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नीति आयोग (राष्ट्रीय भारत परिवर्तन संस्था) की अगुआई में शुरू की गई ग्रेट निकोबार ‘समग्र विकास’ परियोजना चर्चा का विषय बन गई है। प्रारंभ में इस परियोजना को संभावित रूप से नो-गो ज़ोन के लिये चिह्नित किया गया था, लेकिन अब राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) द्वारा नियुक्त एक उच्चस्तरीय समिति (HPC) ने इसे स्वीकार्यता प्रदान की है।

ग्रेट निकोबार ‘समग्र विकास’ परियोजना

  • परियोजना अवलोकन: वर्ष 2021 में प्रारंभ हुई, ग्रेट निकोबार द्वीप (GNI) परियोजना एक मेगा इंफ्रास्ट्रक्चर पहल है, जिसका उद्देश्य अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह के दक्षिणी छोर में बदलाव करना है।

संबंधित घटक:

  • ट्रांस-शिपमेंट पोर्ट: एक अंतर्राष्ट्रीय कंटेनर ट्रांस-शिपमेंट टर्मिनल (ICTT) से क्षेत्रीय और वैश्विक समुद्री अर्थव्यवस्था को बढ़ावा मिलने की उम्मीद।
  • ग्रीनफील्ड अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा: वैश्विक संपर्क को सुविधाजनक बनाना।
  • टाउनशिप का विकास: नवीन शहरी विकास, जिसमें विशेष आर्थिक क्षेत्र भी शामिल हो सकता है।
  • पॉवर प्लांट: 450 MVA गैस और सौर-आधारित पॉवर प्लांट का निर्माण।
  • रणनीतिक स्थान: मलक्का जलडमरूमध्य के पास स्थित, हिंद महासागर को प्रशांत महासागर से जोड़ने वाला एक प्रमुख समुद्री मार्ग।परियोजना का उद्देश्य अतिरिक्त सैन्य बलों, बड़े युद्धपोतों, विमानों, मिसाइल बैटरियों और सैनिकों की तैनाती को सुविधाजनक बनाना है।मलक्का जलडमरूमध्य के नज़दीक यह परिवर्तन भारत के रणनीतिक हितों, विशेष रूप से इस क्षेत्र में बढ़ती चीनी उपस्थिति और प्रभाव, के लिये महत्त्वपूर्ण है।

पर्यावरण पर परियोजना का प्रभाव

  • वनोन्मूलन: इस परियोजना के तहत ग्रेट निकोबार के समृद्ध वर्षावनों में लगभग 8.5 लाख वृक्षों की कटाई शामिल है।
  • वन्यजीवों का विस्थापन: गैलाथिया बे वन्यजीव अभयारण्य की अधिसूचना रद्द करना और गैलाथिया राष्ट्रीय उद्यान के लिये “ज़ीरो एक्सटेंट” पारिस्थितिकी-संवेदनशील क्षेत्र की घोषणा महत्त्वपूर्ण आवासों को खतरे में डालती है।
  • पारिस्थितिकी विनाश: अद्वितीय और संकटग्रस्त उष्णकटिबंधीय सदाबहार वन पारिस्थितिकी प्रणालियों का घर, निर्माण से द्वीप की जैव विविधता को अपरिवर्तनीय क्षति हो सकती है, जिसमें निकोबार मेगापोड और लेदरबैक कछुए जैसी स्थानिक प्रजातियाँ शामिल हैं।
  • जैवविविधता संरक्षण: यह परियोजना वर्ष 2030 तक जैवविविधता की क्षति को रोकने और उच्च पारिस्थितिक महत्त्व के क्षेत्रों का संरक्षण करने के लिये जैवविविधता हेतु कन्वेंशन के तहत भारत की प्रतिबद्धताओं का खंडन करती है।
  • जनजातियों की चिंताएँ: द्वीप के मुख्य निवासी जिनमें शोम्पेन और निकोबारी जनजातियाँ शामिल हैं, महत्त्वपूर्ण विस्थापन तथा सांस्कृतिक व्यवधान का सामना कर रही हैं।आदिवासी हितों के संरक्षण के दावों के बावजूद, स्थानीय समुदायों को उनकी चिंताओं और पुनर्वास के अनुरोधों पर पर्याप्त प्रतिक्रिया नहीं मिली है।स्थानीय समुदायों ने नवंबर, 2022 में परियोजना के लिये अपनी सहमति वापस ले ली, जो इसके कार्यान्वयन के लिये आवश्यक है क्योंकि भूमि आदिवासी अभयारण्य का हिस्सा है।

तकनीकी एवं वैधानिक मुद्दे

  • भूकंपीय जोखिम: ग्रेट निकोबार एक प्रमुख भ्रंश रेखा पर स्थित है, जहाँ भूकंप और सुनामी का खतरा अधिक है। इन प्राकृतिक खतरों के लिये कोई व्यापक जोखिम मूल्यांकन नहीं किया गया है।
  • अपर्याप्त रिपोर्ट: पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA) रिपोर्ट में संदर्भ की कई शर्तों का अनुपालन नहीं किया गया है, जो महत्त्वपूर्ण पर्यावरणीय और सामाजिक प्रभावों को संबोधित करने में विफल है।
  • वैधानिक चुनौतियाँ: वनों, आदिवासी अधिकारों और तटीय पारिस्थितिकी प्रणालियों की रक्षा करने वाले विभिन्न कानूनों के तहत प्रदत्त विभिन्न स्वीकृतियाँ एवं छूट न्यायालयों तथा न्यायाधिकरणों में वैधानिक चुनौतियों का सामना कर सकती हैं।

परियोजना को पहले नो-गो ज़ोन में क्यों चिह्नित किया गया

  • प्रारंभिक सूचना: अंडमान और निकोबार तटीय प्रबंधन प्राधिकरण के अनुसार बंदरगाह, हवाई अड्डा एवं टाउनशिप द्वीप तटीय विनियमन क्षेत्र-IA (ICRZ-IA) में 7 वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है, जहाँ बंदरगाह गतिविधियाँ प्रतिबंधित हैं।
  • पर्यावरण संबंधी चिंताएँ: ICRZ-IA क्षेत्र पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र हैं जिनमें मैंग्रोव, प्रवाल, प्रवाल भित्ति, रेत के टीले, मडफ्लैट्स, समुद्री पार्क, वन्यजीव आवास, लवणीय दलदल, कछुए और पक्षियों के निवास स्थान शामिल हैं।
  • ICRZ-IA में अनुमत गतिविधियाँ: आवश्यक परमिट के साथ मैंग्रोव वॉक और प्राकृतिक पगडंडियाँ, रक्षा एवं सामरिक परियोजनाओं के लिये सड़कें, अवस्तंभ पर निर्मित सड़कें जैसी इको-टूरिज़्म गतिविधियाँ।

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