भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत इसकी प्राचीन पांडुलिपियों में समाहित है, जो अमूल्य ज्ञान का भण्डार हैं और अपना एक ऐतिहासिक महत्त्व रखती हैं। हालाँकि, इनमें से कई पांडुलिपियों का देश के भीतर और बाहर खो जाना अथवा नष्ट हो जाना चिंता का विषय बन गया है। भारत सरकार राष्ट्रीय पांडुलिपि विधेयक, 2023 के माध्यम से इस समस्या का हल करने की तैयारी में जुटी हुई है।
मुख्य बिन्दु
- इस विधेयक का प्राथमिक उद्देश्य विश्व भर में भारतीय विरासत ग्रंथों का दस्तावेज़ीकरण और सूचीबद्ध करना, सटीक जानकारी बनाए रखना और परामर्श शर्तें निर्दिष्ट करना है।
- यह विधेयक 10 सदस्यों वाले राष्ट्रीय पांडुलिपि प्राधिकरण (National Manuscripts Authority- NMA) की स्थापना का प्रस्ताव रखता है, जिसकी अध्यक्षता संस्कृति मंत्री द्वारा की जायेगी, साथ ही इसमें संस्कृति, वित्त, शिक्षा और निजी एजेंसियों के प्रतिनिधि भी शामिल होंगे।
- यह प्राधिकरण पांडुलिपियों के डिजिटलीकरण, संरक्षण, संपादन और प्रकाशन की देखरेख का कार्य करेगा।
- इस प्राधिकरण के पास पांडुलिपि तक पहुँच को विनियमित करने, चोरी की जाँच करने और क्षति अथवा चोरी के खिलाफ सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिये सिविल कोर्ट की शक्तियाँ होंगी।
- यह एक विशेषज्ञ समिति द्वारा निर्धारित मुआवजे के साथ, किसी सामग्री के महत्त्व के आधार पर निजी मालिकों से पांडुलिपियाँ हासिल कर सकता है।
- पांडुलिपियाँ ताड़ के पत्ते, काग, कपड़े और छाल जैसी सामग्रियों पर संस्कृत तथा क्षेत्रीय भाषाओं में लिखी गई हस्तलिखित रचनाएँ होती हैं, जो कम से कम 75 वर्ष पुरानी होती हैं।
- भारत में 80 प्राचीन लिपियों में लिखित लगभग 10 मिलियन पांडुलिपियाँ मिली हैं, जिनके संरक्षण की ज़िम्मेदारी राष्ट्रीय पांडुलिपि मिशन की है।
- बख्शाली पांडुलिपि, तीसरी अथवा चौथी शताब्दी ईस्वी पूर्व का एक प्राचीन गणितीय पाठ है जिससे शून्य के प्रारंभिक उपयोग का पता चलता है।
