अमेरिकी कॉन्ग्रेस द्वारा तिब्बत-चीन विवाद समाधान अधिनियम पारित किया है, जिसे तिब्बत समाधान अधिनियम के नाम से भी जाना जाता है।इस विधेयक का उद्देश्य बिना किसी पूर्व शर्त के शांतिपूर्ण वार्ता के माध्यम से अंतर्राष्ट्रीय कानून और संयुक्त राष्ट्र (UN) चार्टर के अनुसार तिब्बत-चीन विवाद का शांतिपूर्ण समाधान करना है।
तिब्बत समाधान अधिनियम, 2024
- यह जून 2024 में संयुक्त राज्य अमेरिका कॉन्ग्रेस द्वारा पारित एक विधेयक है।
- यह तिब्बती नीति अधिनियम (2002) तथा तिब्बती नीति एवं समर्थन अधिनियम (2020) के बाद तिब्बत के संबंध में अमेरिकी सरकार का तीसरा उल्लेखनीय अधिनियम है।
प्रमुख प्रावधान
- इसका उद्देश्य तिब्बत पर अमेरिका की स्थिति को मज़बूत करने तथा चीन पर दलाई लामा के साथ वार्ता पुनः शुरू करने के लिये दबाव डालना है।
- इस अधिनियम का उद्देश्य तिब्बत के लिये अमेरिकी समर्थन को बढ़ाना तथा अमेरिकी विदेश विभाग के अधिकारियों को चीनी सरकार द्वारा तिब्बत के बारे में फैलाई जा रही गलत सूचनाओं का सक्रिय रूप से मुकाबला करने के लिये सशक्त बनाना है।
- यह अधिनियम चीनी सरकार तथा दलाई लामा अथवा उनके प्रतिनिधियों या तिब्बती समुदाय के लोकतांत्रिक रूप से निर्वाचित नेताओं के बीच “बिना किसी पूर्व शर्त” के वार्ता को भी बढ़ावा देगा।
- इसमें तिब्बती लोगों के आत्मनिर्णय के साथ-साथ मानवाधिकारों को रेखांकित किया गया है तथा अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार संधियों पर हस्ताक्षरकर्त्ता के रूप में चीन के कर्त्तव्य को रेखांकित किया गया है।
- यह तिब्बती लोगों की विशिष्ट ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, धार्मिक एवं भाषाई पहचान को मान्यता देता है और उस पर ध्यान केंद्रित करता है।
- इसका उद्देश्य तिब्बत में न्याय एवं शांति के लिये अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को सशक्त बनाना भी है।
पूर्व के अधिनियमों से भिन्नता
- तिब्बत समाधान अधिनियम स्पष्ट रूप से तिब्बत पर चीन के दावे का विरोध करता है, जबकि वर्ष 2002 के अधिनियम में इस दावे को स्वीकार किया गया था।
- दलाई लामा को, एक राजनीतिक दूत के रूप में नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक मार्गदर्शक के रूप में, वर्ष 2002 अधिनियम के तहत वार्ता में भाग लेने की अनुमति दी गई थी। इसके विपरीत, यह अधिनियम चीन से बिना किसी पूर्व शर्त के दलाई लामा या उनके लोकतांत्रिक रूप से चुने गए प्रतिनिधि के साथ वार्ता में शामिल होने का आग्रह करता है।
- तिब्बती नीति एवं समर्थन अधिनियम, 2020 में भी रचनात्मक वार्ता पर ज़ोर दिया गया है, लेकिन तिब्बत समाधान अधिनियम में यह भी स्पष्ट है कि इन वार्ताओं का उद्देश्य पक्षों के बीच “मतभेदों का समाधान” होना चाहिये।
तिब्बत के साथ भारत के संबंध
- यंगहसबैंड मिशन (1903-1904): कर्नल यंगहसबैंड के नेतृत्व में तिब्बत में ब्रिटिश सैन्य अभियान का उद्देश्य क्षेत्र में ब्रिटिश उपस्थिति स्थापित करना और बढ़ते रूसी प्रभाव का मुकाबला करना था।
- इसके परिणामस्वरूप तिब्बती सेनाओं के साथ संघर्ष हुआ, जिसकी परिणति ब्रिटिश विजय और साथ ही वर्ष 1904 के ल्हासा सम्मेलन पर हस्ताक्षर के रूप में हुई।
- आंग्ल-रूसी सम्मेलन (1907): इस समझौते का उद्देश्य औपनिवेशिक ब्रिटेन एवं रूस के बीच लंबित औपनिवेशिक विवादों का समाधान करना था।
- इस समझौते के अनुसार, दो महाशक्तियाँ चीनी सरकार की मध्यस्थता के बिना तिब्बत के साथ वार्ता नहीं करेंगी।
- तिब्बत के साथ भारत के संबंध: चीन-रूस संधि के बावजूद, भारत ने बौद्ध धर्म के प्रभाव के कारण तिब्बत के साथ घनिष्ठ संबंध बनाए रखा।
- भारत से तिब्बत तक बौद्ध धर्म के प्रसार के साथ-साथ प्रभावशाली बौद्ध मठों की उपस्थिति ने दोनों क्षेत्रों के बीच मज़बूत सांस्कृतिक एवं धार्मिक संबंधों को बढ़ावा दिया।
- भारत-तिब्बत सीमा: चीन-भारत सीमा विवाद विशेष रूप से लद्दाख और अरुणाचल प्रदेश क्षेत्रों में, भारत तथा चीन के बीच विवाद एक प्रमुख मुद्दा रहा है।
- तिब्बत की स्थिति तथा भारत के साथ इसके ऐतिहासिक संबंध इस विवाद के केंद्र में हैं, दोनों देश विवादित क्षेत्रों पर संप्रभुता का दावा करते हैं।
- तिब्बत पर भारत का रुख: वर्ष 2003 से भारत और चीन के बीच संबंधों एवं व्यापक सहयोग के सिद्धांतों पर हस्ताक्षर करने के बाद भारत ने तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र को पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना के हिस्से के रूप में मान्यता प्रदान की है।वर्ष 1959 में एक असफल विद्रोह के बाद भारत ने दलाई लामा को शरण दी थी।
