भारत के सर्वोच्च न्यायालय, ने राज्यों और उच्च न्यायालयों को ग्राम न्यायालयों की स्थापना तथा कार्यप्रणाली पर व्यापक रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है।यह निर्देश इन ग्रामीण अदालतों के धीमे कार्यान्वयन के संबंध में चिंताओं के बीच आया है।
ग्राम न्यायालयों के संबंध में सर्वोच्च न्यायालय की चिंताएँ
- धीमी गति से क्रियान्वयन: ग्राम न्यायालय अधिनियम 2008 का उद्देश्य न्यायालयों में भीड़भाड़ कम करना तथा प्रशासन का विकेंद्रीकरण करना था। इस बात पर ज़ोर दिया गया कि ग्राम न्यायालयों का उद्देश्य न्याय तक पहुँच को बेहतर बनाना है, लेकिन वर्तमान में आवश्यक 16,000 में से केवल 450 ही स्थापित हैं, जिनमें से केवल 300 ही काम कर रहे हैं।
- लंबित मामले: निचले न्यायालयों में चार करोड़ से अधिक मामले लंबित हैं, कार्यात्मक ग्राम न्यायालयों की कमी के कारण लंबित मामलों की संख्या बढ़ रही है, जिससे न्यायिक प्रणाली में व्यवधान उत्पन्न हो रहा है।
- न्याय तक पहुँच: सर्वोच्च न्यायालय इस बात से चिंतित है कि ग्राम न्यायालयों की धीमी स्थापना ग्रामीण नागरिकों को शीघ्र और किफायती न्याय प्रदान करने के लक्ष्य में बाधा उत्पन्न करती है।
- रिपोर्टिंग का अभाव: राज्य और उच्च न्यायालय ग्राम न्यायालयों की स्थिति का विवरण देने वाले आवश्यक हलफनामे प्रस्तुत करने में विफल रहे हैं, जो अनुपालन तथा प्रतिबद्धता की कमी को दर्शाता है।
- जनजातीय क्षेत्रों में प्रतिरोध: झारखंड और बिहार जैसे कुछ राज्यों ने स्थानीय या पारंपरिक कानूनों के साथ टकराव का हवाला देते हुए जनजातीय या अनुसूचित क्षेत्रों में ग्राम न्यायालय स्थापित करने का विरोध किया है।
अन्य संबंधित मुद्दे: ग्राम न्यायालय अधिनियम, 2008 की धारा 3 के अनुसार, राज्य सरकारें संबंधित उच्च न्यायालयों के परामर्श से ग्राम न्यायालयों की स्थापना के लिये ज़िम्मेदार हैं। हालाँकि अधिनियम ग्राम न्यायालयों की स्थापना को अनिवार्य नहीं बनाता है।राज्यों द्वारा, विशेषकर जनजातीय क्षेत्रों में, स्थानीय कानूनों के साथ टकराव का हवाला देते हुए प्रतिरोध किया गया।परिवार और श्रम न्यायालयों जैसी अन्य विशेष अदालतों के साथ ओवरलैप के कारण उनके अधिदेश के बारे में भ्रम की स्थिति पैदा हो गई है।तालुका स्तर पर नियमित न्यायालयों की स्थापना से ग्राम न्यायालयों की आवश्यकता कम हो गई है।हितधारकों के बीच कम जागरूकता तथा पुलिस अधिकारियों, वकीलों और अन्य पदाधिकारियों में ग्राम न्यायालयों का उपयोग करने के प्रति अनिच्छा।प्रत्येक न्यायालय के लिये 18 लाख रुपए का प्रारंभिक बजट तथा केंद्र सरकार से तीन वर्षों हेतु 50% आवर्ती व्यय सहायता अपर्याप्त रही है।
ग्राम न्यायालय
- ग्राम न्यायालय की संकल्पना का प्रस्ताव भारतीय विधि आयोग ने अपनी 114वीं रिपोर्ट में ग्रामीण क्षेत्रों में नागरिकों को न्याय की वहनीय और त्वरित पहुँच प्रदान करने के लिये किया था।
- भारतीय संविधान का अनुच्छेद 39A विधि प्रणाली द्वारा न्याय को बढ़ावा देने और आर्थिक या अन्य अक्षमताओं की परवाह किये बिना सभी नागरिकों के लिये समान अवसर प्रदान करने हेतु निशुल्क विधिक सहायता सुनिश्चित करता है।
- यह विज़न वर्ष 2008 में ग्राम न्यायालय विधेयक के पारित होने और उसके पश्चात् वर्ष 2009 में ग्राम न्यायालय अधिनियम के कार्यान्वयन के साथ अस्तित्व में आया।
- ग्राम न्यायालय को प्रथम श्रेणी के न्यायिक मजिस्ट्रेट का न्यायालय माना जाता है जिसके पास ग्राम स्तर पर लघु विवादों को निपटाने के लिये दीवानी और आपराधिक दोनों प्रकार की अधिकारिता होती है।
- यह अधिनियम नगालैंड, अरुणाचल प्रदेश, सिक्किम और असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिज़ोरम के विशिष्ट जनजातीय क्षेत्रों के अतिरिक्त समग्र भारत में क्रियान्वित है।
प्रमुख विशेषताएँ
