हाल ही में प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने भारत को राष्ट्रीय अधिकार क्षेत्र से परे जैव विविधता समझौते पर हस्ताक्षर करने की मंजूरी दे दी है। भारत सरकार का पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय देश में BBNJ समझौते के क्रियान्वयन का नेतृत्व करेगा। पिछले वर्ष हुई इस संधि का उद्देश्य प्रदूषण को कम करना तथा समुद्री जल में जैव विविधता और अन्य समुद्री संसाधनों का संरक्षण एवं सतत् उपयोग करना है।
हाई सी
- उच्च सागरों पर 1958 के जेनेवा अभिसमय के अनुसार, समुद्र के वे हिस्से जो किसी देश के प्रादेशिक जल या आंतरिक जल में शामिल नहीं हैं, हाई सी कहलाते हैं।
- यह किसी देश के अनन्य आर्थिक क्षेत्र (जो समुद्र तट से 200 समुद्री मील तक फैला हुआ है) से परे का क्षेत्र है तथा जहाँ तक किसी राष्ट्र का जीवित और निर्जीव संसाधनों पर अधिकार क्षेत्र होता है।
- कोई भी देश समुद्र में संसाधनों के प्रबंधन और संरक्षण के लिये ज़िम्मेदार नहीं है।
महत्त्व
- उच्च समुद्र विश्व के 64% महासागरों और पृथ्वी की सतह के 50% भाग को कवर करते हैं, जिससे वे समुद्री जीवन के लिये महत्त्वपूर्ण बन जाते हैं।
- वे लगभग 270,000 ज्ञात प्रजातियों का आवास हैं।
- उच्च समुद्र जलवायु को नियंत्रित करते हैं, कार्बन को अवशोषित करते हैं, सौर विकिरण को संग्रहित करते हैं तथा ऊष्मा वितरित करते हैं, जो ग्रहीय स्थिरता और जलवायु परिवर्तन को कम करने के लिये महत्त्वपूर्ण है।
- वे मानव अस्तित्त्व के लिये आवश्यक हैं तथा समुद्री भोजन, कच्चा माल, आनुवंशिक और औषधीय संसाधन जैसे संसाधन प्रदान करते हैं।
संकट
- वे वायुमंडल से ऊष्मा अवशोषित करते हैं और अल नीनो तथा महासागरीय अम्लीकरण जैसी घटनाओं से प्रभावित होते हैं, जिससे समुद्री वनस्पतियों एवं जीवों को खतरा हो रहा है।
- यदि वर्तमान तापमान वृद्धि और अम्लीकरण की प्रवृत्ति जारी रही तो वर्ष 2100 तक कई हजार समुद्री प्रजातियों के विलुप्त होने का खतरा होगा।
- खुले समुद्र में मानवजनित दबावों में समुद्र तल पर खनन, ध्वनि प्रदूषण, रासायनिक और तेल रिसाव तथा आग, अनुपचारित अपशिष्ट (एंटीबायोटिक सहित) का निपटान, अत्यधिक मछली पकड़ना, आक्रामक प्रजातियों का प्रवेश एवं तटीय प्रदूषण शामिल हैं।
- इन खतरों के बावजूद, वर्तमान में केवल 1% उच्च समुद्र ही संरक्षित है।
हाई सी ट्रीटी क्या है
- औपचारिक रूप से इसे राष्ट्रीय अधिकार क्षेत्र से परे क्षेत्रों की समुद्री जैविक विविधता के संरक्षण और सतत् उपयोग पर समझौता कहा जाता है। संक्षेप में इसे BBJN या हाई सी ट्रीटी के रूप में जाना जाता है।
- यह महासागरों के पारिस्थितिक स्वास्थ्य को बनाए रखने के लिये UNCLOS के अंतर्गत एक नया अंतर्राष्ट्रीय कानूनी ढाँचा है।
- इस ट्रीटी पर वर्ष 2023 में बातचीत की गई थी और इसका उद्देश्य प्रदूषण को कम करना तथा किसी भी देश के राष्ट्रीय अधिकार क्षेत्र से बाहर समुद्री जल में जैवविविधता एवं अन्य समुद्री संसाधनों के संरक्षण और सतत् उपयोग को बढ़ावा देना है।
प्रमुख उद्देश्य
- समुद्री पारिस्थितिकी का संरक्षण एवं सुरक्षा: इसमें समुद्री संरक्षित क्षेत्रों (Marine Protected Areas- MPA) की स्थापना शामिल है, जहाँ समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र के संरक्षण के लिये गतिविधियों को विनियमित किया जाएगा।
- समुद्री संसाधनों के लाभों का उचित एवं न्यायसंगत बँटवारा: संधि का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि वाणिज्यिक रूप से मूल्यवान समुद्री जीवों से प्राप्त लाभ, चाहे वैज्ञानिक अनुसंधान के माध्यम से हो या वाणिज्यिक दोहन के माध्यम से, सभी देशों के बीच समान रूप से साझा किये जाएँ।
- अनिवार्य पर्यावरणीय प्रभाव मूल्यांकन (Environmental Impact Assessments – EIA): संधि किसी भी ऐसी गतिविधि के लिये पूर्व पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (Environmental Impact Assessments) करना अनिवार्य बनाती है, जो समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र को संभावित रूप से प्रदूषित या नुकसान पहुँचा सकती है, भले ही वह गतिविधि किसी देश के राष्ट्रीय अधिकार क्षेत्र में हो, लेकिन उसका प्रभाव उच्च समुद्र में होने की संभावना है।
- क्षमता निर्माण और समुद्री प्रौद्योगिकियों का हस्तांतरण: इससे विकासशील देशों को महासागरों के लाभों का पूर्ण उपयोग करने में मदद मिलेगी, साथ ही उनके संरक्षण में भी योगदान मिलेगा।
भारत के लिए BBNJ समझौते के लाभ
- यह ऐतिहासिक निर्णय राष्ट्रीय अधिकार क्षेत्र से बाहर के क्षेत्रों में समुद्री जैव विविधता के संरक्षण और सतत् उपयोग की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम है।
- सामरिक उपस्थिति में वृद्धि (Enhance Strategic Presence:): BBNJ समझौता भारत को अपने अनन्य आर्थिक क्षेत्र (Exclusive Economic Zone- EEZ) से परे के क्षेत्रों में अपनी सामरिक उपस्थिति बढ़ाने की अनुमति देता है, जो बहुत आशाजनक है।
- समुद्री संरक्षण प्रयासों और सहयोग को मजबूत करना (Strengthen Marine Conservation Efforts and Collaborations): साझा मौद्रिक लाभों के अलावा, यह समुद्री संरक्षण प्रयासों तथा सहयोग को और मजबूत करेगा, वैज्ञानिक अनुसंधान एवं विकास के लिए नए रास्ते खोलेगा, नमूनों, अनुक्रमों व सूचना तक पहुँच, क्षमता निर्माण और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण आदि को बढ़ावा देगा।
- यह यह सुनिश्चित करने की दिशा में एक और महत्त्वपूर्ण कदम है कि महासागर स्वस्थ और टिकाऊ बने रहें।
