधता पर प्रभाव: यह पारिस्थितिकी तंत्र और खाद्य शृंखलाओं को बदल सकता है। उदाहरण के लिये, इसने लक्षद्वीप द्वीपसमूह में समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र के स्वास्थ्य को बाधित किया।

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