दिल्ली उच्च न्यायालय ने एक अंतरिम आदेश जारी किया है जिसमें फेडरेशन ऑफ होटल एंड रेस्तराँ एसोसिएशन ऑफ इंडिया के सदस्यों को ‘सेवा शुल्क शब्द के स्थान पर कर्मचारी योगदान का उपयोग करने का निर्देश दिया गया है और यह भी कि चार्ज की जाने वाली राशि कुल बिल का 10% से अधिक नहीं होनी चाहिये।
सेवा शुल्क
- सेवा शुल्क एक ऐसा शुल्क है जो कभी-कभी व्यवसायों द्वारा बिल या चालान में जोड़ा जाता है, विशेष रूप से रेस्तराँ, होटल और बैंक्वेट हॉल जैसे आतिथ्य उद्योग में।
- इसका उद्देश्य वेटर्स, सर्वर और अन्य सेवा कर्मियों सहित कर्मचारियों द्वारा प्रदान की गई सेवा की लागत को कवर करना है।
- इसे ग्राहक सेवा शुल्क या रखरखाव शुल्क भी कहा जा सकता है।
- रेस्तराँ तथा होटल आमतौर पर खाने के बिल पर 10% सेवा शुल्क लगाते हैं।
पृष्ठभूमि
यह आदेश नेशनल रेस्तराँ एसोसिएशन ऑफ इंडिया (NHRAI) और FHRAI द्वारा दायर याचिकाओं को ध्यान में रखते हुए पारित किया गया था, इन याचिकाओं में केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण द्वारा जारी जुलाई 2022 के दिशा-निर्देशों को चुनौती दी गई थी। ये दिशा-निर्देश केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण द्वारा उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 की धारा 18(2)(1) के तहत जारी किये गए थे।CCPA दिशा-निर्देशों में कहा गया है कि उपभोक्ताओं से किसी अन्य नाम से सेवा शुल्क नहीं लिया जाना चाहिये और ये शुल्क वैकल्पिक एवं स्वैच्छिक होने चाहिये।उनके पास विकल्प होना चाहिये कि वे बिल से सेवा शुल्क हटाने का अनुरोध कर सकें।ई-दाखिल पोर्टल के माध्यम से किसी प्रकार के अनुचित व्यापार प्रथाओं के खिलाफ शिकायत शीघ्र निवारण अथवा अन्य उद्देश्यों के लिये उपभोक्ता आयोग के पास इलेक्ट्रॉनिक रूप से भी दर्ज की जा सकती है।इन दिशा-निर्देशों में उपभोक्ताओं को सूचित किये बिना बिल में स्वचालित रूप से सेवा शुल्क जोड़ने या शामिल करने पर भी रोक लगा दी गई है। ये दिशा-निर्देश उपभोक्ताओं की शिकायतों के जवाब में पेश किये गए थे, क्योंकि कई रेस्तराँ और होटल स्पष्ट रूप से यह बताए बिना कि भुगतान स्वैच्छिक था, सेवा शुल्क लगा रहे थे।CCPA द्वारा उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 की धारा 18(2)(1) के तहत दिशा-निर्देश जारी किये गए थे।
नोट: अधिनियम की धारा 18(2)(1) के तहत CCPA ने होटल और रेस्तराँ पर सेवा शुल्क लगाने के संबंध में अनुचित व्यापार प्रथाओं को रोकने और उपभोक्ता हितों की सुरक्षा के लिये दिशा-निर्देश जारी किये हैं।
न्यायालय का हालिया निर्णय
- FHRAI ने “सेवा शुल्क” का नाम बदलकर “कर्मचारी योगदान” करने की इच्छा व्यक्त की। हालाँकि NRAI ने पिछले निर्णयों और इस तथ्य का हवाला देते हुए इस बदलाव का विरोध किया कि उसके सदस्यों के एक महत्त्वपूर्ण प्रतिशत ने सेवा शुल्क लगाया था।
- न्यायालय ने सेवा शुल्क लगाने के संबंध में FHRAI की सदस्यता में एकरूपता की कमी पर ध्यान दिया।
- परिणामस्वरूप उच्च न्यायालय ने FHRAI सदस्यों को ‘कर्मचारी योगदान’ शब्द को अपनाने और इसे कुल बिल राशि का 10% तक सीमित करने का निर्देश दिया।
2017 दिशा-निर्देशों से संबंध
- वर्ष 2022 के सेवा शुल्क दिशा-निर्देशों का उद्देश्य केंद्र सरकार द्वारा जारी वर्ष 2017 के दिशा-निर्देशों के पूरक के रूप में कार्य करना था, न कि इसे प्रतिस्थापित करना था। वर्ष 2017 के इन दिशा-निर्देशों ने अनुचित व्यापार प्रथाओं के विषय में चिंताओं को संबोधित करते हुए ग्राहकों की स्पष्ट सहमति के बिना होटल और रेस्तराँ द्वारा सेवा शुल्क लगाए जाने पर रोक लगा दी थी।
- निष्कर्षतः 10% की सीमा के साथ ‘सेवा शुल्क’ का नाम बदलकर ‘कर्मचारी योगदान’ करने का दिल्ली उच्च न्यायालय का हालिया निर्णय उद्योग संघों और उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरणों के बीच चल रही कानूनी लड़ाई में एक महत्त्वपूर्ण विकास का प्रतिनिधित्व करता है।
- यह मामला भारत के उपभोक्ता संरक्षण नियमों के अनुरूप रेस्तराँ बिलिंग प्रथाओं में पारदर्शिता और उपभोक्ता की पसंद के महत्त्व पर प्रकाश डालता है।
