भारत ने बायोमास या कृषि अपशिष्ट से बड़े पैमाने पर बायो-बिटुमेन या जैव-कोलतार का उत्पादन शुरू करने की योजना शुरू की है।
बायो-बिटुमेन या जैव-कोलतार
- बायो-बिटुमेन एक जैव-आधारित बिंडर (बांधक) होता है, जो वनस्पति तेलों, फसल के ठूंठ, शैवाल, लिग्निन (लकड़ी का एक घटक) या पशु खाद जैसे नवीकरणीय स्रोतों से प्राप्त होता है।
- बायो-बिटुमेन उत्पादन को पेट्रोलियम बिटुमेन के स्थानीय विकल्प के रूप में विकसित किया गया है, जिससे पर्यावरण के प्रति प्रभाव को कम किया जा सके।
- यह सड़कों और छतों के निर्माण में उपयोग किया जाता है। इसे प्रत्यक्ष प्रतिस्थापन, संशोधक, और कायाकल्प के तौर पर उपयोग किया जाता है।
- बायो-बिटुमेन तकनीक से सड़कें बनाने में पराली का उपयोग किया जाएगा, जिससे प्रदूषण को कम किया जा सकता है।
उत्पत्ति और उत्पादन
- पेट्रोलियम बिटुमेन के समान ही, बायो-बिटुमेन भी कच्चे तेल के आसवन से प्राप्त होता है। इसके उत्पादन के लिए वनस्पति तेलों और अन्य जैविक स्रोतों का उपयोग किया जाता है, जिनकी प्राकृतिक उचितता और उपलब्धता अधिक होती है।
- बियोमास संयंत्रों, जैवगैसिफिकेशन और अन्य तकनीकियों का उपयोग करके इसे प्राकृतिक रूप से उत्पन्न किया जा सकता है।
गुण और उपयोग
- बायो-बिटुमेन का मुख्य उपयोग वायुमुक्त संरचनाओं में होता है, जैसे कि सड़क निर्माण (डामर फर्श), इमारतों, और समुद्री संरचनाओं के लिए जलरोधी बिंडर के रूप में।
- इसकी उच्च चिपकने और जलरोधी गुणवत्ता के कारण, यह संरचनाओं के लिए दुर्गमता और ट्रेडिशनल बिंडर के रूप में एक प्रतिस्थापन माध्यम के रूप में विकसित किया गया है।
भारत में वर्तमान बिटुमेन परिदृश्य
- आयात पर निर्भरता: भारत वर्तमान में वित्तीय वर्ष 2023-24 में अपनी वार्षिक बिटुमेन आवश्यकता का लगभग आधा हिस्सा 3.21 मिलियन टन आयात करता है।
- घरेलू उत्पादन: इसी अवधि में बिटुमेन उत्पादन 5.24 मिलियन टन रहा।
- खपत में वृद्धि: बिटुमेन की खपत में लगातार वृद्धि हुई है, जो पिछले पाँच वर्षों में यह औसतन 7.7 मिलियन टन प्रतिवर्ष रही है।वर्ष 2023-24 में राष्ट्रीय राजमार्गों (NH) का निर्माण लगभग 12,300 किलोमीटर तक पहुँच जाएगा, जो लगभग 34 किलोमीटर प्रतिदिन है।
जैव-बिटुमेन उत्पादन पहल के उद्देश्य
- आयात निर्भरता कम करना: इसका प्राथमिक उद्देश्य आगामी दशक में आयातित बिटुमेन के स्थान पर घरेलू स्तर पर उत्पादित जैव-बिटुमेन का उपयोग करना है, जिससे विदेशी मुद्रा व्यय में कमी आएगी।
- पर्यावरण संबंधी चिंताओं का समाधान: जैव-बिटुमेन उत्पादन का उद्देश्य बायोमास तथा कृषि अपशिष्ट को फीडस्टॉक के रूप में उपयोग करके पराली जलाने से जुड़े पर्यावरणीय मुद्दों को कम करना है।
- सतत् प्रथाओं को बढ़ावा देना: जैव-आधारित सामग्रियों का लाभ उठाकर, यह पहल टिकाऊ सड़क निर्माण प्रथाओं का समर्थन करती है और वैश्विक पर्यावरण मानकों के अनुरूप है।
- तकनीकी विकास एवं प्रायोगिक अध्ययन: केंद्रीय सड़क अनुसंधान संस्थान (CRRI) जैव-बिटुमेन का उपयोग करके 1 किलोमीटर की सड़क पर एक पायलट अध्ययन करने के लिये भारतीय पेट्रोलियम संस्थान के साथ सहयोग कर रहा है।
