गोवा का काजू
- मूलतः काजू लैटिन अमेरिका में पूर्वोत्तर ब्राज़ील में पाया जाता था और 16वीं शताब्दी (1570) में इसे पुर्तगालियों द्वारा गोवा लाया गया तथा गोवा काजू नाम दिया गया।
- प्रारंभ में इसका उपयोग वनीकरण और मृदा संरक्षण के लिये किया गया था इसके आर्थिक मूल्य के बारे में एक सदी बाद पता चला।
- काजू उत्पादन कुटीर उद्योग से बढ़कर गोवा की अर्थव्यवस्था में एक प्रमुख योगदानकर्त्ता बन गया, जिसका मुख्य कारण अमेरिका में इसकी अधिक मांग थी।
काजू के संबंध में प्रमुख तथ्य
- काजू भारत में सबसे महत्त्वपूर्ण वृक्षारोपण फसलों में से एक है और काफी अधिक विदेशी मुद्रा अर्जित करने में सहायक है। गोवा राज्य में बागवानी फसलों में इसका क्षेत्रफल सबसे अधिक है।
- अच्छी जल निकास वाली गहरी बलुई दोमट मिट्टी काजू की खेती के लिये सर्वोत्तम होती है। इसके लिये भारी चिकनी मिट्टी उपयुक्त नहीं होती, क्योंकि काजू जल जमाव को सहन नहीं कर पाता।
- सामान्य तौर पर रेतीली से लेकर लेटेराइट तक सभी प्रकार की मृदा इस फसल के लिये उपयुक्त होती हैं।
- 60 से 95% की सापेक्ष आर्द्रता और 2000-3500 मिमी. की वार्षिक वर्षा वाली भारतीय तटीय क्षेत्र की परिस्थितियाँ काजू उत्पादन के लिये अनुकूल हैं।
- काजू की खेती के लिये 20 से 38o C के बीच तापमान वाली गर्म आर्द्र परिस्थितियाँ उपयुक्त होती हैं। अत्यधिक कम तापमान और पाला काजू की खेती के लिये अनुकूल नहीं होते है।
- राष्ट्रीय बागवानी बोर्ड के अनुसार, वर्ष 2021-2022 में महाराष्ट्र काजू का अग्रणी उत्पादक रहा है, इसके बाद आंध्र प्रदेश, ओडिशा, तमिलनाडु, कर्नाटक, केरल, छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल, मेघालय, गुजरात का स्थान है।
