Wed. Apr 1st, 2026

देश के टेलीकॉम कंपनियों को सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि टेलीकॉम कंपनियों द्वारा अदा किए गए प्रवेश शुल्क के साथ-साथ परिवर्तनीय वार्षिक लाइसेंस शुल्क के भुगतान को राजस्व व्यय नहीं बल्कि पूंजीगत व्यय माना जाएगा और तदनुसार कर लगाया जाएगा।

प्रमुख बिंदु

  • सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली उच्च न्यायालय के उस आदेश को रद्द कर दिया जिसमें 31 जुलाई 1999 से पहले और बाद की लाइसेंस फीस को पूंजीगत व्यय (कैपेक्स) और राजस्व व्यय के रूप में अलग-अलग वर्गीकृत किया गया था।
  • आयकर विभाग की एक अपील की 33 समान याचिकाओं का निपटारा करते हुए  सुप्रीम कोर्ट ने कहा 1999 की नई दूरसंचार नीति के तहत DoT (दूरसंचार विभाग) की प्रकृति में लाइसेंस शुल्क  पूंजीगत है और इसे आय कर अधिनियम की धारा 35ABB के अनुसार परिशोधित किया जा सकता है।
  • भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने फैसला सुनाया है कि दूरसंचार कंपनियों द्वारा प्रवेश शुल्क और परिवर्तनीय वार्षिक लाइसेंस शुल्क के भुगतान को पूंजीगत व्यय माना जाना चाहिए एवं उन पर कर लगाया जाना चाहिए।
  • पूंजीगत व्यय आम तौर पर अचल संपत्तियों की एकमुश्त बड़ी खरीद होती है जिसका उपयोग लंबी अवधि में राजस्व सृजन के लिए किया जाता है।
  • राजस्व व्यय चालू परिचालन व्यय हैं जो दैनिक व्यवसाय संचालन को चलाने के लिए उपयोग किए जाने वाले अल्पकालिक व्यय हैं।
  • पहले टेलीकॉम कंपनियों को राष्ट्रीय दूरसंचार नीति 1999 के अनुसार प्रवेश के लिए एकमुश्त लाइसेंस शुल्क और उनके वार्षिक सकल राजस्व (annual gross revenue) से जुड़ा वार्षिक लाइसेंस शुल्क का भुगतान करना पड़ता था।

सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का प्रभाव

  • वर्तमान में दूरसंचार कंपनियां लाइसेंस शुल्क को एक राजस्व व्यय के रूप में मानती हैं और अपनी कर देनदारियों पर परिवर्तनीय लाइसेंस शुल्क(variable licence fee) के कटौती का दावा करती हैं।
  • इस निर्णय के परिणामस्वरूप दूरसंचार कंपनियों विशेष रूप से भारती एयरटेल और वोडाफोन आइडिया जैसी कंपनियों पर अतिरिक्त कर देनदारियां बढ़ने की उम्मीद है जो चालू वित्त वर्ष में लगभग 1 बिलियन डॉलर होने का अनुमान है।

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