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भारत सरकार ने हाल ही में पहली बार शाकनाशी-सहिष्णु बासमती चावल की दो गैर-ट्रांसजेनिक किस्मों, पूसा बासमती 1979 और पूसा बासमती 1985, की व्यावसायिक खेती की मंजूरी दी है। बासमती चावल की ये किस्में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) द्वारा विकसित की गई हैं। इसका मुख्य उद्देश्य धान की धारणीय कृषि पद्धतियों को बढ़ावा देना है, जो जल संरक्षण और कार्बन उत्सर्जन में कमी को प्रोत्साहित करती हैं।ट्रांसजेनिक एक आनुवंशिकतः रूपांतरित जीव (GMO) या कोशिका को संदर्भित करता है, जिसके जीनोम को कृत्रिम साधनों की सहायता से किसी अन्य प्रजाति से एक या अधिक बाह्य DNA अनुक्रम या जीन को निर्दिष्ट कर रूपांतरित किया गया है।GMO एक ऐसा जीव है जिसमें आनुवंशिक रूप से संशोधित जीनोम होता है।सभी ट्रांसजेनिक जीव GMO होते हैं।गैर-ट्रांसजेनिक में कोई बाह्य DNA सम्मिलित नहीं होता है।

चावल की नई किस्मों की मुख्य विशेषताएँ

  • उत्परिवर्तित ALS जीन : इन किस्मों में एसीटो-लैक्टेट सिंथेज़ (ALS) जीन का उपयोग किया गया है, जो इमेजेथापायर (शाकनाशी) के छिड़काव के माध्यम से खरपतवार नियंत्रण को सक्षम बनाता है।
  • एंजाइम बाइंडिंग साइट का अभाव : उत्परिवर्तित ALS जीन के कारण ALS एंजाइमों में इमेजेथापायर के लिए बाइंडिंग साइट का अभाव होता है, जिससे अमीनो एसिड संश्लेषण पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है।
  • अमीनो एसिड संश्लेषण : यह जीन चावल की फसल की वृद्धि और विकास के लिए आवश्यक अमीनो एसिड के संश्लेषण के लिए जिम्मेदार एंजाइम को एनकोड करता है।
  • शाकनाशी का प्रभाव : इमेजेथापायर चौड़ी पत्ती वाले, घास वाले और सेज प्रकार के खरपतवारों को लक्षित करता है, लेकिन फसल और खरपतवार में अंतर नहीं कर पाता, जिससे फसल शाकनाशी के प्रति सहिष्णु हो सकती है।
  • गैर-आनुवंशिक प्रक्रिया : इस प्रक्रिया में कोई विदेशी जीन शामिल नहीं होते है, जिससे उत्परिवर्तन प्रजनन के माध्यम से शाकनाशी सहिष्णुता प्राप्त की जाती है और ये पौधे गैर-आनुवंशिक तरीके से रूपांतरित (Non-GMO) होते हैं।

चावल/धान

  • यह एक खरीफ फसल है जिसके लिये उच्च तापमान (25 डिग्री सेल्सियस से अधिक) और उच्च आर्द्रता एवं वार्षिक तौर पर 100 सेमी. से अधिक की वर्षा की आवश्यकता होती है।
  • दक्षिणी राज्यों और पश्चिम बंगाल में, जलवायु परिस्थितियाँ एक कृषि वर्ष में चावल की दो या तीन फसलों की खेती में सहायक हैं।
  • पश्चिम बंगाल में किसान चावल की तीन फसलें उगाते हैं जिन्हें ‘औस’, ‘अमन’ और ‘बोरो’ कहा जाता है।
  • भारत में कुल फसल वाले क्षेत्र का लगभग एक-चौथाई हिस्सा चावल की खेती के अंतर्गत आता है।
  • प्रमुख उत्पादक राज्य: पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश और पंजाब।
  • उच्च उपज वाले राज्य: पंजाब, तमिलनाडु, हरियाणा, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, पश्चिम बंगाल और केरल।
  • भारत चीन के बाद चावल का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक है।
  • बासमती चावल भारत का शीर्ष कृषि-निर्यात उत्पाद है। वर्ष 2022-23 में, भारत ने इसका 4.56 मिलियन टन निर्यात किया, जिसका मूल्य 4.78 बिलियन अमरीकी डॉलर था।
  • बासमती की विशिष्ट सुगंध का श्रेय 2-एसिटाइल-1-पाइरोलाइन (2-AP) को जाता है, जो परिपक्वता के दौरान उत्पन्न होता है और चावल को पौष्टिकता एवं सुगंध प्रदान करने वाला एक कार्बनिक यौगिक है।
धान की रोपाई बनाम प्रत्यक्ष बीजारोपण (DSR)
धान की रोपाईधान का प्रत्यक्ष बीजारोपण (DSR)
जिस खेत में रोपाई की जाती है, उसमें जल भरकर मृदा को दलदल के समान बनाया जाता है।अंकुरित बीजों को ट्रैक्टर द्वारा संचालित मशीनों द्वारा सीधे खेत में डाला जाता है।
रोपाई के बाद पहले तीन सप्ताह तक पौधों के लिये लगभग 4-5 सेमी. की जल गहनता बनाए रखने के लिये प्रतिदिन सिंचाई की जाती है।इस विधि में नर्सरी की तैयारी या रोपाई शामिल नहीं है।
किसान अगले चार-पाँच सप्ताह तक भी 2-3 दिन के अंतराल पर जल से सिंचाई करते रहते हैं, जब फसल टिलरिंग (तना विकास) अवस्था में होती है।किसानों को केवल अपनी कृष्ट भूमि को समतल करना होता है और बुवाई से पहले एक बार सिंचाई करनी होती है।
धान की रोपाई में श्रम और जल दोनों की आवश्यकता होती है।यह जल और श्रम दोनों की बचत करता है। तुलनात्मक रूप से जल संग्रहण अवधि एवं मृदा की असंतुलन में वांछनीय कमी होने के कारण मीथेन उत्सर्जन को कम करता है।   

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