खाद्य और कृषि संगठन (FAO) की ‘द स्टेट ऑफ फूड एंड एग्रीकल्चर- 2023’ नामक एक नई रिपोर्ट अस्वास्थ्यकर आहार तथा अति-प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों की चौंका देने वाली प्रच्छन्न लागत का खुलासा करती है, जो हमारे स्वास्थ्य एवं पर्यावरण दोनों को प्रभावित करती है। यह लागत सालाना 7 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर से अधिक तक पहुँच जाती है जिसके दूरगामी परिणाम हो सकते हैं।
कृषि-खाद्य प्रणालियों के संदर्भ में छिपी हुई लागतों में उत्सर्जन और भूमि उपयोग से पर्यावरणीय व्यय, आहार पैटर्न से संबंधित स्वास्थ्य लागत, अल्पपोषण व कृषि-खाद्य श्रमिकों के बीच गरीबी से जुड़ी सामाजिक लागतें शामिल हैं।
खाद्य एवं कृषि राज्य- 2023 की प्रमुख खोजें
अस्वास्थ्यकर आहार की छुपी लागत
- अस्वास्थ्यकर आहार, जिसमें अति-प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थ, वसा और शर्करा का सेवन शामिल है, के कारण काफी छिपी हुई लागतें सामने आती हैं।
- ये लागत सालाना 7 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर से अधिक है, जो मोटापे और गैर-संचरणीय रोगों जैसे स्वास्थ्य संबंधी मुद्दों के आर्थिक बोझ को दर्शाती है।
- इसके अतिरिक्त, इन आहारों के परिणामस्वरूप श्रम उत्पादकता में कमी आती है, जो कुल छिपी हुई लागतों में योगदान करती है।
वैश्विक प्रभाव और आर्थिक बोझ
- अधिकांश प्रच्छन्न लागतें उच्च-मध्यम-आय (39%) और उच्च-आय वाले देशों (36%) में दिखाई दीं, निम्न-मध्यम-आय वाले देशों में ये लागतें 22% तथा निम्न-आय वाले देशों में 3% थीं।
- रिपोर्ट का अनुमान है कि अस्वास्थ्यकर आहार के परिणामस्वरूप सालाना कम से कम कुल 10 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर के बराबर प्रच्छन्न लागत का वहन करना होता है, जो वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का लगभग 10% है।
- विश्लेषण में 154 देशों को शामिल किया गया है, जिसमें अति-प्रसंस्कृत आहार पैटर्न के व्यापक प्रभाव पर ज़ोर दिया गया है।
भारत पर प्रभाव
- कृषि खाद्य प्रणालियों में भारत की कुल प्रच्छन्न लागत लगभग 1.1 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर थी, जो चीन और संयुक्त राज्य अमेरिका के बाद विश्व स्तर पर तीसरे स्थान पर थी।
भारत में प्रमुख योगदानकर्ता
- भारत में छिपी हुई लागतों में बीमारी का बोझ (आहार पैटर्न से उत्पादकता हानि) सबसे बड़ी हिस्सेदारी (60%) के लिये ज़िम्मेदार है, इसके बाद निर्धनता के कारण प्रच्छन्न सामाजिक लागत, जिसमें सामाजिक व्यय शामिल हैं (14%) और नाइट्रोजन उत्सर्जन से पर्यावरणीय लागत (13%) आती है।
प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों का तेज़ी से प्रसार
- विश्व भर के उपनगरीय और ग्रामीण क्षेत्रों में अत्यधिक प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों की खपत बढ़ रही है।
- इस प्रवृत्ति को बढ़ने वाले कारकों में शहरीकरण, जीवनशैली में बदलाव तथा महिलाओं और पुरुषों दोनों के लिये रोज़गार प्रोफाइल में बदलाव शामिल हैं।
- यात्रा में लगने वाला लंबा समय भी इन क्षेत्रों में प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों की बढ़ती खपत में योगदान देता है।
शहरी बनाम ग्रामीण उपभोग पैटर्न
- रिपोर्ट उस पारंपरिक धारणा को चुनौती देती है जो मानती है कि शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों के बीच उपभोग पैटर्न काफी भिन्न होता है।
- निष्कर्षों से पता चलता है कि प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों का प्रसार ग्रामीण-शहरी सातत्य में व्यापक और लगभग समान है।
- उच्च और निम्न-खाद्य-बजट दोनों क्षेत्रों में प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थ कुल खपत का एक बड़ा हिस्सा निर्मित करते हैं, शहरीकरण इनका एकमात्र चालक नहीं है।
वैश्विक खाद्य असुरक्षा
- खाद्य असुरक्षा, विशेष रूप से मध्यम अथवा गंभीर खाद्य असुरक्षा लगातार दूसरे वर्ष वैश्विक स्तर पर काफी हद तक अपरिवर्तित रही।
- हालाँकि यह स्तर कोविड-19 महामारी के पूर्व के आँकड़ों से काफी अधिक है।
- रिपोर्ट में बताया गया है कि वैश्विक आबादी का लगभग 29.6% यानी लगभग 2.4 अरब लोगों ने वर्ष 2022 में मध्यम अथवा गंभीर खाद्य असुरक्षा का अनुभव किया।
- उनमें से लगभग 900 मिलियन व्यक्तियों (वैश्विक जनसंख्या का 11.3%) को गंभीर खाद्य असुरक्षा का सामना करना पड़ा।
- विश्लेषण से पता चला कि नौ दक्षिण एशियाई देशों में अफगानिस्तान तथा पाकिस्तान के बाद भारत की कुल आबादी में अल्पपोषण (233.9 मिलियन) का तीसरा सबसे बड़ा प्रसार था।
- हालाँकि भारत में कुपोषित लोगों की हिस्सेदारी वर्ष 2004-06 में जनसंख्या के 21.4% से घटकर 2020-22 में 16.6% हो गई है।
- निम्न-आय वाले देश कृषि-खाद्य प्रणालियों की अप्रत्यक्ष लागतों से सबसे अधिक प्रभावित हुए, जो उनके कुल सकल घरेलू उत्पाद के एक चौथाई से अधिक का प्रतिनिधित्व करते हैं, जबकि मध्यम-आय वाले देशों में यह 12% से कम व उच्च-आय वाले देशों में 8% से कम है।
भविष्य के अनुमान एवं अल्पपोषण
- रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि वर्ष 2030 तक लगभग 600 मिलियन लोगों के दीर्घकालिक अल्पपोषण से पीड़ित होने की आशंका है।
