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वैज्ञानिकों ने पहली बार चंद्रमा पर एक गुफा की खोज की है। इटली के ट्रेंटो विश्वविद्यालय में लोरेंजो ब्रुज़ोन और लियोनार्डो कैरर ने मारे ट्रैंक्विलिटिस या सी ऑफ ट्रांक्विलिटी नामक एक चट्टानी मैदान के पास इस गुफा की खोज की है।यह पृथ्वी से नंगी आँखों से दिखाई देता है। यह उस स्थान से बहुत दूर नहीं है जहाँ नील आर्मस्ट्रांग और बज एल्ड्रिन (अपोलो 11) 1969 में उतरे थे।शोधकर्ताओं ने नासा के लूनर रिकॉनेसेंस ऑर्बिटर द्वारा रडार माप का विश्लेषण किया और परिणामों की तुलना पृथ्वी पर लावा ट्यूबों से की।रडार डेटा चन्द्रमा के नीच गुफा के केवल प्रारंभिक भाग को दिखाता है। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि यह कम से कम 130 फीट (40 मीटर) चौड़ा और दसियों गज (मीटर) लंबा है, संभवत इससे भी अधिक।वैज्ञानिकों का मानना है कि यह गुफा लाखों या अरबों साल पहले बनी थी जब चंद्रमा पर लावा बहता था, जिससे एक सुरंग बन जाती थी।मारे ट्रैंक्विलिटैटिस (Mare Tranquillitatis) या सी ऑफ ट्रांक्विलिटी  वह स्थान था जहाँ 1969 में अपोलो 11 के नील आर्मस्ट्रांग और बज एल्ड्रिन चंद्रमा पर पहले उतरे थे।

मुख्य निष्कर्ष

  • इटली के नेतृत्व वाली शोधकर्त्ताओं की एक टीम को अपोलो 11 लैंडिंग स्थल से सिर्फ 400 किलोमीटर दूर, ट्रैंक्विलिटी सागर में स्थित एक गुफा के साक्ष्य मिले।
  • चंद्रमा की सतह पर खोजे गए 200 से अधिक अन्य गड्ढों की तरह यह गड्ढा भी लावा ट्यूब के ढहने से बना था।
  • नासा के लूनर रिकॉनिस्सेंस ऑर्बिटर द्वारा रडार मापों के विश्लेषण से पता चला कि गुफा कम-से-कम 40 मीटर चौड़ी और दसियों मीटर लंबी है तथा संभवतः इससे भी बड़ी है।

महत्त्व/निहितार्थ

  • भविष्य के अंतरिक्ष यात्रियों के लिये संभावित आश्रय: चंद्र गुफाएँ ब्रह्मांडीय किरणों, सौर विकिरण तथा सूक्ष्म उल्कापिंडों से प्राकृतिक सुरक्षा प्रदान करती हैं, जिससे आवासों के निर्माण की आवश्यकता कम हो जाती है।
  • लुनार भूविज्ञान और ज्वालामुखी गतिविधि को समझना: इन गुफाओं के अंदर की चट्टानें और सामग्री, जो सदियों से सतही परिस्थितियों से अपरिवर्तित रही हैं।
  • यह वैज्ञानिकों को चंद्रमा के विकास, विशेष रूप से इसकी ज्वालामुखी गतिविधि को बेहतर ढंग से समझने में सहायक हो सकता है।
  • संभावित जल और ईंधन स्रोत: चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के पास स्थायी रूप से छायादार क्रेटरों में फ्रोज़ेन वाटर की उपस्थिति है, जो पीने और रॉकेट ईंधन के लिये एक महत्त्वपूर्ण संसाधन है।
  • लुनार अन्वेषण का उन्नयन करना: लुनार गुफाओं की खोज चंद्रमा के भू-विज्ञान और संसाधनों को समझने में एक बड़ा कदम है, जो भविष्य के मिशन हेतु योजना निर्माण तथा चंद्रमा पर मानवीय उपस्थिति एवं उनकी चिरस्थायित्वता में सहायता करता है।

चंद्रमा अन्वेषण

  • वर्ष 1959 में सोवियत संघ के लूना-1 और 2 चंद्रमा पर जाने वाले पहले रोबोटिक मिशन थे।
  • अपोलो 11 मिशन से पहले वर्ष 1961 और 1968 के बीच अमेरिका ने चंद्रमा पर रोबोटिक मिशनों की 3 श्रेणियाँ भेजी थीं।
  • वर्ष 1969 से 1972 तक, 12 अमेरिकी अंतरिक्ष यात्री चंद्रमा की सतह पर पहुँचे।
  • वर्ष 1990 के दशक में अमेरिका ने क्लेमेंटाइन और लुनार प्रॉस्पेक्टर जैसे रोबोटिक मिशनों के साथ चंद्र अन्वेषण पुनः प्रारंभ किया।
  • वर्ष 2009 में अमेरिका ने चंद्र मिशनों के लिये लुनार रिकॉनिसेंस ऑर्बिटर (LRO) और लुनार क्रेटर ऑब्ज़र्वेशन एंड सेंसिंग सैटेलाइट (LCROSS) लॉन्च किया।
  • वर्ष 2011 में नासा ने चंद्र अन्वेषण के लिये ARTEMIS मिशन प्रारंभ किया।
  • ग्रेविटी रिकवरी एंड इंटीरियर लेबोरेटरी (GRAIL) अंतरिक्ष यान ने वर्ष 2012 में चंद्रमा के गुरुत्वाकर्षण का अध्ययन किया था।
  • चीन ने चंद्रमा की सतह पर अपने दो रोवर लैंड किये, जिसमें वर्ष 2019 में चंद्रमा के सुदूर भाग पर सर्वप्रथम लैंडिंग भी शामिल है।

भारत (ISRO) का चंद्र मिशन

  • चंद्रयान 1: चंद्रयान परियोजना की शुरुआत वर्ष 2007 में ISRO और रूस के रोस्कोसमोस (ROSCOSMOS) के बीच सहयोग से हुई थी। रूस द्वारा लैंडर विकसित करने में देरी के कारण मिशन को शुरू में वर्ष 2016 तक के लिये स्थगित कर दिया गया था।
  • निष्कर्ष: चंद्र पर जल की मौजूदगी, गुफाओं के साक्ष्य और सतह पर पूर्व में घटित हुई  विवर्तनिक गतिविधि की पुष्टि हुई।
  • चंद्रयान-2: यह भारत का दूसरा चंद्र मिशन था, जिसमें ऑर्बिटर, लैंडर (विक्रम) और रोवर (प्रज्ञान) शामिल थे। रोवर प्रज्ञान, विक्रम लैंडर के अंदर अवस्थित था।
  • चंद्रयान-3: इसके माध्यम से भारत चंद्र के दक्षिणी ध्रुव के समीप लैंडिंग करने वाला विश्व का पहला देश बना और इसके साथ ही ISRO रोस्कोसमोस, NASA तथा CNSA के बाद चंद्र पर सफलतापूर्वक लैंडिंग करने वाली विश्व की चौथी अंतरिक्ष एजेंसी बन गई।

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