Fri. Jun 5th, 2026

अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष ने एशिया-प्रशांत क्षेत्र के लिये अपनी रिपोर्ट ‘रीजनल इकॉनमिक आउटलुक फॉर एशिया एंड पैसिफिक, अप्रैल 2024’ जारी की है, जिसमें कहा गया है कि भारत, अप्रत्याशित रूप से मज़बूत वृद्धि का स्रोत था। इसके अतिरिक्त, सार्वजनिक निवेश भारत की अर्थव्यवस्था को संचालित करने में एक महत्त्वपूर्ण कारक रहा है।

रिपोर्ट की मुख्य विशेषताएँ

  • एशिया-प्रशांत क्षेत्र में विकास: वर्ष 2023 के अंत में एशिया-प्रशांत क्षेत्र में की वृद्धि 5.0% से अपेक्षाकृत अधिक रही, जिसमें सभी अर्थव्यवस्थाओं में मुद्रास्फीति की दर भिन्न-भिन्न थी।वर्ष 2024 के अनुमानों से निकट अवधि के जोखिमों को संतुलित करते हुए वृद्धि में 4.5% की गिरावट होने की आशा व्यक्त की गई है।उभरते बाज़ारों में वृद्धि मुख्य रूप से निजी मांग द्वारा समर्थित थी।
  • भारत में वृद्धि का पूर्वानुमान: IMF ने वित्तीय वर्ष 2024-25 के लिये भारत के वृद्धि पूर्वानुमान को 6.5% से बढ़ाकर 6.8% कर दिया है और साथ ही वर्ष 2025-26 के लिये वृद्धि पूर्वानुमान 6.5% रहने का अनुमान व्यक्त किया है।इस रिपोर्ट में यह भी स्पष्ट किया गया कि भारत तथा फिलीपींस लचीली घरेलू मांग द्वारा समर्थित सकारात्मक वृद्धि का स्रोत रहे हैं।चीन तथा विशेष रूप से भारत में सार्वजनिक निवेश का महत्त्वपूर्ण प्रभाव है।
  • चीन के लिये पूर्वानुमान: चीन की अर्थव्यवस्था वर्ष 2024 में 4.6% की दर से बढ़ने का अनुमान व्यक्त किया गया है, जो वर्ष 2023 के 5.2% की वृद्धि दर की तुलना में कम है, साथ ही वर्ष 2025 में इसके 4.1% पर रहने का अनुमान है।IMF, चीन को वृद्धि और कमी दोनों जोखिमों के स्रोत के रूप में देखता है।संभावित आवास कीमतों में वृद्धि एवं ऋण के अत्यधिक स्तर के बारे में चिंताओं के कारण परिसंपत्ति क्षेत्र तनाव की स्थिति में है। इन तनावों को कम करने वाली नीतियों तथा घरेलू मांग में वृद्धि के परिणामस्वरूप चीन तथा यह क्षेत्र (एशिया-प्रशांत) लाभान्वित होंगे।हालाँकि, स्टील और एल्युमीनियम जैसे कुछ उद्योगों में अतिरिक्त क्षमता को बढ़ावा देने वाली क्षेत्रीय नीतियों से चीन तथा इस क्षेत्र को हानि होगी।
  • मुद्रास्फीति का पूर्वानुमान: IMF ने स्पष्ट किया कि उभरते बाज़ारों में मुद्रास्फीति वर्तमान में वांछित स्तर पर है, लेकिन कई ऐसे कारक हैं जो भविष्य में मुद्रास्फीति में योगदान देंगे।कोर मुद्रास्फीति कम रहने का अनुमान है, लेकिन कुछ अर्थव्यवस्थाओं में ऊर्जा की कम कीमतों के कारण हेडलाइन मुद्रास्फीति में कमी देखी जा सकती है।तथापि, भारत जैसे देशों में खाद्य कीमतें, विशेष रूप से चावल की कीमतें, हेडलाइन मुद्रास्फीति में वृद्धि कर सकती हैं।अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष द्वारा परिभाषित मुद्रास्फीति, एक निश्चित अवधि के अंतर्गत  कीमतों में वृद्धि की दर है, जिसमें समग्र मूल्य वृद्धि या विशिष्ट वस्तुओं और सेवाओं के व्यापक उपाय शामिल हैं।
  • हेडलाइन मुद्रास्फीति: इसमें सभी वस्तुओं और सेवाओं के मूल्य परिवर्तन शामिल होते हैं। इसके अंतर्गत खाद्य पदार्थों और ऊर्जा से लेकर कपड़े, किराया तथा मनोरंजन तक सब कुछ शामिल है।मूल मुद्रास्फीति: यह खाद्य एवं ऊर्जा क्षेत्रों को छोड़कर वस्तुओं एवं सेवाओं की कीमत में होने वाला परिवर्तन है (क्योंकि ये अस्थिर हैं)।मूल मुद्रास्फीति= हेडलाइन मुद्रास्फीति- खाद्य एवं ईंधन वस्तुएँ
  • भू-आर्थिक विखंडन: IMF ने भू-आर्थिक विखंडन को एक महत्त्वपूर्ण जोखिम के रूप में दर्शाया किया है।भू-आर्थिक विखंडन का तात्पर्य देशों के मध्य बढ़ते आर्थिक और व्यापारिक तनाव रूपी संकट से है, जो वैश्विक आर्थिक विकास एवं स्थिरता पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकता है।वैश्विक विवादों ने व्यापार से जुड़े जोखिमों को बढ़ा दिया है, जैसे कि लाल सागर क्षेत्र में उत्पन्न विवाद से बचने के लिये जहाज़ो को अफ्रीका के आस-पास के क्षेत्रों में पथांतर से ज्ञात होता है, इसके परिणामस्वरूप शिपिंग लागत में वृद्धि हुई है।IMF ने यह सुझाव दिया है कि नीति निर्माताओं को सतर्क रहना चाहिये कि वे स्वयं व्यापार संबंधी चुनौतियों को न बढ़ाएँ।

अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष

  • अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) एक अंतर्राष्ट्रीय संगठन है जो सदस्य देशों को वित्तीय सहायता और सलाह प्रदान करता है।
  • इसकी परिकल्पना जुलाई, वर्ष 1944 में ब्रेटन वुड्स सम्मेलन के दौरान की गई थी।

उद्देश्य

  • वैश्विक मौद्रिक सहयोग एवं स्थिरता को बढ़ावा देना।
  • वित्तीय स्थिरता सुनिश्चित करना तथा संकट की स्थिति में सहायता उपलब्ध कराना।
  • स्थिर मुद्राओं के साथ अंतर्राष्ट्रीय व्यापार को सुगम बनाना।
  • प्रभावी नीतियों के माध्यम से सतत् विकास एवं रोज़गार को बढ़ावा देना।

Login

error: Content is protected !!