Sun. Apr 5th, 2026

पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय ने महाराष्ट्र के कराड में बोरहोल जियोफिज़िक्स रिसर्च लेबोरेटरी नामक एक विशेष संस्थान की मदद से पृथ्वी की भू-पर्पटी की 6 किलोमीटर गहराई तक वैज्ञानिक ड्रिलिंग का कार्य शुरू किया है।इसके द्वारा पहले ही 3 किलोमीटर की गहराई तक ड्रिलिंग पूरी कर ली गई।

कोयना भारत के डीप ड्रिलिंग मिशन के लिये क्यों उपयुक्त है

  • भूकंपीय उत्प्रेरकता (Triggered Seismicity): प्लेट विवर्तनिक (tectonic plate) सीमाओं पर होने वाले अधिकांश भूकंपों के विपरीत, कोयना में वर्ष 1962 में कोयना बाँध के निर्माण के बाद कई भूकंप आए। यह घटना, जहाँ मानवीय गतिविधि (जलाशय को भरने) के कारण भूकंप आते हैं, उसे जलाशय-प्रेरित भूकंपीयता (Reservoir-Induced Seismicity – RIS) कहा जाता है।
  • वैज्ञानिकों का लक्ष्य गहरी ड्रिलिंग के माध्यम से इन भूकंपों के स्रोत पर पृथ्वी की संरचना और दबाव का प्रत्यक्ष अध्ययन करना है।
  • सक्रिय भ्रंश क्षेत्र: कोयना-वार्ना क्षेत्र भूगर्भीय भ्रंश रेखा पर स्थित है, जिसके कारण यह स्वाभाविक रूप से भूकंप के प्रति संवेदनशील है।
  • हालाँकि यहाँ होने वाली घटनाएँ प्लेट सीमाओं पर होने वाली घटनाओं से भिन्न हैं।
  • पृथक गतिविधि: कोयना बाँध के 50 किलोमीटर के दायरे में भूकंपीय गतिविधि का कोई अन्य महत्त्वपूर्ण स्रोत नहीं है। यह अलगाव कोयना को केंद्रित अनुसंधान के लिये एक आदर्श स्थान बनाता है।

साइंटिफिक डीप ड्रिलिंग

  • साइंटिफिक डीप ड्रिलिंग से तात्पर्य है कि पृथ्वी की संरचना और प्रक्रियाओं का अध्ययन करने के लिये पृथ्वी की भू-पर्पटी में डीप ड्रिलिंग करना शामिल है।
  • यह शोध भू-वैज्ञानिक संरचनाओं, प्राकृतिक संसाधनों और पृथ्वी के इतिहास के बारे में जानकारी प्रदान कर सकता है।
  • डीप ड्रिलिंग परियोजनाओं का उद्देश्य अक्सर विवर्तनिक, भूकंप तंत्र और भूतापीय ऊर्जा क्षमता के बारे में हमारी समझ को आगे बढ़ाना होता है।

तकनीक और विधियाँ

  • रोटरी ड्रिलिंग: इस विधि में चट्टानों को काटने के लिये एक घूमने वाली ड्रिल बिट का उपयोग किया जाता है। ड्रिल बिट को एक ड्रिल स्ट्रिंग से जोड़ा जाता है, जिसे एक रिग द्वारा घुमाया जाता है। बिट को ठंडा करने और चट्टानों को सतह पर ले जाने के लिये ड्रिलिंग मिट्टी को प्रसारित किया जाता है।
  • पर्कशन ड्रिलिंग (एयर हैमरिंग): यह हथौड़े को चलाने के लिये उच्च वायुदाब का उपयोग करता है जो ड्रिल बिट पर तेज़ी से प्रहार करता है, कुशलतापूर्वक चट्टान को तोड़ता है और कटिंग को बाहर निकालता है। यह खनिज अन्वेषण, पानी के कुओं और भूतापीय ऊर्जा जैसे कठोर चट्टान अनुप्रयोगों के लिये तेज़, लागत
  • कोयना ड्रिलिंग तकनीक में मड रोटरी ड्रिलिंग और पर्क्यूशन ड्रिलिंग (एयर हैमरिंग) का संयोजन किया जाता है।प्रभावी तथा बहुमुखी है, हालाँकि यह तेज आवाज़ कर सकता है और उथली गहराई के लिये सबसे उपयुक्त है।
  • हाइड्रोलिक फ्रैक्चरिंग (फ्रैकिंग): फ्रैकिंग, जिसे हाइड्रोलिक फ्रैक्चरिंग के रूप में भी जाना जाता है, एक तकनीक है जिसका उपयोग कभी-कभी चट्टानों को विभाजित करने के लिये किया जाता है जिसका उद्देश्य नमूने के लिये द्रव प्रवाह में सुधार करना या संसाधन निष्कर्षण के दौरान बेहतर परिणाम पाना होता है।
  • भू-भौतिकीय सर्वेक्षण: इसमें भूमिगत संरचनाओं का मानचित्रण करने तथा ड्रिलिंग कार्यों से पहले और उसके दौरान ड्रिलिंग लक्ष्यों की पहचान करने के लिये भूकंपीय, चुंबकीय एवं गुरुत्वाकर्षण विधियों का उपयोग किया जाता है।

पृथ्वी की आंतरिक संरचना का अध्ययन करने की अन्य विधियाँ

  • पृथ्वी की आंतरिक संरचना का अध्ययन प्रत्यक्ष विधियों जैसे ड्रिलिंग और गहरे बोरहोल के माध्यम से शैल का नमूना प्राप्त करने तथा अप्रत्यक्ष विधियों जैसे भूकंपीय तरंग विश्लेषण, गुरुत्वाकर्षण माप एवं पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र का अध्ययन करके किया जाता है।
  • भूकंपीय तरंगें: भूकंप से उत्पन्न भूकंपीय तरंगों का अध्ययन पृथ्वी की आंतरिक संरचना के बारे में बहुमूल्य जानकारी प्रदान करता है।
  • भूकंपीय तरंगें पृथ्वी के आंतरिक भाग से होकर परिवहित होती हैं और उनकी अपवर्तन (Refraction) और परावर्तन (Reflection) जैसी गतिविधियाँ वैज्ञानिकों को विभिन्न परतों की संरचना और इनके गुणों का अनुमान लगाने में मदद करती हैं।
  • गुरुत्वाकर्षण और चुंबकीय क्षेत्र माप: पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण और चुंबकीय क्षेत्रों में होने वाले परिवर्तन आंतरिक घनत्व तथा इसकी संरचना में परिवर्तन का संकेत देती हैं। ये माप पृथ्वी के क्रोड, मेंटल और क्रस्ट के बीच की सीमाओं की पहचान करने में मदद करते हैं।
  • ऊष्मा के प्रवाह का माप: पृथ्वी के आंतरिक भाग से बाहर निकलने वाली ऊष्मा विभिन्न परतों के ताप और ऊष्मीय गुणधर्मों के बारे में जानकारी प्रदान करती है। यह जानकारी पृथ्वी की आंतरिक प्रक्रियाओं और गतिशीलता को समझने के लिये महत्त्वपूर्ण है।
  • उल्कापिंड की संरचना: उल्कापिंडों का अध्ययन, जिन्हें प्रारंभिक सौर मंडल के अवशेष माना जाता है, पृथ्वी के आंतरिक भाग की संरचना और निर्माण के बारे में जानकारी प्रदान कर सकता है।

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