नीति आयोग ने वर्ष 2070 तक शुद्ध-शून्य अर्थव्यवस्था बनने के अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिये नीतियों को तैयार करने और रोडमैप बनाने के लिये समर्पित बहु-क्षेत्रीय समितियों का गठन किया है।भारत द्वारा वर्ष 2070 तक शुद्ध-शून्य अर्थव्यवस्था बनने के अपने लक्ष्य की घोषणा के 3 वर्ष बाद यह शुरू किया गया है।
नीति आयोग द्वारा गठित कार्यसमूहों के प्रमुख क्षेत्र
- नीति आयोग ने 6 कार्य समूह बनाए हैं। ये समूह मैक्रोइकोनॉमिक संकेतक, जलवायु वित्त, महत्त्वपूर्ण खनिजों और ऊर्जा संक्रमण के सामाजिक पहलुओं जैसे मुख्य क्षेत्रों के लिये नीति प्रारूप, कार्य मॉडल विकसित करने पर ध्यान केंद्रित करेंगे।
- यह परिवहन, उद्योग, भवन, विद्युत एवं कृषि पर क्षेत्रीय समितियाँ भी बनाएगा।
6 शुद्ध-शून्य कार्य समूह
- मैक्रोइकोनॉमिक संकेतक: यह मैक्रोइकोनॉमिक संकेतकों पर शुद्ध-शून्य मार्गों के निहितार्थों की जाँच करेगा और संरेखित मौद्रिक एवं राजकोषीय नीतियों का सुझाव देगा।
- जलवायु वित्त: शमन और अनुकूलन के लिये भारत की जलवायु वित्त आवश्यकताओं का अनुमान लगाना और वित्त के संभावित स्रोतों की पहचान करना।
- महत्त्वपूर्ण खनिज: महत्त्वपूर्ण खनिजों के लिये अनुसंधान एवं विकास, घरेलू विनिर्माण और आपूर्ति शृंखला का निर्माण करना।
- ऊर्जा संक्रमण के सामाजिक पहलू: ऊर्जा संक्रमण के सामाजिक प्रभावों का आकलन करना और शमन रणनीतियों को प्रस्तावित करना।
- नीतियों का समन्वयन: क्षेत्रीय समितियों की रिपोर्टों को एकत्रित करना और एक समेकित नीति पुस्तिका तैयार करना।
- क्षेत्रीय समितियाँ: विद्युत, उद्योग, भवन, परिवहन एवं कृषि क्षेत्रों के लिये संक्रमण मार्ग तैयार करना।
अपेक्षित परिणाम
- सभी कार्य समूहों के लिये अपनी कार्ययोजनाएँ प्रस्तुत करने की समय-सीमा अक्तूबर, 2024 है। नीति आयोग की रिपोर्ट से यह अपेक्षा की जाती है कि यह सभी केंद्रीय मंत्रालयों के लिये जलवायु-लचीली और अनुकूली नीतियों का मसौदा तैयार करने के लिये एक नीति पुस्तिका (Policy Handbook) बनेगी, ताकि वर्ष 2070 तक भारत के शुद्ध-शून्य लक्ष्य को प्राप्त किया जा सके।
शुद्ध-शून्य लक्ष्य
- शुद्ध-शून्य से तात्पर्य उत्पादित कार्बन उत्सर्जन और वायुमंडल से निष्काषित कार्बन के बीच एक समग्र संतुलन हासिल करना है।
- इसे कार्बन तटस्थता कहा जाता है, जिसका अर्थ यह नहीं है कि कोई देश अपने उत्सर्जन को शून्य पर ले आएगा।
- इसके अतिरिक्त वनों जैसे अधिक कार्बन सिंक का निर्माण कर उत्सर्ज़न के अवशोषण को बढ़ाया जा सकता है।
- वायुमंडल से गैसों को निष्काषित करने के लिये कार्बन कैप्चर और स्टोरेज जैसी भविष्य की तकनीकों की आवश्यकता है।
- 70 से अधिक देशों ने वर्ष 2050 तक शुद्ध शून्य लक्ष्य प्राप्त करने की प्रतिबद्धता जताई है।
शुद्ध शून्य लक्ष्य हासिल करने के लिये भारत की पहल
- जलवायु परिवर्तन पर राष्ट्रीय कार्य योजना: इसका उद्देश्य जनप्रतिनिधियों, विभिन्न सरकारी अभिकर्त्ताओं, वैज्ञानिकों, उद्योग और समुदायों के बीच जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न खतरे और इससे निपटने के बारे में जागरूकता उत्पन्न करना है।
- भारत ने कॉन्फ्रेंस ऑफ पार्टीज-26 (COP) ग्लासगो शिखर सम्मेलन में वर्ष 2070 तक अपने उत्सर्जन को शून्य तक कम करने की प्रतिबद्धता जताई है।
इसके लिये भारत ने 5-आयामी ‘पंचमित्र’ जलवायु कार्रवाई लक्ष्य की रूपरेखा तैयार की
- वर्ष 2030 तक 500 गीगावाट गैर-जीवाश्म ऊर्जा क्षमता तक पहुँच।
- वर्ष 2030 तक अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं का 50% नवीकरणीय ऊर्जा से आपूर्ति करना।
- अभी से वर्ष 2030 तक कुल अनुमानित कार्बन उत्सर्जन में 1 बिलियन टन की कमी।
- वर्ष 2005 के स्तर से वर्ष 2030 तक अर्थव्यवस्था की कार्बन उत्सर्जन तीव्रता में 45% की कमी।
- वर्ष 2070 तक शुद्ध शून्य उत्सर्जन के लक्ष्य को प्राप्त करना।
