केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री ने लसीका फाइलेरिया (Lymphatic Filariasis) के लिये वार्षिक राष्ट्रव्यापी मास ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (MDA) पहल के दूसरे चरण का उद्घाटन किया।भारत का लक्ष्य एक मिशन-संचालित रणनीति के माध्यम से वैश्विक लक्ष्य से तीन वर्ष पहले वर्ष 2027 तक लसीका फाइलेरिया का उन्मूलन करना है।
लसीका फाइलेरिया
- लसीका फाइलेरिया, जिसे आमतौर पर हाथीपाँव रोग (एलिफेंटियासिस) के रूप में जाना जाता है, परजीवी संक्रमण के कारण होने वाला एक उपेक्षित उष्णकटिबंधीय रोग (Neglected Tropical Disease- NTD) है जो संक्रमित मच्छरों के काटने से फैलता है।
- यह रोग विश्व के उष्णकटिबंधीय एवं उपोष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में लाखों व्यक्तियों को प्रभावित करता है।
- लसीका फाइलेरिया, फिलारियोडिडिया परिवार के नेमाटोड (राउंडवॉर्म) के रूप में वर्गीकृत परजीवियों के संक्रमण के कारण होता है।
ये धागे जैसे फाइलेरिया कृमि 3 प्रकार के होते हैं
- वुचेरेरिया बैन्क्रॉफ्टी (Wuchereria Bancrofti), जो 90% मामलों के लिये उत्तरदायी होता है।
- ब्रुगिया मलाई (Brugia Malayi), जो शेष अधिकांश मामलों का कारण बनता है।
- ब्रुगिया टिमोरी (Brugiya Timori), भी इस रोग का कारण है।
लक्षण
- लसीका फाइलेरिया संक्रमण में स्पर्शोन्मुख, तीव्र तथा गंभीर स्थितियाँ शामिल होती हैं।
- गंभीर स्थितियों में इसमें लिम्फोएडेमा (ऊतक सूजन) या एलिफेंटियासिस (त्वचा/ऊतक का मोटा होना) एवं हाइड्रोसील (अंडकोश की सूजन) जैसे लक्षण देखे जाते हैं।
उपचार
- विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) लसीका फाइलेरिया के वैश्विक उन्मूलन में तीव्रता लाने के लिये उपचार कर लिये तीन दवाओं की सिफारिश करता है। उपचार, जिसे IDA के रूप में जाना जाता है, में आइवरमेक्टिन, डायथाइलकार्बामाज़िन साइट्रेट तथा एल्बेंडाज़ोल का संयोजन शामिल है।
- इसके तहत लगातार दो वर्षों तक इन दवाओं को देना शामिल है। वयस्क कृमि का जीवन मुश्किल से चार वर्ष का होता है, इसलिये यह व्यक्ति को कोई हानि पहुँचाए बिना स्वाभाविक रूप से समाप्त जाएगा।