- स्थापना मानदंड: ये न्यायालय मध्यवर्ती स्तर पर प्रत्येक पंचायत या समीपवर्ती ग्राम पंचायतों के समूह के लिये स्थापित किये जाते हैं। किसी ग्राम न्यायालय का मुख्यालय उसके मध्यवर्ती पंचायत स्तर पर अवस्थित होता है।
- पीठासीन अधिकारी: पीठासीन अधिकारी, जिसे न्यायाधिकारी के रूप में जाना जाता है, को राज्य सरकार द्वारा उच्च न्यायालय के परामर्श से नियुक्त किया जाता है।
- न्यायाधिकारी का तात्पर्य न्यायिक अधिकारी से है जिनका वेतन और शक्तियाँ उच्च न्यायालयों के तहत कार्यरत प्रथम वर्ग के मजिस्ट्रेट के समान होती हैं।
- क्षेत्राधिकार: ग्राम न्यायालय उक्त अधिनियम की पहली और दूसरी अनुसूची में सूचीबद्ध आपराधिक मामलों, दीवानी मुकदमों, दावों तथा विवादों को आपराधिक मुकदमों के लिये संक्षिप्त विचारण प्रक्रियाओं का पालन करते हुए संभालते हैं।
- किसी अपराध के आरोपी व्यक्ति के पास सौदा अभिवाक् (Plea Bargaining) के लिये आवेदन दायर करने का विकल्प होता है जिससे आरोप या दंड को कम करने पर वार्ता की जा सकती है।
- सुलह के प्रयास: ये न्यायालय विवादों को निपटाने के लिये पक्षों के बीच सुलह करने पर ज़ोर देते हैं और इस उद्देश्य के लिये नियुक्त मध्यस्थों का उपयोग करते हैं।
- नैसर्गिक न्याय द्वारा निर्देशित: ये न्यायालय भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 (जिसका स्थान भारतीय साक्ष्य अधिनियम ने ले लिया है) के तहत साक्ष्य के नियमों से आबद्ध नहीं हैं और उच्च न्यायालय के नियमों द्वारा निर्देशित नैसर्गिक न्याय के सिद्धांतों का पालन करते हैं।
- परिचालन की शर्तें: आरंभ में ग्राम न्यायालयों को मध्यवर्ती पंचायत स्तर पर स्थापित करने का प्रस्ताव किया गया था जिसमें अनावर्ती व्यय के लिये 18 लाख रुपए का एकमुश्त बजट शामिल था। केंद्र सरकार द्वारा प्रथम तीन वर्षों के लिये कुल आवर्ती व्यय के 50% का वहन करने की भी सुविधा दी गई।
- 50 करोड़ रुपए के बजट के साथ इस योजना को 31 मार्च 2026 तक बढ़ा दिया गया है। वर्तमान में ग्राम न्यायालयों के संचालित होने और न्यायाधिकारियों की नियुक्ति के पश्चात् ही धनराशि आवंटित की जाती है।
- ग्रामीण क्षेत्रों में हाशियाई वर्ग के नागरिकों को वहनीय और त्वरित न्याय प्रदान करने में प्रभावशीलता का आकलन करने के लिये एक वर्ष के उपरांत इनके प्रदर्शन की समीक्षा की जाती है।
भारत में लंबित मामलों को संबोधित करने के लिये भारत की पहल
- न्यायालय कक्ष: न्यायालय कक्षों की संख्या वर्ष 2014 में 15,818 से बढ़कर वर्ष 2023 में 21,295 हो गई है। इसके अतिरिक्त, 2,488 न्यायालय कक्ष वर्तमान में निर्माणाधीन हैं।
- सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी (ICT) समेकन: ई-कोर्ट मिशन मोड परियोजना के अंर्तगत 18,735 ज़िलों एवं अधीनस्थ न्यायालयों को कंप्यूटरीकृत किया गया है।
- ई-कोर्ट के अंर्तगत WAN परियोजना का लक्ष्य देश भर के सभी ज़िलों और अधीनस्थ न्यायालय परिसरों को जोड़ना है। वर्तमान में 99.4% न्यायालय परिसरों WAN कनेक्टिविटी है।
- 3,240 न्यायालय परिसरों एवं 1,272 कारागारों के बीच वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग सक्षम बनाया गया है, जिससे दूरस्थ कानूनी कार्यवाही में भी वृद्धि हुई है।
- टेली-लॉ कार्यक्रम, वर्ष 2017 में प्रारंभ किया गया, जो ग्राम पंचायतों में कॉमन सर्विस सेंटर (CSC) पर उपलब्ध वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग, टेलीफोन एवं चैट सुविधाओं के साथ-साथ टेली-लॉ मोबाइल एप के माध्यम से वंचित वर्गों को वकीलों के पैनल से जोड़ता है।
- राष्ट्रीय न्यायिक डेटा ग्रिड (NJDG): यह प्लेटफॉर्म न्यायिक अधिकारियों सहित सभी हितधारकों के लिये न्यायिक कार्यवाही एवं निर्णयों से संबंधित जानकारी तक पहुँच की अनुमति प्रदान करता है।
- वर्चुअल कोर्ट (आभासी न्यायालय): 17 राज्यों तथा केंद्रशासित प्रदेशों में स्थित, वे 2.53 मिलियन से अधिक मामलों को संभालेंगे और जनवरी 2023 तक 359 करोड़ रुपए का ज़ुर्माना भी वसूलेंगे।
